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देह-अंश


रेलवे पटरी के उस तरफ प्लेटफॉर्म नम्बर तीन पर खड़ा वह प्रौढ़ आदमी, नजर पड़ते ही उसे जाना-पहचाना लगा। एक क्षण के बाद वह पहचान गई। ''हां! वही तो है, एकदम वही', वह मन-ही-मन बुदबुदाई। परत-दर-परत उघड़ता अतीत उसकी आंखों के सामने कौंध गया। मन में नफरत की ज्वाला उठने लगी थी। आत्मा फुंफकार मार रही थी। इच्छा हुई दौड़कर जाए और गला दबा दे उस सत्यानाशी का। पर अब क्या वह यह सब कर पाएगी? मन में उठे इसी संशय के चलते मन मसोसकर उसने मुट्ठी को भींचकर फिर खोल दिया था। बेबसी की कसमसाहट से उबरने के लिए वह प्लेटफॉर्म नम्बर तीन की तरफ पीठ करके खड़ी हो गई थी। मन में नफरत का जहर लगातार रिसता रहा। उसी नफरत के जहर से मन कैसा कसैला-सा होने लगा। उसी मन में व्याप्त कड़वाहट को वह निगलते हुए विचार बदलना चाहती है, पर कहां, क्या ऐसी कड़वाहट यूं ही निगलते बनती है। वह थूककर सोचती रही, ''यह बदनुमा पुरूष तो थूकने के लायक भी नहीं।'' पर थूककर उसने मन को हल्का करना चाहा। थूकनेभर से अगर आत्मा में उतर चुका विष कम हो सकता होता तो वह कब का ही उतर गया होता। क्या जहरीले दंश देह से लगने के बाद उतरते हैं?

न…