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Indian cancer scientist develops software for patients - The Hindu

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बैंगनी फूलों वाला पेड़

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बैंगनी फूलों वाला पेड़

चाणक्यपुरी वाला हमारा सरकारी बंगला, जहां दिल्ली, दिल्ली है ऐसा कम ही लगता। साफ-सुथरा वीआईपी एरिया। इतनी हरियाली दिल्ली के किसी और इलाके में शायद ही देखने को मिले। हमारे घर के सामने तो जैसे सघन अशोक वाटिका ही बनी थी। यह एक हरा-भरा सरकारी बगीचा है। बगीचे में तमाम तरह के पेड़-पौधे हैं। पर मेरी .ष्टि में बगीचे में सबसे खूबसूरत पेड़ वही है जिसके ऊपर गर्मी-भर बैंगनी रंग के फूल खिलते हैं। हर बार जब भी वह पेड़ बैंगनी फूलों से लद जाता, मैं उसका नाम जानने को उतावली होती-कई बार किताबों, पत्र-पत्रिकाओं के पन्ने पलटती, शायद इस पेड़ का वर्णन या फोटो दिख जाए, पर आज तक नहीं जान पाई इसका नाम। लंबे तनेवाले इस पेड़ के शीर्ष पर फैले छोटे-छोटे जामुनी रंग के फूल और कलियों के गुच्छे मुझे किसी ग्रामीण स्त्री की वायल की फूलोंवाली चुनरी जैसे लगते। घर के बाईं तरफवाली खिड़की खोलते ही ध्यान उधर चला जाता। काफी बड़े क्षेत्र में पेड़ की छत्रछाया फैली हुई। गुलमोहर जैसे आकार-प्रकार के इस पेड़ पर तरह-तरह के पंछी अपना बसेरा बनाए रहते हैं। फागुन के बाद तपती दोपहर में जब ज्यादातर पेड़ पतझड़ का गम मना रहे होते है…
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प्रसंग : उत्तराखण्ड आपदा प्रबंधन
आवश्यकता है जोखिम मूल्यांकन के आत्मविश्लेषण की
  स्वाति तिवारी
प्राकृतिक आपदाएं कह कर नहीं आती पर जब आती हैं तो अपना रौद्र रूप दिखाते हुए कहर बरपा जाती हैं। प्राकृतिक आपदा इस बात की याद भी दिलाती है कि मनुष्य ने प्रकृति पर विजय पाने के जो झण्डे-डण्डे गाड़ रखे हैं वे और उनका सच क्या है? मनुष्य का प्रकृति के साथ जो अंतरसंबंध रहा है वह कम होते होते खत्म होता जा रहा है। मनुष्य सिर्फ दोहन ही दोहन कर रहा है प्रकृति को नष्ट कर सीमेंट-कांक्रीट के जंगल उगा रहा है। प्रकृति ने अपना आक्रोश हमें दिखा दिया। पुराने समय में कहावत थी कि मुसीबतें कह कर नहीं आती। आज के वैज्ञानिक युग में जब बाकायदा मौसम विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान जैसी सुविधाएं हैं। ऐसे में भी अगर उत्तराखण्ड जैसी आपदा आती है तो सवाल यह उठता है कि हम कब चेतेंगे? क्या पिछले दसों साल से हर साल इसी मौसम में आने वाली बाढ़ के प्रकोप से बचा नहीं जा सकता। उत्तराखण्ड में ऐसे स्थान निश्चित हैं जहां हर साल बाढ़ का प्रकोप देखा जा सकता है। इसमें उत्तर काशी, चमोली, जोशीमठ मार्ग, रूद्रप्रयाग, गंगोत्री-जमनोत्री, उत्तरकाशी-केदारनाथ…
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भोपाल गैस त्रासदी

ताकी सनद रहे बाकी
शुरू करते हैं यूनियन कार्बाइड से। एक ऐसा कलंक, जो हमारे माथे पर गहरा लगा है। हादसे ने तो इसे दुनिया के सामने जाहिर कर दिया। देश भर में हर दिन होने वाले छोटे-मोटे हादसों का सबसे बड़ा प्रतीक, जिनमें हमारी व्यवस्था उतने ही निष्ठुर और निर्मम रूप में सामने आती है, जितनी भोपाल में देखी गई। तारीख क्क् जनवरी ख्क्क्। गैस पीड़ित औरतों की दुनिया में दाखिल होने से पहले मैं इसी कलंकित कार्बाइड को नजदीक से देखना चाहती थी। कीटनाशकों के उत्पादन का यह अमेरिकी उद्योग, जो भारत में मौत का दूसरा भयावह नाम बन गया। हादसे के ढाई दशक गुजरने के बाद वह किस हाल में है, यह जानने के लिए मैंने उसी की तरफ कदम बढ़ाए। मैंने जानबूझकर वहां तक जाने का लबा रास्ता चुना जो पुराने भोपाल से होकर जाता है। भोपाल की इन्हीं सड़कों पर उस रात मौत का तांडव हुआ था। इन पर अब तक लाखांे पन्ने लिखे जा चुके हैं। हजारों लैक एंड व्हाइट तस्वीरें छपी हैं। मैंने भी देखी हैं। लाशों के ढेर। बच्चे, बूढ़े, जवान, औरतें और पशु-पक्षियों की मौत से लबालब तस्वीरें। मौत अपनी फितरत के मुताबिक ही बेरहम थी। उसने हिंदू, मुसल…
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