शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

बुधवार, 29 सितंबर 2010

एक मिसाल देनी होगी हमें,



आने वाला कल हम पर गर्व कर सके

 डा. स्वाति तिवारी

आनेवाला कल आप पर गर्व कर सकता है कि इतने सालों से चला हा रहा विवाद इतनी त्रासद स्थितियों का साक्षी वह मुद्दा जो हिन्दू और मुसलमान के बीच दरार नहीं खाई खोदता रहा उसका फैसला जब आया तो उस दौर की जनता ने जिस धैर्य और सौहार्द्र का परिचय दिया था, देश की अमन और शान्ति का जो पाठ पढ़ा वो विश्वभर के लिए अचम्भे का कारण बना। ---- और हम अब धर्म की खाईयों को लाँघने की क्षमता अपने आम में विकसित कर चुके हमारे विवेक, हमारी धर्म निरपेक्षता को कोई भी विवाद, मुद्दे और फैसले विवेकशून्य नहीं बना सकते हमें इसका परिचय देना ही होगा। यह परीक्षा की घड़ी हैं ----- फैसले जीवन से, जीवनमूल्यों से ही तो निकलते हैं तो क्यों हम उन्हीं जीवनमूल्यों के विपरीत चल पड़ते हैं ---- जीवन, मानवता, विकास और राष्ट्र हमारे हर फैसले से ज्यादा महत्वपूर्ण है ---- उसके खातिर हमें अपनी ही असहनशीलता के विरूद्ध लड़ना होगा क्योंकि हम असहनशील ----- होकर अपनी ही सहनशीलता का गला घोंटते आए हैं --- पर अब नहीं --- अब और तो बिलकुल नहीं क्यों, क्योंकि जनता समझ गयी हैं कि दंगे और फसाद हमें ही कमजोर करते हैं - किसी एक दंगे से हम सौ साल पीछे चले जाते हैं -----। नहीं, हमारे बच्चों को नहीं चाहिए ऐसे दंगे और फसाद। इस बार प्रशासन की मुस्तैदी और धर्मगुरूओं की एकमत राय है कि हम एक हैं - मुख्यमंत्री की चाक चौबन्द निगाहें और जनता का एक मत से फैसले पर विवाद को नकारना सब इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमें आगे और नहीं लड़ना है। यह एक अच्छी शुरूआत है। मध्यप्रदेश की सात करोड़ जनता के बीच प्रदेश के मुखिया का पैगाम अच्छी तरह न केवल पहुँच गया है कि हम - शांति और सद्भाव चाहते हैं, इसका प्रभाव दिखाई भी देने लगा है। लोग खुद सतर्क हैं अपने-अपने घरों में। वे मुश्किलों में फंसना नहीं चाहते और प्रशासन की मुश्किल बढ़ाना नहीं चाहते।

जनता को एक ऐसे ही सख्त प्रशासन की जरूरत होती है। एक माहौल बनना चाहिए अनुशासन का जो बनता दिखाई दे रहा है। कल अपने एक मुस्लिम सहकर्मी से चर्चा में पता चला हमारे यहाँ नमाज के वक्त कहा जा रहा है कि हर हाल में हमें शान्ति बनाए रखनी है। हमें लड़ना नहीं है। सद्भावना और सौहार्द्र बनाए रखना है सभी समुदायों के धर्मगुरू यह संदेश दे रहे हैं। कोई बता रहा है कि शान्ति की अपील के पर्चे भी बांटे जा रहे हैं।

विशेष पूजा और अर्चना हो रही है। सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ बिलकुल नहीं है। एक मित्र ने बताया यह अमन चैन कायम रखने की दृढ़ राजनैतिक इच्छा शक्ति का परिणाम है कि जनता खुद सतर्क हो रही है। इस वक्त प्रदेश के मुख्यमंत्री का एक ही मिशन है। वे जिस तरह से प्रदेश में अमनों-अमान कायम रखने की चौतरफा कोशिशें कर रहे हैं। उन्होंने न केवल अपनी कानून-व्यवस्था की मशीनरी को मुस्तैदी से कसा है बल्कि उन्हें जिम्मेदारी भी दे दी है। अपने प्रदेश के जनप्रतिनिधियों को भी प्रदेश में सौहार्द्र बनाए रखने की व्यवस्था में लगा दिया है। विधायक हों, सांसद हों या मंत्रिपरिषद के सदस्य, धर्मगुरू हो, चाहे मीडिया और साहित्यकार, उन्होंने सभी से कहा है कि वे अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में सभी वर्गों से संवाद बनाकर प्रदेश में अमन-चैन के लिए कार्य करें। शान्ति समितियों की बैठकें भी जनता में विश्वास पैदा कर रही हैं कि राज्य सरकार सतर्क और सक्षम है। वह अपनी जनता को शान्ति और सुरक्षा देना चाहती है। मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने कहा कि अदालत के फैसले को जाति और धर्म या भाजपा और कांग्रेस के नजरिये नहीं से देख रहे हैं। उन्होंने राजनैतिक भेदभाव और पक्ष-विपक्ष से ऊपर उठकर सभी से बात की है।

कल टी.वी. पर एक स्टोरी अयोध्या से लाइव आ रही थी कि भगवान राम के लिए जो वस्त्र-वेशभूषा प्रतिदिन जाती है वह एक मुस्लिम परिवार सिलता है। राजा राम के कपड़े, कभी लाल, कभी पीले रंग-बिरंगे गोटा किनारी लगे हुए ताकि भगवान का दिव्य रूप, उनका ‘‘आभा-मण्डल’’ रोज़ नया और चमत्कारी बना रहे। मूर्त्ति का श्रृंगार है वस्त्र और वे फूलों की मालाएं जो अयोध्या के मुसलमान पिरोते हैं। जब भगवान को ऐतराज नहीं तो भक्तों को क्यों हो? अयोध्या की जनता खुद त्रस्त हो चुकी है इस झगड़े से। वो कहती है हम सब मिल-जुलकर रहते आए हैं, आगे भी रहना चाहते हैं।

दरअसल समाज की जरूरतें बदल गई हैं लोग लड़ने के बजाए विकास चाहते हैं। उनकी माँग है शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार। तब मन्दिर के कलश और मस्जिद के गुंबद अलग कहाँ दिखते हैं - एक नया समाज एक नया धर्म जन्म लेता है जो ना हिन्दू है ना मुसलमान वह दोनों का आदर करता है।

30 सितम्बर के फैसले की आखरी घड़ी है। हमें याद रखना होगा कि जब भी कोई आक्रोश किसी प्रदेश-देश की शान्ति और सद्भावना भाईचारे और मित्रवत् रिश्तों को ध्वस्त करता है तब हमारी सबसे पवित्र चीज भी ध्वस्त होती है, वह चीज है गणतंत्र की धर्मनिरपेक्ष आत्मा। यह देश की आत्मा को क्षति पहुँचाना है। कानून है उसकी हिफाजत उसका सम्मान और उसका पालन सभी का दायित्व है। अगर हम फैसले से संतुष्ट नहीं हैं तो हमें कानून हाथ में लेने की जरूरत नहीं है, कानून की शरण में जाना चाहिए।

लोगों से बात करने पर अच्छी बात यह दिखाई देती है कि जनमानस में एक पक्षीय भावनात्मक उफान नहीं है। दोनों ही सम्प्रदाय के कार्यकर्ता संयम बरतने को कह रहे हैं --- अफवाह पर ध्यान न दें और कृपया अफवाह ना फैलाएं। जनता को खबरों के लिए अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। हमारे घरों में खबरों के चैनल हैं। अफवाहें भय फैलाती हैं, उनसे सावधान रहने का यही वक्त है। असामाजिक तत्व कोई हरकत करें -- पर अगर प्रशासन के साथ जनता भी सतर्क, चौकस और चाक-चौबंद है तो मज़ाल है कि कोई असामाजिक तत्व सक्रिय हो पाय? वक्त की माँग है आपकी विवेकशीलता और धैर्य की। ---- वक्त की माँग को सुनना और पूरा करना हम सबके हित में है।

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डा. स्वाति तिवारी

ईएन - 1/9 चार इमली भोपाल

मोबा. - 9424011334

सोमवार, 27 सितंबर 2010

सद्भाव-सौहार्द्र के फैसले                                                       डा. स्वाति तिवारी
आजकल वातावरण में एक भय की अनजानी सी लहर व्याप्त है। हालात 1992 जैसे नहीं रहे। वर्तमान समाज काफी समझदार हो गया है, फिर भी लोग सतर्क हैं - राशनपानी के बन्दोबस्त हो रहा है। पता नहीं, कब कहाँ - क्या हो जाए? साम्प्रदायिक विद्वेष की जो कीमत समान ने चुकाई है, उसके बाद नागरिकों की सतर्कता, उनमें व्याप्त भय की लहर स्वाभाविक है। 28 सितम्बर की तारीख यदि उन्हें डरा रही है, जिस दिन अयोध्या की विवादित भूमि के मालिकाना हक को लेकर उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट की लखनऊ शाखा का निर्णय आना है, तो इसमें अस्वाभाविक खैर कुछ भ्ज्ञी नहीं है।
एक फोन था - 28 के बाद प्रोग्राम रखना - अभी मत भेजना बहू को। 24 के फैसले के बाद देखते हैं कि क्या होता है? गैस की टंकी मंगवा दो, पता नहीं बाद में मिले ना मिले? आते वक्त दूध के पावडर का पैकेट लेते आना, पड़ा रहेगा घर में। ऐसे न जाने कितने संवाद हैं, जो प्रायः सभी घरों में सुनने को मिल रहे हैं और रोज नई-नई आशंकाओं को जन्म दे रहे हैं। हम एक देश में रहते हैं। हिन्दू की गाड़ी का ड्रायवर मुसलमान है। हिन्दू की फैक्ट्री में मुसलमान मजदूर है। मुसलमान व्यापारी है, तो उसका सबसे भरोसेमंद मुनीम कोई हिन्दू है। यही तो है भारत की गंगा-जमुनी संस्.ति, जिसकी तारीफ पूरी दुनिया करती है। कहीं-कहीं तो दो घरों के बीच की एक दीवार है जिस पर एक तरफ राम, लक्ष्मण, शंकर पार्वती के फोटो लगे हैं, तो दूसरी तरफ मक्का मदीना की मीनार वाली तस्वीर है।
एक तरफ आले में कुरान शरीफ रखी है, तो दूसरी तरफ रामायण और गीता। नल एक है, ओटले एक हैं, एक के बिना दूसरे का काम न कभी चला थ, न आज चल रहा है, न भविष्य में चलेगा, पर भय दोनों में व्याप्त है। क्या यह तस्वीर भारतीय धर्मनिरपेक्षता के मूल घोषित लक्ष्य ''सर्वधर्म समभाव'' का चित्र नहीं है? अगर है, तो भय किस बात का है? सांप्रदायिकता ने राष्ट्र की लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष संरचना को गम्भीर चुनौती दी है कि एक दीवार के दोनों पहलू डरे हुए हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ शाखा के फैसले के बाद ऐसा होना क्या है, जिससे समाज डरा हुआ है? सबको पता है कि विवादित भूमि पर स्वामित्व को लेकर पिछले 60 साल से यह मामला अदालत में विचाराधीन है। बीते माह सुनवाई पूरी होने पर कोर्ट ने मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। यह फैसला आना है, एक जमीन को लेकर। यह जमीन सरयू नदी के किनारे आधुनिक फैजाबाद जिले के अयोध्या नगर में है। अगर सरयू नदी की बात करें, उससे किसी ने पूछा कि तू कौन-धर्म है नदी है? धरती से किसी ने पूछा कि तू किस धर्म में जाना चाहती है? फिर फैसले और मुकदमे तो आदमी के अहंकार के होते हैं। लड़ते भी वही हैं और निर्णय भी वही करते हैं। यह सही है कि भगवान राम का अयोध्या में ही जन्म हुआ था, पर आज वह अयोध्या के साथ-साथ हरेक भारतीय के दिल में बसे हैं और ईश्वर की अराधना के लिए मन-मंदिर ही सबसे ज्यादा पवित्र होता है। किसी भी तीर्थ व किसी भी पूजाघर से ज्यादा।
हमारे संविधान निर्माता जब देश को धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद पर खड़ा कर रहे थे, तब आशा की गई थी कि धर्म को सभी नागरिक समझेंगे कि वह है क्या? लेकिन आजकल 'धर्म' शब्द का जिस अर्थ में प्रयोग होता है, उसके साथ सच्चे धर्म का कोई सम्बन्ध नहीं है। धर्म का वास्तविक अर्थ है - वे कर्तव्य, वे कर्म जिनके द्वारा मानव का विकास सम्भव होता है, मानवजाति का भविष्य उज्ज्वल से उज्ज्वलतम होता जाता है। भारत के ऋषियों ने धर्म की चर्चा करते समय न लोक-परलोक का उल्लेख किया है, न आत्मा का, न ही परमात्मा का। उन्होंने धर्म के लक्षणों के नाम पर यम-नियम की बात कहकर सब कुछ मानव मन के विवेक पर छोड़ दिया है - ''धर्मस्य तत्वम निहितं गुह्यायाम्, महाजनों येन गता स पन्थ।'' लोक-समत्त .ष्टि से कहा गया है कि ''परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई।'' कहने का अर्थ यही है कि हम सब धरती पर प्राणी मात्र हैं, न हिन्दू हैं, न मुसलमान हैं।
मानव मात्र का एक ही धर्म है वह है मानवता, इन्सानियत। इमारतों और जमीन के आधिपत्य के लिए उसके मन्दिर या मस्जिद होने के लिए क्या मानवता को ताक पर रख दिया जाना चाहिए? धर्म मन का होता है, लेकिन हम उसे मजहब, पंथ, सम्प्रदाय, मिल्लत के रूप में आडम्बर में बदल देते हैं। धर्म संस्थागत नहीं होते, बल्कि आस्थागत होते हैं। आस्था व्यक्ति में, उसकी आत्मा में निवास करती है, किसी जगह या इमारत में नहीं। जमीन का धर्म, भूमि का धर्म केवल एक होता है और वह है, उस पर जन्म लेने वाले को जगह देना, पोषण देना और अंत में खुद में समाहित कर लेना। भूमि किसी मंदिर की हो या मस्जिद की या फिर किसी और पूजास्थल की, वह भारत की है, केवल भारत की। उसे सभी की मान लेना चाहिए।
मतलब, अयोध्या विवाद पर चाहे कोई भी फैसला आए, समाज को हर हालत में सद्भाव-सौहार्द्र और शांति बनाए रखनी होगी, पर अभी फैसला आया भी नहीं है और आतंक पसर गया है। बचपन के अजीज दोस्त अहमद और किशन दूर-दूर हैं, नज़रें चुरा रहे हैं। अहमद अन्दर से दुखी भी है, क्योंकि उसकी अम्मी जब अस्पताल में थीं तो किशन ने एक हफ्ते तक सगी माँ की तरह देखभाल की थी। अहमद तो कोलकाता से जब आया था, तब तक अम्मी अस्पताल से घर आ गयी थीं और जब किशन की नौकरी छूट गयी थी, तो नए बिजनेस के लिए अहमद ही था, जिसने साथ दिया था। अयोध्या तो दूर है, उनके शहर से बहुत दूर, पर उनके रिश्ते करीबी हैं। एक फैसला उनके बचपन के लंगोटिया यारों को कैसे अलग कर सकता है? कल ही की तो बात है विनोद अपने पिता से कह रहा था बाबा मेरी शादी में बशीर का बैण्ड और खान साहब की घोड़ी ही बुलवाना कैसे शान से चलती है?
वहीं, रजिया की जिद है कि वह अपनी शादी का जोड़ा विमल भाई की दुकान से ही लेगी, उसे वहीं के कपड़े पसंद हैं। क्या कोई कह सकता है कि हम हिन्दू हैं, इसलिए बशीर का बैंड नहीं बजवाएंगे। हम मुसलमान हैं, इसलिए विमलभाई से कपड़ा नहीं लेंगे। जिन फूलों का सेहरा या गजरा बनता है, वे फूल न हिन्दू से पचिचित हैं, न मुसलमान से, इसलिए इस वक्त हम सब भी एक हैं। सद्भावना से बड़ा धर्म कोई नहीं। अमन और शान्ति ही हमारे विकास का मार्ग है। हमें ईश्वरने जो पहचान दी है, वह यह है कि हम मनुष्य हैं। न हमारे रक्त के रंग में अंतर है, न शारीरिक वनावट में। यदि ईश्वर मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद करना चाहता होता, तो वह कुछ तो हमारी शारीरिक बनावट में ऐसा भेद करता ही कि हिन्दू को अलग और मुसलमान को अलग से पहचाना जा सकता होता। हमें इस बात को ठीक से समझें, ताकि सरकारों को अपनी ऊर्जा सद्भाव बनाने में खर्च न करनी पड़े। प्रेम से रहने की जिम्मेदारी नागरिकों की है, हम उसे उठाएं भी।

डा. स्वाति तिवारी

शनिवार, 25 सितंबर 2010

डर




सुहाग पड़वा का व्रत था। सुबह पूजा करके परिवार के बुजुर्ग नाते-रिश्तेदारों के यहाँ चरणस्पर्श करने की परम्परा है। मैं उसी परम्परा का निर्वाह करते हुए आशीर्वादलेने अपने पिताजी के अभिन्न मित्र के घर पहॅुंची। दरअसल इस शहर में वे मेरे मायके की भूमिका निभाते हैं। मैं उन्हें काका-काकी कहती हॅूं। वे पिताजी की ही उम्र के हैं-यॅूं भरापूरा परिवार है पर बेटे नौकरयों पर ओर बेटियाँ अपने घर। बस बंगलेनुमा उस पुश्तैनी मकान में वे पति-पत्नी अकेले छूट गए हैं। इतने साल साथ रहते हुए पत्नी के प्रति एक नीरसता पसर जाती है। पत्नी के मन में अबभी उनके प्रति अपने कर्तव्यों का लगाव बरकरार है। या हो सकता है वह उन सबकी आदी हो गई हैं। पति के प्रति वे गजब की सजग हैं। रोटी-पानी, पूजा-पाठ, दवा-सेवा, कपड़े-लत्ते सब जरूरत वे ही पूरी करतीं और बिल्कुल वैसे ही जैसे हमेशा करती रहती थीं। शायद उनके चेहरे पर बढ़ापे की रेखाऍं इसीलिए कम दिखती हों क्योंकि उनके ऊपर दायित्व है।

घर जमींदारी के वक्त का है। भरा हुआ हे। रजवाड़े के जमाने का भारी भरकम फर्नीचर है, ढेर सारा सामान ऐसा है जो अब उपयोग में नहीं आता पर कबाड़े में बेचा भी नहीं जाता। बच्चों ने नए जमाने के हिसाब से उन्हें बहुत-सा सामान नया ओर दिलवा रखा है और इन सबके चलते उनकी स्थिति इनके उपयोग से ज्यादा इनकी पहरेदारी की हो गई है। जब भी बहुऍं आतीं वे काकी से कहतीं कि अनावश्यक सामान की छॅटनी कर देते हैं और कबाड़ी को दे देते हैं पर छाँटते वक्त कभी किसी सामान को काका रोक लेते, ''अरे, इतनी मजबूत लकड़ी का बना पलंग है, शीशम पर नक्काशी का पलंग आज बनवाने जाओ भाव पता चल जाएगा।'' कभी किसी सामान को काकी रोक लेतीं, ''यह बड़ा सन्दूक मेरी सास के हाथ है कितने साल इसमें मेरी शादी का जोड़ा रखा था।'' सन्दूक फिर जगह पर जम जाता। ''कैरम बोर्ड'' वह भी पुराना भारी भरकम, गर्मियांे में बच्चे आ जाऍं तो कुछ तो चाहिए। और ऐसी जाने कितनी यादें, जरूरतें, मूल्य, महत्व, भविष्य की योजनाऍं सामने दिखतीं और सारा सामान अपनी जगह फिर बना लेता सिवाय अखबार की रद्दी और तेल घी के खाली कनस्तरों के। और काका-काकी उस घर मालिक कम चौकीदार की तरह हो गए हैं।

छोड़िए उनके घर और मूल्यावान वस्तुओं के चक्कर में कहीं मैं उनके बारे में बतना ही न भूल जाऊँ। तो सुहाग पड़वा के चरण स्पर्श के बाद देखा हमेशा चाँदी की तश्तरी में आने वाला नाश्ता अबकी बार चीनी मिट्टी के प्लेट में आया था। थोड़ा आश्चर्य हुआ फिर काकी के गले पर नजर गई तो वहाँ सोने की मोहनमाला की जगह केवल काली पोत का मंगलसूत्र झूल रहा था। ध्यान चला ही गया सो पूछे बिना नहीं रह पाई, ''काकी तुम्हारे गले की माला ?''

वे कान में खुसर-पुसर करती आवाज में बोली, ''तेरे काका सठिया गए हैं। कहते हैं इत्ता सोना लाद कर घूमेगी तो लूटपाट में मारी जाओगी। सब अन्दर लॉकर में रखवा दिया है। अब इस उमर में ये नया डर ?'' हाँ...आजकल जमाना बहुत खराब है।'' मैंने भी हाँ मं हाँ मिलाते हुए कहा। पर सामने बैठे काका ने चुप रहने का इशारा करते हुए मुझे अपने पास बुूला लिया। काकी चाय बनाने चली गई तो उन्होंने धीरे से पलंग की गद्दी के नीचे रखे अखबार को निकाला, मुख पृष्ठ पर शहर में हुई लूट और हत्या की खबर थी। 'वृद्ध दम्पत्ति की हत्या'' शीर्षक से छपी यह खबर मैंने भी पढ़ी थी। अखबार चार दिन पुराना था। डर जाएगी। रात भर बैठी रहेगी। जब इसे मैंने पढ़ा तो मैं अन्दर तक दहल गयी। बुढ़ापे में भी सुरक्षा नहीं है। घर में कामवाली बाई आती है-पता नहीं बाहर जाकर किसी को क्या बता दे। कब किसकी नीयत बदल जाए।''

काकी चाय के कप लेकर लौटीं तब तक अखबार गायब। पूछने लगीं, 'क्यार बता रहे थे तेते काका ?' मैंने बात बदलते हुए पूछा, ''आप दोनों भैया-भाभी के पास क्यों नहींं चले जाते ?''

मेरी बात उकने अन्तरमन को चोट कर गई। अचानक मुझे लगा उनके चेहरे पर झुर्रियाँ इन दिनों कुछ ज्यादा ही बए़ गई हैं। वे भरभराती आवाज में बोले, ''पप्ू का फोन रोज ही आता है और नन्दू का रविार को। पर दोनों हालचाल पूछ लेते हैं। ज्यादा हुआ तो कहेंगे आप यहाँ आ जाइए। डॉक्टर को दिखा दॅूंगा। आई को थोड़ी राहत मिल जाएगी।''

''तो चले जाइए ना आप दोनोंं।'' मैंने आग्रह किया।

वे एकाएक उठकर खड़े हो गए। फिर दरवाजे से बाहर देखते हुए बोले- आ जाइए कहता वह पर आकर ले नहीं जाता कि बाबा आपको और आई को लेने आया हॅूं। आपको चलना ही पड़ेगा। आग्रह और मान-सम्मान भी तो कोई चीज है। इसका क्या ? इसको तो बहू साल में दो नई साड़ी भेजती है- बस हो जाती है निहाल बेटे-बहू पर। अगर वह सचमुच चाहता है मॉ-बाप को और हमारी इत्ती चिन्ता है तो यहाँ चौकीदारी के लिए क्यों पटक रखा है।

घर को यॅूं पटक कर खँडहर तो नहीं होने दे सकते न। परदादा के हाथ के पूजे देवी-देवता बैठे हैं देवल में-अब उनका दिया-बाती भी तो करना जरूरी है। बच्चे नौकरी करें कि इनकी जिद पर यहीं बैठे रहें। काकी बात सँभालती है। शहर आजकल बिगड़ता जा रहा है तू भी अकेली मत आया-जाया कर। काकी ने मेरे अकेले घूमने पर चिन्ता जाहिर की। वे उठकर सब्जी छौंकने लगी। तो मैंने फिर पूछा, ''आजकल राघव नहीं आता क्या ?'' तेवर चढ़ाते हुए काकी बोलने लगी, ''तेरे काका को मेरा फुर्सत से रहना रास नहीं आता न तो भगा दिया उसको भी।''

''क्यों ?''

-उन्हीं से पूछ। कहते हैं उसके खाने से पेट में जलन होती है। और रोज ही कुछ न कुछ माँगता, ये बक्सा खाली पउ़ा है दे दो। कभी कहेगा पत्नी रोटी बनाने में टाइम लगाती है तो आपके पास दो गैस कनेक्शन हैं एक दे दो। बस वह सारा समय यह देखता है कि हमारे पास क्या चीजें डबल-डबल हैं या फालतू हैं। उसकी नीयत हमेशा सामान बटोरने में लगी रहती। नहीं दो तो पटका-पटकी, चिड़चिड़ाता रहता। दो फुलके इनके, दो मेरे यॅूं ही डाल सकती है ये। बैठी-बैठी क्या करती हैं सारा दिन। काका कुर्ता उतर कमीज पहनने लगे फिर तैयार होकर छड़ी हाथ में ले बोले, ''तू बैठी है तब तक मैं जरा नक्कड़ तक हो आता हॅूं बैंक से पेंशन लेनी है।''

पर वे पाँच मिनट में ही लौट आए। मैंने आश्चर्य से पूछा, ''काका वापस क्यों लौट आए ? कुछ भूल गए क्या ?''

''नहीं रे । पेंशन लेकर आटो से आना खतरनाक है। कया पता आटो वाला ध्यान रखे कि बैंक से लौट रहा हॅूं।''

''चलो मेरी गाड़ी से मैं चलती हॅूं साथ। '' मैंने उनकी मदद करनी चाही।

''नहीं, फिर यहाँ यह अकेली रह जाएगी। कल जब कौशल्या आएगी बर्तन मॉजने, तब पास वाले बब्बू के स्कूटर पर जाकर ले आऊँगा।''

मैं स्तब्ध थी। तो क्या काका-काकी भावनात्मक तनाव के शिकर हो रहे हैं। उनमें असुरक्षा की भावना इस हद तक बढ़ रही ंहै कि वे भरी दोपहर में चौराहे की बैंक तक जाने और महज आधा घण्टा पत्नी को घर में अकेला छोड़ने में डरने लगे। ये वहीं काका हैं जो टूर पर जाते थे तो हफ्ता पूरा करके लौटते थे। काकी सँभालती रहती थी घर। मुझे लगा काकी के प्रति उनकी नीरसता दिखावा है दरअसल वे काकी से बेहद प्यार करते हैं । और उन्हें भय मुक्त रखना चाहते हैं। शायद अकेले इतने बड़े शहर से निपटने से वे कतराने लगे हैं। सम्भवतः वृद्धावस्था में उनका अचेतन मन, चेतन मन की तुलना में अधिक क्रियाशील हो गया है। और उन्हें अन्दर ही अन्दर दुर्बलता और भय घेरने लगा है।

पास वाले बंगले में मिस्टर पाण्डे रहते रहे हैं पर वे अब खुद के घर में शिफ्ट करने वाले हैं। अब काका को चिन्ता यह है कि पता नहीं पड़ोस में कौन आएगा ?

एक हफ्ते बाद फिर चली गई काका के घर। काका ने अब अपनी आराम कुर्सी बरामदे में इस एंगल से लगा ली कि पउ़ोस का बंगला उनहें दिखता रहे- ''काका आज आप यहाँ बैठे हैं।''

''हाँ रे-खाली पड़ा मकान भुतहा होता है कब कोई घुस जाए घर में और रात-बिरात छत से इधर आ जाए तो। अच्छा बता कोई सिक्योरिटी गार्उ है तेरी नजर में ?''

''क्यों ?''

''रात के लिए लगवा लेता हॅूं जब तक पड़ोस भी खाली है। फिर देखेंे अगर अच्छा पड़ोसी आ गया तो भगा देंगे ।''

''मैं देखती हॅूं'' कहकर काकी के पास उनके कमरे में चली गई। मुझे देख वे मुस्कुराने लगीं। ''हाँ तेरी आवाज आ गई थी मुझे।''

''हाँ काका से बात कर रही थी। '' मैं भी काकी के सााि मेािी तोड़ने लगी।

''आजकल तेरे काका की नौकरी लग गई ।'' वे बच्चों की तरह भोलेपन से बोलीं।

''क्या ?''

''देखा नहीं चौकीदारी कर रहे हैं पड़ोसी की प्रापर्टी की। वहीं बैठे रहते हैं ऊँघते हुए।''...घर लौटते सारे रास्ते मन खिन्न था। काका असुरक्षा के भाव से इस तरह घिरने लगे हैं शायद वे मनोविक्षेप की ओर बढ़़ रहे हैं। मनोविक्षेप तीन प्रकार के रोगों के कारण होता है और चिन्ता, अनावश्यक चिन्ता यह एक रोग में बदल जाती है, वे चिन्ता के चलते संवेगात्मक द्वन्द्व और तनाव की दशा से गुजर रहे हैं, यही है अकेलेपन की आहट...



डा0 स्वाति तिवारी

गुरुवार, 23 सितंबर 2010




एक नया रिश्ता

डा. स्वाति तिवारी



'' हॉल के बीच वीच वाले खम्भे पर गेंदे के फूलों की लड़ियाँ बॉधवा लेते हैं, क्यों काका ? ''

'' हॉ बिटिया, अच्छे लगेंगे । ''

'' यहाँ रंगीन बल्बों की झालरें ठीक रहेंगे,और गैट के पास हरे-भरे पौधों से सजावट करवा देते हैं । ''

'' बिटिया, वो टेंटवाला आया है, लाइट कितनी लगवानी है ?'' रामू काका ने अनुभूति को बताया ।

'' आई काका,वहीं आकर बताती हॅू । ''

'' ठीक है बिटिया, जल्दी,जल्दी आकर बता दो ये जल्दी मचा रहे हैं । ''

'' हाँ, अब बताइए ! देखिएं उपर शामियाने में बडेत्र बल्ब और गार्डन के बाउण्ड्री वाले पौधों पर और इन सभी प्लांट्स पर टिमटिमाते लट्टेू ।''अनुभूति ने टेंटवाले से सजावट व लाइटिंग का निर्धारण सा करते हुए कहा ।

'' मैडम, यह तो बहुत कम हैं । पिछली बार तो इससे ज्यादा लाइट लगवाई थी । '' टेंट हाउस वाला अपना बिजनेस देख रहा था ।

'' नहीं.........नहीं..........माँ को ज्यादा जगमगाहट पसंद नहीं हैं ।''

'' अच्छा ..........जैसा आप ठीक समझें, पर वेलकम वाले गेट पर रोशनी जरूरी होती है । अगर आप कहें .........''

'' नहीं, नहीं । बस, बहुत है ।'' अनुभूमि ने झुंझलाते हुए कहा ।

'' अरे अनुभूति बेटा,प्रवेशद्वार पर कलश कौन संभालेगा ? बड़ी बुआ पूछ रही थीं । एक वे ही तो आई थी ं इस शादी में, अनुभूमि की मदद करने ।

'' मैं संभाल लूंगी बुआ ! ''अनु ने बच्चों से उत्साह के साथ कहा ।

''पर बेटा, क्या ऐसा करना ठीक रहेगा ? बुआ ने संशय के साथ पूछा था । वही व्यवस्थाए सब कुछ वही है । वैसा का वैसा, किसी चौखट पर बंधे चित्र की तरह, पर पात्र बदल गए हैं । हॉल के उसी लैम्प के प्रकाशवृत्त के नीचे आज अनुभूति खड़ी है, कल जहाँ माँ खड़ी थी । तपती धूप में कलसाता चेहरा लिए । गेस्ट हाउस के सामने वही छोटा सा बंगला है, जहाँ मधुमालती की झूलती लता थी,जूही और रातरानी से महकता एक छोटा सा घर, जो खुद भी महकता था, कभी अनुभूति की बातों से तो कभी पापा की बाँहों में माँ की सॉसों से । आज भी वहीं बँगला है, बीस वर्षो के अन्तराल के साथ, जहाँ मधुमालती की लता भी है और जूही एवं रातरानी की खुशबू भी । पर यदि नहीं है तो बीस वर्षो से वहाँ जीवन की सजावट नहीं है । इसलिए नहीं है,क्योंकि निगल गया था मृत्यु का अजगर उन बाँहों को, जो माँ और बेटी को अपने में समेट लेती थीं । हाँ, पापा के ना होने का अहसास पल-पल महसूस होता था उन्हें ।

सूनापन सब तरह से लगता रहता था, कभी माँ की सफेद साड़ी में, सूने रह गए खाले गले में हाथों की कलाई में । पर जीवन है जिसे इन सबके बगैर भी वे दोनों जी रही थी । क्यों........और कैसे, यह अलग बात है, पर जी रही थीं वे दोनों, अपनी पूरी जिवीविषा के साथ । एक दूसरे का सहारा बनकर

एक ऐसी कहानी जो कहानी है ही नहीं, क्योंकि इसमें घटनाओं और पात्रों का स्थूल या सूक्ष्म अंकन महत्वपूर्ण नहीं है । यह किस्सागोई भी नहीं है, ना ही यह बयानबाजी है । पर इसमें जो है, जीवन का मर्म है, जीवन मूल्य है और संवेदना का स्पर्श है ।

जे दृश्य अभी सामने था, वह शादी की तैयारी का है । एक ऐसे विवाह का, जिसको बेटी सम्पन्न करा रही है, अपनी माँ की शादी करवा रही है । वह जुटी हुई है जूझते हुए उन तमाम विरोधों और तानों से, जो परिवार के ही लोग दे रहे हैं । ऐसे लोग, जो उसके अपने कहलाते है, दादी, काका-काकी, नाना-नानी, माम जैसे कितने ही रिश्ते हैं जो उसकी पीड़ा से दुखी तो थे, पर पीड़ा से मुक्त होने देना नहीं चाहते थे ।

क्या रिश्ते वही होते हैं जो खून के संबंधों से जुडे होते हैं ? क्या वे रिश्ते नहीं हैं जो माँ के सहकर्मी अकाउण्ट सेक्शन वाले गुप्ता अंकल से हैं । माँ की बुजुर्ग सहकर्मी मिसेज जोशी ने जो उन्हें दिए हैं अनुभूति उन्हें भी नानी कहती है । सब खुश हैं, अनुभूति की मदद कर रहे हैं । इसी रिश्तों की नई परिभाषा ने अनुभूति में दुगने उत्साह का संचार कर डाला था जब अनुभूति ने गुप्ता अंकल से माँ की शादी की बात की थी, उसने अंकल से राय ली थी ।

अबकी बार जब अनुभूति मुम्बई से इंदौर आई तो उसे माँ में एक बदलाव महसूस हुआ था । माँ चुपचाप रहती हैं घर में । उदास माँ अनुभूति को अच्छी नहीं लगती । एक दिन माँ ने उसे बताया कि घर में बोलने की आदत ही नहीं रही, किससे बोलू ? बातचीत के अंतरंग क्षणों में एक रात माँ रो रही थी । यह कहते हुए कि अब उन्हें यहाँ अकेले रहना अच्छा नहीं लगता । '' अनुभूति, जानती है तू, आजकल हमारे जो नए बॉस आए हैं ना, वे बिलकुल तेरे पापा जैसे लगते हैं । ''

''अच्छा दिखने में ? ''

''हाँ । वही हाइट,हेल्थ,वैसा ही लुक । काम में भी वही स्टाइल है ।''

'' तुमसे बातें हुई ? ''

''हाँ, कभी-कभी । ''

''शादीशुदा हैं ? कैसी है उनकी पत्नी उनके बच्चे? अनुभूति को जिज्ञासा हुई।

''उनसे बात करने पर मुझे लगता है, जैसे मैं उन्हें पहले से जानती हॅू । माँ के चेहरे पर एक ठहरा हुआ शान्त भाव था ।

''पत्नी, बच्चों से मिली क्या ? ''

''नहीं रे..........बिचारे के बच्चे तो अमेरिका में सेटल हैं और पत्नी तलाक ले गई है । ''

''अच्छा......... ?''

'' माँ, क्या तुम्हें वे पसन्द है ?'' अनुभूति ने सीधा सपाट प्रश्न कर डाला ।

''हट पगली ! इस उम्र में क्या पसंद ? ''

अनुभूति अगले दिन गुप्ता अंकल से मिल थी '' अंकल, माँ एकदम अकेली हो गई है, मेरी शादी के बाद से । ''अनुभूति ने बात आरंभ की ।

'' हाँ बिटिया ! जानता हॅू, भाभी एकदम अकेली हो गई हैं, पर लगता है वे अभी भी उसके साथ है ।''

'' हाँ अंकल ! वे अब भी पापा की उपस्थिति को महसूस करती हैं, क्योंकि पापा उनके मन में हैं । उनकी यादों में है, उनकी बातों में है ।'' अनुभूति ने नम आँखों के कोर पोंछे थे ।

''अनुभूति बेटा, जीवन यादों से लम्बा नहीं होता, छोटा हो जाता है । रूक जाता है उसमें समय का प्रवाह । '' गुप्ता अंकल कहने लगे ।

'' जी............ मैं समझती हॅू इस ठहराव को । अपने जन्म से लेकर विवाह तक मैं भी उसी ठहराव का हिस्सा थी । जीवन का प्रवाह महसूस ही नहीं हुआ था, पर जीवन चलने के साथ चलता है । यह बात शादी के बाद ही समझ पाई हॅू । पर माँ अब भी वहीं हैं । वह यह बात समझना ही नहीं चाहतीं । '' अनुभूति के स्वर में गंभीरता थी,'' अंकल, माँ घर में एकदम चुपचाप रहती हैं ।''अनुभूति ने समस्या रखी तो आश्चर्य हुआ गुप्ता जी को ।

'' तुम्हें सुनकर आश्चर्य होगा अनुभूति,भाभी दफ्तर में लगातार बोलती हैं । स्टाफ के लोग तरस खाकर सुनते हैं, उनके अतीत को, पर कब तक ?''

''पर ऐसा कैसे हो सकता है अंकल ? ''

''उन बातों को रहने दो अनुभूति ! दरअसल अब उनमें अलग खड़े रहने की ताकत कम होती जा रही है । यादों के वे प्रसंग उन्हें बार-बार वहीं ले जाते हैं जहाँ दर्द ही उनके निकट होता है । आज दर्द के इतने निकट न होने पर भी इतनी जल्दी और बार-बार वहीं कैसे पहुंच जाती है वे ?'' अंकल माँ को लेकर काफी चिन्तित लगे ।

'' ऐसा क्यों अंकल ? कहीं माँ मेण्टल प्रॉब्लम में तो नहीं हैं वे डिप्रेशन में तो नहीं ? '' अनुभूति परेशान हो उठी ।

'' बेटे, अभी तो वे डिप्रेशन में नहीं हैं पर शायद लम्बे समय तक अकेली रहेंगी तो हो सकता है । अक्सर मैं महसूस करता हॅू, जाने कैसे नए सिरे से भाभी के फफोले रिसने लगते हैं ! बोलते हुए वे कभी-कभी कातर हो जाती हैं । अतीत की दारूणता मेंे उनके लाचार हाथ बढ़ने लगते हैं । उन्हें स्मृति में भटकते हुए देखते हैं सब लोग । भाभी के जीवन में दर्द के आवेश का रॅूंधा हुआ क्षण बार-बार आ जाता है । मैं समझता हॅू इसका कारण यह है कि पहले उनके पास तुम थीं । उनके जीने का सहारा, उनके भविष्य के रूप में । उनके जीवन का मकसद थीं तुम । घर आबाद था । तुम उनके अकेलेपन को बांटती थीं, रिक्तता की पूर्ति बनकर । वे तुमसे इतना बोल - बतिया लेती थीं कि उनके मर के, उनके दिलो-दिमाग के सभी प्रवाह तुम्हारे रूप में गतिवान थे । वह भी मनुष्य हैं और एक स्त्री जो भावनाओं,विचारों और संवेदनाओं से भरी हुई, जिसका आदान-प्रदान एक सहज प्रवृत्ति है । उनका वही प्रवाह एकाकी हो गया, तुम्हारी शादी के बाद । घर मंें अकेली संवादविहीन रहती हैं, इसीलिए दफ्तर में उसकी पूर्णता ढूंढती हैं । पर लोग कतराने तथा उकताने लगें,यह तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा ।''

'' जी अंकल, क्या हम माँ को अकेलेपन से बचा सकते हैं ? अंकल मैं सोचती हॅूं हम माँ को विवाह के लिए तैयार करें । ''

''पर इस उम्र में ?

'' अंकल, आपके ब्रांच मैनेजर मिस्टर शर्मा भी तो तलाकशुदा हैं ।क्यों ना उनसे बात की जाए ? ''

'' पर क्या वे तैयार होंगे ?

मैं बात करना चाहती हॅू उनसे, अभी इसी वक्त । ''

'' बेटे, बात मैं कर लूंगा , पर क्या भाभी तैयार हो जाएगी ? क्या तुम्हारे पति, सास ससुर समाज इस बात को स्वीकारेंगे ?

'' मैं सबको समझा लूंगी । दुनिया कहाँ से कहाँ पहुंच गई है । ''

'' बहुत अच्छा बेटा ! तुम धन्य हो, माँ के बारे में इतना सोचती हो । भाभी चाहती तो 20 वर्ष पहले, जब वे युवा थीं तभी दूसरी शादी कर सकती थी ं। पर तब तुम थीं, एक दायित्व की तरह । पर अब भी वे मात्र बयालीस वर्ष की हैं, एक लम्बा अकेलापन उनके सामने है, हम बचा सकते हैं उन्हें । ''

घर जाकर अनुभूति माँ से बात करती रही और उसने उन्हें मिस्टर शर्मा के प्रति सकारात्मक सोचने पर मजबूर कर दिया । अनुभूति को लगा था, माँ बुरी तरह रिएक्ट करेंगी । पर माँ मान गई । नहीं माने थे दादा-दादी,नाना-नानी । केवल बड़ी बुआ ने हाँ की थी ।

अनुभूति ने माँ के विवाह की तमाम जवाबदारी ले ली । अनुभूति के विवाह के वक्त मैने महसूस किया था कि अनुभूति और उसकी माँ के अन्दर कितनी ही इच्छाएं दबी-कुचली हुई हैं । माँ में भावनात्मक प्रवाह को बेटी की खुशी बनकर प्रवाहित होते देखा था मैने ।

'' अरे इला.........ये देख, लाल साड़ी कितनी सुन्दर है । '' वे अपने तन पर पल्ला डाल शीशे में देख लेती हैं उनके चेहरे पर एक अजीब हलचल होते देखी थी मैने ।

'' तेरे अंकल होते ना तो जरूर मैं यह साड़ी पहनती शादी में । '' उनके मन में एक उदासीनभरे इससे पहले ही उन्होंने उसे पैक करवा लिया अनुभूति के लिए ।

लल,पीले,हरे-भरे रंग उनके चेहरे के उतरे रंग को बदरंग ना करें, इसीलिए उन्होंने वे तमाम शोख रंग बेटी के लिए ले लिए । मैने टोका था उन्हें'' आजकल इतने शोख कलर नहीं चलते । ''

अनुभूति ने रोक दिया था मुझे, माँ को टोकना मत, बरसों से दबे रंग उनमें जागे हैं । उनके अन्दर के उत्साह को चोट लगेगी यह जानकर कि वे दुनिया से पिछड़ रही हैं । ''

मैं अवाक थी, बेटी के मन में माँ के प्रति इस लगाव और समझ को देखकर । उन माँ बेटी को मैने पूरे विवाह उत्सव में खुश होते देखा था, और पाया था वहां 20 वर्ष पहले अतीत बन चुका एक व्यक्ति हर पल मौजूद था । एक पति, एक पिता को यॅूं हर साँस के साथ उनके दिल में धड़कते पाया था मैने जो लगातार जिन्दा रहा उनके ख्वाबों में । उस चमकको आँखों में आते-जाते देखा है मैंने कभी वह साड़ी के कलर में याद आ जाता तो कभी भोजन की लिस्ट,मिठाई तय कर रहा होता, तेरे पापा को यह कलर पसन्द था, अमन का सूट इसी कलर का लेते हैं, क्यों अनुभूति !

''हाँ ममा, पापा को टाई में रेड कलर पर ज्यामेट्रीवाला डिजाइन पसन्द था ना, बस वही ले लो ।

इस तरह वे हर जगह मौजूद थे । पर कब तक ?अनुभूति की पसन्द अमन की पसन्द में बदल गई थी । अनुभूति का बचपन विक्की में लौट आया था माँ, मिसेज वैद्य उम्र के अदृश्य दस वर्ष और आगे बढ़ती चली गई । तमाम अटकलों,विवादों और ना नुकर के बाद उन्होंने अनुभूति और अमन की इच्छा कहकर पुनर्विवाह स्वीकारा था । ढलती उम्र में एक नए रिश्ते का सच ।

माँ की हाँ होते ही अनुभूति और अमन अचानक बड़े हो गए थें, विवाह का दायित्व निभाने को तैयार । एक साधारण समारोह में विवाह सम्पन्न हुआ । पूरा स्टाफ शादी में शामिल हुआ था । हर कोई रिश्ते को अपनी नजरों से तौल रहा था । पर मुझे लगा, कितना पवित्र था वह रिश्ता,जिसे बड़े होते बच्चों ने रोपा था । अनुभूति को मिले थे नए पिता और विक्की को पहली बार नाना । एक सम्पूर्णता पा जाने की आत्मतृप्ति थी सबके चेहरे पर ।

मिसेज वैद्य के मन से नए परिवार को लेकर संशय के सभी बादल छँट गए थे ''अनुभूति, बहुत सुलझे हुए हैं मिस्टर शर्मा,बिल्कुल तेरे पापा की तरह । ''

विवाह के बाद सब कुछ सामान्य-सा हो चला था । अनुभूति और अमन ने उन्हें पहाड़ों पर घूमने और देवी -दर्शन को भेजा था '' मम्मा आप दर्शन कर आइए, मैने मन्नत मानी थी । ''

हफ्ते भर की यात्रा थी । लगभग रोज ही अमन अनुभूति से वे फोन पर बात करते थे । पर ईश्वर जाने क्या चाहता था । लौटतिे वक्त उनकी कार का एक्सीडेंट हो गया था । मिस्टर शर्मा एक नर्सिंग होम में एडमिट थे । मिसेज शर्मा...........।

सुबह-सुबह अनुभूति का मेरे पास फोन आया था '' इला, माँ और पापा का एक्सीडेंट हो गया है ।'' वह रूआँसी आवाज में इतना ही बोल पाई और रूलाई फूट पड़ी थी ।

''क्या ?''

'' हाँ इला, एक अस्पताल से फोन आया है, पापा सीरियस है और माँ....। तुम ताला तोड़कर घर खोल लो तैयार रखना मैं लेकर आती हॅू ।

श्रात तक अनुभूति और अमन लेकर लौटे थे माँ की डेड बॉडी । तमाम व्यंग्यों,तानों, उलाहनों के बावजूद एक दृढ़ निर्णय लेने वाली अनुभूति को यॅूं बिलखते देखा था मैने । जीवनभर अजीज रही माँ, बचपन से लेकर आज तक सब कुछ रही माँ, एक दोस्त, एक संरक्षक सभी कुछ थी । वहीं आज केवल डेड बॉडी बन गई थी । उसने कितने चाव से माँ के जीवन में रंग भरना चाहे थे, पर विधाता.......।

अनुभूति और अमन माँ का अंतिम संस्कार करने की तैयारी जल्दी-जल्दी कर रहे थे ।

माँ को सुहागन के वेश में तैयार किया गया । सजी सँवरी उनकी देह, उनका चेहरा इतना सजीव लग रहा था कि लगता है । ' पर सब-कुछ शान्त था । वह शान्त सौम्य चेहरा ! उस चेहरे को मैं कभी नहीं भूल पाई । क्या था उस चेहरे में ? आत्मतृप्ति थी, आत्ममुग्धता थी, सुहागन की पवित्रता थी, एक संतृप्त चमक और और असीम शांति थी ।

अनुभूति और अमन रात को ही फिर चले गए । लौटे थे पन्द्रह दिनों के बाद पापा को नर्सिंग होम से लेकर । एक माह रही अनुभूति उनके पास ।वह दिन है और तब से लेकर आज का दिन है, वह नया रिश्ता अब भी महक रहा है । विक्की अब नवीं कक्षा में है । अनुभूति के दो बच्चे और हैं, एक बेटी पारूल और छोटा बेटा राहुल ।

गर्मी की छुटि्टयों में मिस्टर शर्मा का बंगला पूरे समय चहकता है । गॅूंजती है वहॉ विक्की, पारूल और राहुल की किलकारियाँ ।

''नानाजी, मैं पिज्जा खाउँगा । '' यह शायद विक्की है ।

''नानाजी, मुझे घोड़ा-घोड़ा खेलना है । '' और मिस्टर शर्मा राहुल को पीठ पर बैठाकर बाहर के लॉन में घोड़ा बन जाते हैं ।

''पापा,क्या कर रहे हैं आप ? अनुभूति डाँटती है उन्हें ''ये कोई उम्र है, इस तरह घोड़ा बनने की । ''

''कुछ नहीं अनु, बच्चों के साथ खेल ही रहा हॅू । ''

''चलो उतरो रे ! उधम-मस्ती नहीं चलेगी । पापा, सेहत का कुछ तो खयाल रखिए । आपने ब्लड प्रेशर की गोली ली ? '' यह मायके आई मिस्टर शर्मा की बिटिया अनुभूति की चिन्ताभरी आवाज है ।

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डा. स्वाति तिवारी

पता ईएन 1/9 चार ईमली

भोपाल (म.प्र.)