शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

‘‘रियलिटी शो एवं सामाजिक जीवन मूल्य’’


 स्वाति तिवारी

एक समय था जब आम घरों में एक रेडियो हुआ करता था, जो अपने निर्धारित समय पर राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय समाचार का प्रसारण करता था और शेष समय मनोरंजन के कार्यक्रम जैसे फरमाइशी गीत, बिनाका गीतमाला, हवामहल, महिलाओं के कार्यक्रम और जानकारीवर्धक जैसे खेती गृहस्थी, कृषक जगत, जान है जहान जैसे कार्यक्रम देता था। हवामहल पर नाटक का प्रसारण होता था जो पूरा परिवार एक साथ सुन सकता था। फिर आया दूरदर्शन लोगों ने कहा ये तो जादू का पिटारा है। लोगों में उत्साह और जिज्ञासा थी दूरदर्शन के प्रति। साफ सुथरा ‘‘हम लोग’’ 15 जुलाई 1984 से प्रारम्भ हुआ जो पहला सोपओपेरा एवं प्रायोजित कार्यक्रम था मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखित 156 किश्तों वाला यह धारावाहिक मध्यमवर्गीय परिवार की दास्तान था। फिर बुनियाद रामायण, महाभारत जैसे लोकप्रिय धारावाहिक आने लगे। ये कार्यक्रम घर के ड्राईंगरूम में परिवार की तीन पीढ़ियाँ और पड़ोसी मित्र भी बैठकर एक साथ देखा करते थे और आज? मल्टीचैनल युग में रियलिटी शो के नाम पर जो कुछ दर्शकों को परोसा जा रहा है उसे पूरा परिवार, मित्र और पड़ोसी तो छोड़िये पति-पत्नी भी अपने बेडरूम में एक साथ देखने से कतराने लगे हैं। रियलिटी शोज के जरिये जो दिखाया जा रहा है वह क्या है और क्यों दिखाया जा रहा है? मनोरंजन के नाम पर मौत, अवसाद, मानसिक विक्षिप्वता और आत्म हत्या की घटनाएँ? हम किसी टेलीविजन रियलिटी शो से ऐसे नतीजों की उम्मीद नहीं करते। पर ऐसा हो रहा है एक खबर मिडिया में आयी लक्ष्मण प्रसाद ने आत्म हत्या कर ली? झांसी के 25 वर्षीय इस युवक के उठाए गए अवांछित कदम के लिए विवाद उठा इमैजिन टी वी चैनल पर आने वाले राखी का इंसाफ पर इसमें लक्ष्मण का उत्पीड़न इस हद तक हुआ की उसने मरने जैसा कदम उठा लिया।

जनवरी 2010 में मुम्बई की ग्यारह वर्षीय लड़की नेहा सावन्त ने इसलिए आत्महत्या कर ली थी कि उसके पेरेन्ट्स नहीं चाहते थे कि वह किसी अन्य शो में भाग ले। वह डाँस रियलिटी शो बूगी-बुगी की प्रतिभागी थी।

एक और घटना मिडिया के माध्यम से सामने आयी थी जब 2008 में रियलिटी शो के नेगेटिव प्रभाव के रूप में एक 16 वर्षीय डाँस प्रतिभागी शिंजनी सेन गुप्ता सार्वजनिक फटकार से इतनी शुब्ध और नर्वस हो गई थी कि उसकी नर्वस सिस्टम यानी स्नायुतंत्र ने काम करना बन्द कर दिया था और वह लकवाग्रस्त हो गई थी।

बिग बॉस की अश्लीलता रोकने का हमारे पास कोई रास्ता नहीं है? उसके प्रसारण समय पर लगी रोक को उसने मानने से इंकार कर दिया। राखी का स्वयंवर, बिग बॉस, आजा नचले, इमोशनल अत्याचार सच का सामना जैसे नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करने वाले एवं मानसिक क्षुब्धता की अवधारण वाले कार्यक्रमों पर किसी का कोई नियंत्रण दिखाई नहीं देता। ‘‘ राखी का इंसाफ’’ क्यों? अरे राखी कौन महान व्यक्तित्व हैं जो आम आदमी की समस्याओं का समाधान करें? पर राखी सनसनी है बगैर अश्लील भाषा के वह इंसाफ करे तो करे कैसे? उसकी जबान और उसके झटके, ही तो बिकते है। रियलिटी शो क्या मात्र चैनल की टी.आर.पी. बढाने का फर्जीवाड़ा और समाज को असहनीय सच का सामना करवा कर चैनल अपना वैसा ही व्यापार नहीं कर रहे जैसा नकली शराब और नकली दवाई बेचने वाले करते हैं। घातक मनोरंजन भी वैसा ही असर करता है जैसा कोई जहर करता है। हाल ही में मुजफ्फर नगर के नरेन्द्र नामक युवक का दावा है कि राखी का इंसाफ शो में उसकी पत्नी को किसी दूसरे की पत्नी बनाकर पेश कर दिया गया हैं। नरेन्द्र का कहना है कि सुनीता सिंह उसकी पत्नी है जिसने उस शो में पत्नी की भूमिका निभाई है, शो के दौरान सुनीता का जो भाई दीपक दिखाया गया है वह भी एक कलाकार है उसका भाई नहीं।

मनोरंजन चैनलों की टीआरपी बढ़ाने के लिए चैनल दर्शकों के साथ बेरोक टोक मजाक कर रहे है उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे है। इन दिनों बिग बॉस जैसे बेहुदा शो से लेकर कई ऐसे कार्यक्रम आते है जो द्विअर्थी होते है। भारतीय छोटा पर्दा ऐसे कार्यक्रमों से भरा पड़ा है जो कि न सिर्फ पारम्परिक भारतीय संस्कृति भारतीय जीवन मूल्यों एवं सामाजिक मर्यादाओं का उपहास करते है बल्कि अश्लीलता और बच्चों में असमय वह ज्ञान परोस रहे हैं जो उन्हें उम्र से पहले प्रौढ़ बनी रही है। आयोजकों एवं प्रायोजकों को केवल शो की सफलता और उसकी रेटिंग से मतलब है उन्हें विषयवस्तु से या उसके प्रभाव से कोई लेना देना नहीं है।

दूरदर्शन पर व्यावसायिक विज्ञापनों की शुरूआत 1 जनवरी, 1976 से हुई और पहला व्यावसायिक विज्ञापन ‘‘बाम्बे डाइंग’’ का प्रसारित हुआ। आज विज्ञापनों की भी भरमार है। मनोरंजन चैनल पर 10 सेकेण्ड लम्बा विज्ञापन का स्लाट एक लाख से चार लाख रूपये दे सकता है जो शो की सफलता पर निर्भर है। इस तरह एक घंटे के हर एपीसोड में 10 से 12 मिनट का विज्ञापन 12 लाख से 50-60 लाख रूपये दे सकता है। पिछले दिनों बिग बास पर सारा और अली का विवाह विवाद का मुद्दा था। कुछ विवाद जानबूझकर फैलाए जाते है यह प्रचार का नेगेटिव तरीका हैं। सवाल यह है कि हमारा प्रसारण मंत्रालय और सेंसर बोर्ड क्या कर रहा हैं। अश्लील प्रसारण या शब्दावली पर कोई नियंत्रण दिखाई नहीं देता एक नन्ही कलाकार इन दिनों टी.वी. के हास्य मनोरंजन कार्यक्रमों में दिखाई दे रही है एक छोटी बच्ची टेलेंट के नाम पर जो भाषा बोलती है वह उसके बच्ची होने पर प्रश्नचिन्ह लगा देती हैं। आश्चर्य है माता पिता अपने बच्चों को इस तरह के शो में भेज कैसे देते हैं।

समाज को रियलिटी शो पर पूर्ण प्रतिबंध तथा निगरानी व्यवस्था की मांग करना चाहिए। वयस्क विषयवस्तु वाले कार्यक्रम मासूम बच्चे के व्यवहार में उसकी सोच और समझ में बदलाव करते है। दरअसल चैनलस् के लिए रैटिंग सबसे अहम है रैटिंग बढ़ने से टी.आर.पी. बड़ जाती है। झुठी शादियाँ, अभद्र भाषा, सेक्स प्रदर्शन, जैसी विषयवस्तुएं प्राइम टाइम मनोरंजन के नाम पर दिखाई जाने लगी है। हद तो तब होती है जब समाचार चैनल भी अपने समाचारों में आज किस चैनल के किस धारावाहिक में क्या होने वाला है, को समाचार बना देते है। ‘‘ सास बहू की साजिश’’ दिखाई जाती है इस तरह के समाचार राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समाचारों की गंभीरता और महत्व को तो कम करते ही है अपने न्यूज चैनल की विश्वसनीयता को भी कम कर देते हैं।

ज्ञानवर्धन कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जो भारतीय परिपेक्ष्य में बच्चों के साथ बैठकर परिवार देख सकें।

----------------

डा. स्वाति तिवारी




आत्मा, ईमान और नैतिकता मर जाए तो कितने दिन का शोक रखा जाना चाहिए ?

डा. स्वाति तिवारी
भारतीय संस्कृति में किसी व्यक्ति की मृत्यु पर बारह-तेरह दिन तक मृत्यु का शोक रखा जाता है। इन दिनों आत्मा की शांति के लिए पाठ एवं क्रियाकर्म किए जाने की परम्परा है। पर यक्ष प्रश्न यह है कि व्यक्ति का शरीर नहीं मरे पर आत्मा, ईमान और नैतिकता मर जाए तो कितने दिन का शोक रखा जाना चाहिए और तब मृत्यु आत्मा को जाग्रत करने के लिए कौन-कौन से पाठ क्रियाकर्म किए जाना चाहिए और हमारे देश में यह भी मान्यता है कि अगर असमय मृत्यु हो जाए तो उस अकाल मृत्यु के मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है तब आत्मा प्रेत योनी में भटकती रहती है। पर यहाँ भी यक्ष प्रश्न यह है कि आत्मा के इंसान की अकाल मृत्यु होने पर जो भ्रष्टाचार का भूत अपना शिकंजा फैला कर कार्यालयों में, योजनाओं में, खेलकूद में, न्याय व्यवस्था में, खाई बनाने से लेकर बेचने और खिलाने में भ्रष्टाचार का भूत खुलेआम तांड़व कर रहा है उसकी निवृत्ति के लिए शास्त्रों ने हमें कोई समाधान क्यूँ नहीं दिए? यह भूत अब लोगों को डराता भी नहीं है और भीड़ से, जनता से डरता भी नहीं है। भ्रष्टाचार जाल जीवन के हर क्षेत्र में फैल गया है। यह सियासी लोगों से लेकर खेल अधिकारियों तथा फौज के आला अफसरों तक सुनायी देने लगा है। पिछले कुछ दिनों से भ्रष्टाचार और घोटालों का जो कर्कश शोर चारों तरफ से सुनाई दे रहा है उसमें हमारे ही सुविधा और पारदर्शिता के लिए बनाए गए सूचना का अधिकार कानून का मखौल बना कर रख दिया कभी हमें याद आती है मुम्बई में शहीदों की विधवाओं के लिए निर्मित फ्लेटों में हुए भ्रष्टाचार और बेइमानी के किस्से तो कभी लक्ष्मीबाई नगर दिल्ली की वह इमारत जिसके गिरने से 60 लोग असमय मर गए। इस इमारत में गैर कानूनी तरीके से मंजिलें चढ़ती चली गईं म्यूनिसिपल अधिकारी तथा नक्शा पास करने वाले, पुलिस, प्रशासन सबकी पीठ पर चढ़ कर मंजिल ऊँची होती गयी। अपनी जेब गरम करने वाले उन साठ परिवारों के जलते चूल्हों पर ठण्डा पानी नहीं मौत का मलबा डालकर वहीं बैठ नयी फाइलें नए दस्तावेज बनाने में लगे होंगे? न्यायमूर्ति क्या न्याय करेंगे इस पर भी लोकधन हड़पने वाली सौमित्र सेन चर्चा ने प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। प्रीमियम लीग में हुई अनियमितताएं हों चाहे खेल गाँव की व्यवस्थाएं हों। ये तो मात्र बानगी है भ्रष्टाचार के भूत के पाँव आसमान से जमीन तक एक हैं। वह इतना प्यासा है कि सातों समन्दर का पानी सोख ले और डकार तक ना ले। इस नैतिक पतन के लिए एक विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार निजी हितों के लिए वोट, पद अथवा फैसले तक का सौदा होने लगा है।
ट्राँसपेरेन्सी इन्टरनेशनल की नवीनतम करप्शन परसेप्शन्स इन्डेक्स में हम थाना ओर रवाण्ड (ङध्र्ठ्ठदड्डठ्ठ) से भी नीचे 87वें स्थान पर हैं। 180 देशों में 87वें स्थान पर खड़े हैं। चाइना भी हमसे ऊपर है। हमारे यहाँ प्रजातंत्र है जबकि चाइना वनपार्टी स्टेट है। पुराने और सयाने लोग कहते हैं राजनीति भ्रष्टाचार की मातृभूमि है वह वहीं से जन्म लेकर फैलने लगता है। और यह फैलाव इतना घातक और इतनी तीव्रता से सबको अपने शिकंजे में जकड़ लेता है जैसे शरीर पर कैंसर की कोई गठान। आज पता लगी और कल उसकी जड़ें यहाँ-वहाँ सब तरफ फैलना शुरू हो जाती। यक्ष का प्रश्न फिर खड़ा हो रहा है कि इस नैतिक, सामाजिक, कैंसर से कैसे लड़ा जाए? कौन सी किमोथेरेपी, कौन सी रेडियोथेरेपी लागू हो जो सोसायटी को इससे बचाया जा सके। भारत में तेजी से नवधनाड्य वर्ग उभर कर सामने आ रह है। यह नवधनाड्यता ही दूसरों को भी अमीर होने के रास्ते दिखाने लगी है। दो साल पहले तक इनडेक्स में भारत 72वें स्थान पर था और देखते-देखते विश्व के भ्रष्ट देशों में हमारे देश का स्थान 87वाँ हो गया। यह पतन सूचांक इस बात की पुष्टि करता है कि हमारा नैतिक, ईमान हमारी आत्मा का पतन तेजी से हो रहा है। भ्रष्टाचार के जो भी मामले उभरकर सामने आते हैं वे भी केवल मीडिया के चाट-मसाले की तरह हो जाते हैं कुछ दिन चर्चा करो बाद में रफा-दफा करो। भ्रष्टाचार के मामलों में लोगों पर मुकदमा चलाने में हमारा रिकार्ड बहुत खराब है। सीबीआई द्वारा दायर नो हजार (9000) मामले विभिन्न अदालतों में लंबित पड़े हैं। मेरी स्मृति में एक भी फैसला ऐसा नहीं आया कि निर्णय हुआ हो। यक्ष का सवाल यही है कि सारे सबूत, सारे गवाह, सारी प्रक्रिया के बाद लंबित क्यों? लम्बित सिर्फ इसीलिए कि भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार संभव हो सके। 9000 में से 2000 से भी अधिक मामले एक दशक से भी ज्यादा समय से लम्बित हैं। सर्वे एवं विश्लेषण कहते हैं कि इनमें से बड़ी संख्या में ऐसे लोक सेवक, उनके सहायक और सहयोगी शामिल हैं जो रंगे हाथों पकड़े गए थे। कई बार लम्बित प्रकरण व्यक्ति की सेवानिवृत्ति के बाद तक हो सकते हैं।
विडम्बना है कि हमारे देश में सजा मिलने की दर 42 प्रतिशत है जो विश्व में सबसे कम है। हमारी कछुए की चाल वाली मंथर न्यायिक प्रक्रिया को दर्शाती है।
लोक सेवा और व्यवस्थाओं के ये यक्ष प्रश्न आत्मा के हनन के संदर्भ में ज्यों के त्यों खड़े हैं। ये विचारशक्ति और कायप्रणाली के साथ-साथ विकास की सही सम्भावनाओं को भी ध्वस्त करते हैं। ये लोगों के विश्वास और प्रजातंत्र में आस्था की भी हत्या करते हैं। आस्था जीवन की आत्मा है जबकि कानून समाज की व्यवस्था एवं नियंत्रण। दोनों का अपना क्षेत्र अपनी महत्ता है। लोक जीवन में, राष्ट्रीयता को इन दोनों के सन्तुलन की आवश्यकता है। पर जब इन्हीं का प्रेत योनी में भटकाव शुरू हो जाए तो हजारों हजार यक्ष प्रश्न उल्टे लटके रहेंगे, पर जवाब कौन देगा? यही प्रश्न है।
------------------
डा. स्वाति तिवारी
ईएन - 1/9 चार इमली, भोपाल
मोबा. - 9424011334