शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

भोपाल गैस त्रासदी

ताकी सनद रहे बाकी


शुरू करते हैं यूनियन कार्बाइड से। एक ऐसा कलंक, जो हमारे माथे पर गहरा लगा है। हादसे ने तो इसे दुनिया के सामने जाहिर कर दिया। देश भर में हर दिन होने वाले छोटे-मोटे हादसों का सबसे बड़ा प्रतीक, जिनमें हमारी व्यवस्था उतने ही निष्ठुर और निर्मम रूप में सामने आती है, जितनी भोपाल में देखी गई। तारीख क्क् जनवरी ख्क्क्। गैस पीड़ित औरतों की दुनिया में दाखिल होने से पहले मैं इसी कलंकित कार्बाइड को नजदीक से देखना चाहती थी। कीटनाशकों के उत्पादन का यह अमेरिकी उद्योग, जो भारत में मौत का दूसरा भयावह नाम बन गया। हादसे के ढाई दशक गुजरने के बाद वह किस हाल में है, यह जानने के लिए मैंने उसी की तरफ कदम बढ़ाए। मैंने जानबूझकर वहां तक जाने का लबा रास्ता चुना जो पुराने भोपाल से होकर जाता है। भोपाल की इन्हीं सड़कों पर उस रात मौत का तांडव हुआ था। इन पर अब तक लाखांे पन्ने लिखे जा चुके हैं। हजारों लैक एंड व्हाइट तस्वीरें छपी हैं। मैंने भी देखी हैं। लाशों के ढेर। बच्चे, बूढ़े, जवान, औरतें और पशु-पक्षियों की मौत से लबालब तस्वीरें। मौत अपनी फितरत के मुताबिक ही बेरहम थी। उसने हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई वह अमीर हो या गरीब, सब पर एक साथ हमला बोला। उसकी आमद सबसे ज्यादा थी इसी इलाके में।

जब मैं कार्बाइड के करीब जा रही थी तो बाजारांे मंे रौनक दिखी और रास्तांे पर भीड़। सड़क किनारे सजी, भाजी के ठेले लगातार मुश्किल होते यातायात में सदाबहार किरदारों की तरह भीड़ जुटाए खड़े थे। प्रवाहमान समय के साथ जीवन भी चलता है और जीवन की आपाधापी भी। यह हमारी परपरा में समाई उस दार्शनिक अवधारणा की पुष्टि करता है जो कहती है कि ‘समय और जीवन’ कभी थमते नहीं है। त्रासदी के कुछ समय बाद एक अलग ही संदर्भ में एक कवि-कलाकार ने यह कह दिया था कि ‘मरों के साथ मरा नहीं जाता’, उनकी बड़ी लानत-मलानत हुई थी। आज सोचती हूं तो लगता है कि उन्होंने क्या गलत कहा था, केवल एक सत्य ही तो उच्चारित किया था। ड्रायवर ने गाड़ी गलती से कारखाने के मुय दरवाजे से कुछ आगे बढ़ा दी थी। रुककर एक ऑटो वाले से कार्बाइड मंे जाने का रास्ता पूछा। उसने बायां हाथ उठाया और कहा, वो मौत का कारखाना तो पीछे छूट गया है। मैं जैसे ही पीछे मुड़ी तो देखा सामने एक स्मारक है, जो दुनियाभर मंे इस त्रासदी की पहचान बन चुका है।

यह एक आदमकद मूर्ति है। एक मां की मूर्ति, जिसकी गोद मंे एक बच्चा है। बच्चा उसके आंचल को थामे हुए है। इस सफेद मूर्ति को मैंने छूकर देखा, नीचे से ऊपर तक। फिर एक परिक्रमा की। मैं चारों ओर से उसे देखना चाहती थी। मां के अलावा और कोई शिल्प इतना बोलता, झकझोरता और मार्मिक नहीं हो सकता था। ाोपाल की उस भयावह रात का सबसे संजीदा प्रतीक। मुझे इस प्रतिमा में वह युवती नजर आई, जो अपने होने वाले पहले बच्चे के लिए गुलाबी स्वेटर बुन रही थी। अगर उसका बच्चा हो भी जाता तो शायद इसी हाल में वह कहीं भीड़ में भागती हुई मारी जाती। मौत से बचने की कोई सूरत उस रात नहीं थी। यह सोचते हुए मेरी आंखें भीग गईं। मुझे लगा कि मैं ही हूं, जो भागते हुए गैस की शिकार हो गई हूं। मैं ही हूं, जिसके हाथों बना गुलाबी स्वेटर कहीं पीछे छूट गया है।

मैं सोच ही रही थी कि इस प्रतीक को एक मां ही गढ़ सकती है, तभी मेरी निगाह मूर्ति पर उकेरे शदों पर गई, जिस पर लिखा था-रूथ वाटरमेन। पता किया तो मालूम चला कि यह महिला नीदरलैंड से कुछ दिनांे के लिए भोपाल आई थी। यह मार्मिक यादगार उसी की बनाई है। एक स्त्री और मां ही यह कर सकती थी। फिर वह चाहे हिन्दुस्तान की हो या नीदरलैंड की। औरत, औरत होती है। उसकी प्रकृति और उसका अंतस एक-सा ही होता है। वह किसी मुल्क, किसी मजहब और किसी कालंाड की ही क्यों न हो।

इस प्रकार है- ईश्वर सशरीर हम सबके साथ रहना चाहता था किन्तु वह ऐसा नहीं कर सका सो उसने मां बना दी। यहां पर यह मां उन हजारों म हादसे का यह यादगार प्रतीक किसी हरे-भरे उद्यान से घिरे मैदान मंे इज्जत से स्थापित नहीं है, जैसा कि आमतौर पर अंतर्राष्ट्रीय पहचान के ऐसे स्मारक होते हैं। यह मां तो कार्बाइड के ठीक सामने सड़क पर खड़ी है। भारत की उपेक्षित अवाम, खासतौर पर औरतों की एक सबसे असल और सशक्त प्रतीक। न जीते-जी किसी ने परवाह की और मरने के बाद बना दिए गए इस बेजान बुत के साथ भी वही सलूक। हमेशा से यही होता आया है। वे तहजीब के नाम पर परदों के अंधेरों में धकेली जाएं या ऑनर के नाम पर किल की जाएं। उन्हें इज्जत से बराबरी के दर्जे पर रखना अभी एक सुनहरा वाब भर है।

यह मां तो फैक्ट्री के ठीक सामने सड़क पर पिछले ख्ब् सालों से अपना वजूद कायम रखे है, न कोई रखवाली करने वाला है और न ही कोई देखभाल करने वाला। उस मां की देखभाल कौन करेगा जिसकी छाया में हजारों सयताएं पली-बढ़ी हैं। मुझे एक पुरानी राजस्थानी कहावत याद आ गई जिसका हिन्दी तर्जुमा कुछ ांओं के हमकदम है जो एक दिन तथाकथित आधुनिक सयता का शिकार हो गईं लेकिन वह भी मां ही हैं जो जिन्दादिली से जिन्दगी को आगे बढ़ाने की जद्दोजहद में जुटी हैं।

मां की यह प्रतिकृति तो सृजन और जीवन की निरंतरता की अभिव्यक्ति है। शोक और शांति का यह श्वेत-धवल शिल्प एक ऐसा सफेद पन्ना है जिस पर औरत फिर लिख रही है जीवन की इबारत। घर से बाहर निकलती यह औरत उस सृजनधर्मी धरती का प्रतीक है जो आदमी की भूलों को लगातार क्षमा करती रही है।

इस स्मारक से सटी हैं वे इंसानी बसाहटें, जहां गैस ने सबसे पहले हवाओं में दस्तक दी थी। कार्बाइड की मौत उगलती चिमनियांे से महज पांच सौ कदमांे के फासले से शुरू होती हैं ये अभागी बस्तियां। वक्त के साथ तब की झुग्गियांे की बनावट जरूर बदल गई है। कई रहने वाले भी बदल गए। अब यहां एक नई पीढ़ी सांसंे ले रही है। लेकिन यहां की तीन पीढ़ियों को हादसे की स्मृतियां आज भी ताजा हैं।

भोपाल हादसा और हिटलर के गैस चेबर अलग नहीं हैं। प्रथम विश्व युद्ध मंे फास्जीन मस्टर्ड गैस का उपयोग किया गया था। इसी जहरीली गैस ने दूसरे विश्व युद्ध मंे भी कहर ढाया था। हिटलर ने जर्मनी मंे लाखांे यहूदियांे को मौत के घाट उतारने के लिए इसी जहरीली गैस का इस्तेमाल कुयात गैस चेबरों मंे किया था। वही गैस पूरे भोपाल को भी जहरीले चेबर मंे बदल चुकी थी।

इस औरत को शामिल किए बिना कोई भी स्त्री विमर्श असंभव है। यह मूर्ति उस औरत ने बनायी है जिसने अपने अभिभावकों (माता-पिता) को हिटलर के गैस चैबर वाले हादसे में खो दिया था। अनाथ होने की पीड़ा से वह स्वयं पीड़ित थी। उसकी वही पीड़ा एक बार फिर घनीभूत हुई होगी भोपाल गैस त्रासदी की विश्वव्यापी खबर से। जीवन के वे बुरे दिन जो गुजर चुके थे स्मृति पटल पर फिर कसकते हुए उभरने लगे होंगे क्योंकि भोपाल हादसा और हिटलर के गैस चेबर की त्रासदी में समानता थी।

रूथ वाटरमेन के लिए यह मानसिक स्मृति यातना का दौर रहा होगा और जब पीड़ा का आवेग असहनीय हो गया होगा तो वे भारत की यात्रा पर निकल पड़ी होंगी। अपनी स्मृतियांे मंे खोई हुई अपनी मां को यहां किसी मां मंे ढूंढ़ती हुई वे जब यहां अनाथ ममता से मिलीं तो मां की ममता का यह यादगार मूर्त रूप खड़ा कर गयीं। मैंने इन्टरनेट पर ‘रूथ वाटरमेन एण्ड स्टोरी आफ ममता’ पढ़ी थी। यह एक व्यथा कथा है। ममता भी रूथ वाटरमेन की तरह हादसे मंे माता-पिता और भाई को खो चुकी थी। स्मारक मंे ममता मां के पीछे खड़ी है। यह उसकी जिंदगी में आई हादसे की काली रात की कहानी है। तब वह भी अपनी मां के भी पीछे-पीछे थी। कब साथ छूटा पता ही नहीं चला। ममता की मां की बांहांे मंे झूलता वह छोटा बच्चा वहीं मर गया था और रोती बिलखती बेबस मां भी मौत के मुंह मंे समा गई। विडबना यह थी कि ममता को न इलाज का पैसा मिला और न पढ़ाई, इसीलिए वह पढ़ाई नहीं कर सकी। रूथ वाटरमेन अपनी ही तरह की पीड़ा से लड़ती उस नन्हीं ममता से मिली। ममता मंे उसने खुद की तकलीफों को जिंदा देखा तो वही दर्द शिल्प की शक्ल में सामने आया, अब यही स्मारक दुनिया के सामने है। स्मारक के रूप मंे यह गैस त्रासदी की पहचान बन चुकी मां है जो इस पुस्तक में स्त्री विमर्श का ठोस धरातल बनी। कारखाने को पीठ दिखाती इस प्रतिमा पर तीन तरफ शिलालेख लगे हैं, जिन पर उर्दू, अंग्रेजी और हिन्दी मंे लिखा  है -

हिरोशिमा नहीं

भोपाल नहीं

हम जीना चाहते हैं

ऐसा विकट हादसा झेलने वाला भोपाल दुनिया में इकलौता शहर है और भोपाल में यह जगह इकलौता ठिकाना है, जहां एक यादगार बननी ही चाहिए थी, जो आने वाली पीढ़ियों को इस भयानक हादसे की लगातार याद दिलाती। लेकिन हम यह नहीं कर सके। हम यह जाहिर नहीं कर सके कि हमने कोई सबक भी सीखे हैं। बल्कि हमने यह जाहिर किया कि हम दिसंबर क्-त्त्ब् के पहले जैसे थे, वैसे ही अब हैं। सुधार में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है। जो हो रहा है, होने दीजिए। जो चल रहा है, चलने दीजिए। परवाह मत कीजिए। यहां लोगों की याददाश्त बहुुत कमजोर होती है। वे सब भूल जाएंगे। थोड़े दिन गुस्सा होंगे। गरियाएंगे। फिर किसे याद रहेगा कि क्या हुआ था

क्या हमारी व्यवस्था और व्यवस्थापकों की नजर में गैस हादसा, हर दिन होने वाली दूसरी मामूली दुर्घटनाओं की तरह एक और दुर्घटना थी, जो उस रात घटी? अदालत में तो बाकायदा इस हादसे को इसी दिशा में मोड़ भी दिया गया था।

स्मारक और आसपास की कार्बाइड की दीवारों पर दर्ज तस्वीरों और नारों को पढ़ते हुए मैं -फ् एकड़ के उजाड़ परिसर की तरफ बढ़ती हूं। अब यह ताकतवर अमेरिकी उद्योग परंपरा का एक शानदार कारखाना नहीं बल्कि जहरीले अपशिष्ट से भरा एक कबाड़खाना बन चुका है। अंदर जाने के लिए कोई रोक-टोक नहीं है। कीटनाशकों के उत्पादन के अपने बेहतरीन दौर में शायद ही कोई बाहरी आदमी यहां दूर भी फटक पाता होगा। लेकिन अब इसका काम खत्म हुए ख्स्त्र साल गुजर गए हैं। यह अपने घातक रसायनांे के इस्तेमाल का असर इंसानी चूहों पर देख चुका है।

मुझे अंदर जाते हुए किसी ने नहीं रोका। होमगार्ड के चंद जवान सर्दी में धूप सेंकते हुए इसकी सुरक्षा के लिए तैनात जरूर थे, लेकिन शायद अब किसी को रोकने की जरूरत ही कहां थी? यह हत्यारी फैक्ट्री अपना काम खत्म कर चुकी थी। धातु के इस बेजान ढांचे और खंडहर होती इमारतों में हर तरफ मक्खी और मच्छर जैसे कीटों की भरमार थी, जो बीमारियों की शक्ल में इंसानों के लिए हमेशा से ही मुश्किल पैदा करते रहे हैं। यूनियन कार्बाइड में इन्हीं कीटों के नाश के उपाय किए गए थे, लेकिन उन्होंने इंसानों के साथ ही कीट-पतंगों सा सलूक किया।

 मैंने महसूस किया कि हमारे आसपास मंडरा रहे अनगिनत कीट-पतंगे कार्बाइड को चिढ़ा रहे हैं। मैं देख रही थी एक अमेरिकी आसुरी उद्योग का मायाजाली विस्तार करीब त्त् एकड़ जमीन पर। जहरीली दवा बनाने वाली फैक्ट्री के संयंत्र में हर तरफ झाड़-झंखाड़ और गाजर घास का कजा था। यह कारखाना भारत में इस बात का स्मारक जरूर है कि ताकतवरों के आगे अवाम की हैसियत कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा न आजादी के पहले थी, न आजादी मिलने के बाद है! जीते-जी यह कारखाना भी इसी हकीकत की मिसाल था और इसने दिसंबर क्-त्त्ब् में दुनिया के सामने इस हकीकत के सबूत भी दे दिए। बंद होने के बाद उजाड़ शक्ल में भी यह उसी हकीकत की याद दिलाता रहा है। शायद इसीलिए सरकारों को लगा हो कि अलग से किसी स्मारक को बनाने की जल्दी क्या है? लोग सीधे असली स्मारक को ही आकर देख लें। सर्दी की इस सुबह मैं इसी असली स्मारक के सामने थी।

दीवार फांदकर भीतर आने वाले बच्चे, पतंगें उड़ा रहे थे। बकरी चराती एक बूढ़ी औरत, जो सूनी आंखों से कभी कारखाने को देखती है तो मुंह फेर लेती है। कार्बाइड के पड़ोस की ये दो पीढ़ियां कभी भी यहां देखी जा सकती हैं। एक पीढ़ी ने हादसे को देखा और भोगा है और नई पीढ़ी ने सिर्फ सुना है या तस्वीरों और खबरों में देखा-पढ़ा है। कारखाने के बाहर आंखों के सामने हैं घनी बस्तियां। संकरी गलियां। गंदगी। बदइंतजामी। फटेहाली। बेबसी। गलियों में अंदर चहलकदमी कीजिए। किसी घर के दरवाजे पर दस्तक दीजिए। बेमकसद बैठे या टहलते लोगों की शक्लें देखिए। एक अजीब-सा अहसास भीतर कड़वाहट घोल देता है। यहां आकर गैस हादसा पीछे छूट जाता है। सिर्फ सवाल सर्प की तरह फन उठाने लगते हैं। साठ साल से सरकारों के दावे, आश्वासन, नीयत और नीतियों, अरबों की योजनाओं और उनके बेईमान अमल का सबूत है यह सब। एक दिशाहीन देश की दर्दनाक तस्वीर! शाम ढले जब कारखाना देखकर घर लौटी तो सबसे पहले भरे मन से मैंने अपनी डायरी मंे लिखा-

वो अनजान गाय चरती बैठी हैं

भोले बच्चे ले आए हैं पतंग की डोर

डर लगता है मुझको अब...

कहीं ऐसा ना हो...

कहीं से कोई ले आए अनुमति

की कोई नई पतंग,

लिख दे जिस पर हुक्मरान

यहां फिर बनेगी जहरीली गैस

यह कहकर किसी बच्चे को

पकड़ा दे डोर... जाओ उड़ाओ

हजारांे चेहरांे के गुबारे

भरकर मिक या फास्जीन

या कोई और

क्या पता...?

  मौत का बवंडर बने उन काले साए और सफेद बादलों से धुएं के मध्य प्रकाश की रेखा यह है कि दुनिया की अधिकांश सयताएं इस आसन्न विभीषिका के प्रति कम से कम अब तो जागरूक हों, पर हम जागरूक कभी नहीं होते। या तो सोते रहते हैं या हड़बड़ी में अति जागरूक हो उठते हैं जो हमें ही नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति है। वह अतिरंजित जागरूकता ही तो थी, जो महत्वाकांक्षा में बदल गई थी और भारत में एक बड़े उद्योग की स्थापना के नाम पर कृषि मंत्रालय ने किसी बड़ी खुशखबरी की तरह बाकायदा अधिकारिक अनुमति पत्र के जरिए कार्बाइड के... एडुआर्डो यूनाज को सूचित किया था कि सरकार यूनियन कार्बाइड को प्रतिवर्ष पांच हजार टन कीटनाशक के उत्पादन का लाइसंेस प्रदान कर रही है।  यह वास्तव मंे सेविन के उत्पादन का निमंत्रण था, जिसका अर्थ था इस संयोजन मंे शामिल सभी रासायनिक तत्वांे को भारत मंे ही तैयार किया जा सकेगा। शायद यही वह पहली भूल थी, जिसने भोपाल को मौत के मुंह में ढकेल दिया था।

कपनी ने अपनी सुविधाएं देखीं और सरकार ने एक बड़ा जोखिम अनदेखा कर दिया। अनदेखी का परिणाम ही था कि सरकार ने भोपाल स्थित काली परेड ग्राउंड की पांच एकड़ जमीन यूनियन कार्बाइड को आवंटित कर दी। यही सबसे खतरनाक भूल थी। सरकार ने यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि इस कारखाने मंे किस तरह के रसायनांे का उत्पादन किया जाएगा। वैज्ञानिकांे और पत्रकारांे की चेतावनी को भी नकार दिया कि ये रसायन मनुष्यांे और प्रकृति के लिए कहीं घातक तो नहीं।

मैंने यूनियन कार्बाइड के परिसर और आसपास के इलाकों को खामोशी से देखा। यह शहर मेरे लिए नया था। लेकिन अलग कुछ नहीं था। आमतौर पर जो अव्यवस्था और लापरवाही सड़कों और ट्रैफिक में देश में करीब-करीब हर जगह नजर आती है, वही बदइंतजामी यहां भी भरपूर थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि इन ख्स्त्र सालों में कम से कम इस इलाके को तो रौनकदार बनाया ही जा सकता था। कुछ तो ऐसा हो सकता था, जो हमारे मानवीय सरोकारों का प्रमाण होता। क्या जापान ने हिरोशिमा और नागासाकी या अमेरिका ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के बरबाद बिंदुओं को नक्शे पर यूं ही रफा-दफा कर दिया था? नहीं। उन्होंने इन जमों को न सिर्फ भरा बल्कि इन जगहों को दुनिया की याददाश्त में लगातार जिंदा भी रखा है ताकि सदियों तक सनद रहे। ाोपाल हादसे के इस इलाके में आकर किसी को लगेगा ही नहीं कि यहां कभी कुछ हुआ था? और यह वो देश है, जो अपने राजनेताओं के मरने पर आलीशान समाधियों और स्मारकों पर अरबों रुपए फूंक देता है, जबकि उनमें से ज्यादातर को लोग अपनी नजरों और यादों से उतार फेंक चुके होते हैं!

औद्योगिक इतिहास की विभीषिका के निर्जीव अवशेष, स्मारक और फैक्ट्री के उजड़े आंगन से बाहर निकली तो शहर की उन्हीं तंग गलियों से लौटते हुए नजरें जीवित अवशेषों को खोज रही थीं। जानती तो थी कि लाखों लोग प्रभावित हुए हैं और त्रासदी से उपजी तकलीफों को आज तक निरंतर झेल रहे हैं। उनके जीवन की दर्दनाक, मार्मिक, रोंगटे खड़े करने वाली कल्पना, जिज्ञासाएं और उनसे जुड़े सवालों से घिरी थी। उनका दायरा जब विस्तृत होने लगा, तब जरूरी लगा चश्मदीद और पीड़ितों से मिलना क्योंकि कल्पनाएं मेरे सवालों के दृश्य तो खड़े करती थी पर जवाब नहीं दे सकती थीं। जरूरी था विचारों के घनीभूत होते धुएं से निकलना और यही वजह थी कि कुछ लोगों से मिलना, बात करना जरूरी होता गया। शहर मेरे लिए नया था अचानक किसी से मिलना संभव नहीं होता।

मुझे गैस पीड़ित मजबूर औरतों के एक जनसंगठन के जाने-माने कार्यकर्ता बालकृष्ण नामदेव के बारे में पता चला। पता चला कि लिली टॉकीज के सामने तिबतियों की स्वेटर की मौसमी दुकानों के पीछे हर रविवार और शुक्रवार एक बैठक होती है। यह है भोपाल का नीलम पार्क। कई सालों से गैस पीड़ित निराश्रित महिलाएं यहां आती रही हैं। बैठक का तय वक्त रहा है-दोपहर बारह से चार बजे। नामदेव ने कहा कि आप वहीं आ जाइए... मुलाकात हो जाएगी। अब मैं उन महिला किरदारों से रूबरू होने वाली थी, जिनके सवाल मेरे लिए सबसे अहम थे। मेरा फोकस उन्हीं पर था। उनके बीच जाते हुए मैं डरी हुई थी। मैं एक ऐसी जमात से मिल रही थी, जो  ख्स्त्र साल से सिर्फ उमीदों के आसरे थी, जिनके लिए जिंदगी जीते-जी बोझ बन गई थी। एक हादसे ने उनकी दुनिया को उलट-पलट कर रख दिया था। कैसी दिखती होंगी वे? क्या सोचती होंगी? उनके दिन और रात कैसे कटते होंगे? जो खो गए उन अपनों की यादों के कितने टुकड़े उनके भीतर तैरते रहते होंगे? वे जो बेमौत मारे गए। आंखों के सामने। अपनी गोद में। हंसते-खेलते। मां, बाप, भाई, बहन, पति, बच्चे और पड़ोसी।

(लेखिका जानी-मानी साहित्यकार है)

क        डा. स्वाति तिवारी

ई एन 1/9,चार इमली,

भोपाल

मोबाईल नं. - 9424011334



जितने किरदार, उतनी कहानियाँ
     स्वाति तिवारी

भोपाल गैस त्रासदी यानी औद्योगिक इतिहास में भीषणतम हादसा। हजारों लोगों का उससे प्रभावित होना और आज तक निरन्तर उसे भोगना। हम मात्र कल्पना ही कर सकते हैं पर कल्पना के साथ त्रासदी से जुड़े सवालों के दायरे जब विस्तृत होते गये, तब जरूरी लगा कुछ लोगों से मिलना। पर अचानक किसी से मिलना संभव नहीं होता। गैस त्रासदी से जुड़े एक संगठन के श्री बालकृष्ण नामदेव से बात की। पता चला लिली टॉकीज के सामने जो स्वेटरवालों की दुकानें हैं ठीक उसके पीछे पार्क है - नीलम पार्क। वहाँ हर रविवार एवं गुरूवार को निराश्रित महिलाएं, जो संगठन से जुड़ी हैं, वे सब आती हैं। बारह बजे से चार बजे तक वहाँ मीटिंग होती है। श्री नामदेव जी ने कहा कि आप वहीं आ जाइए.... मुलाकात हो जाएगी।
रविवार की वह दोपहरी जब सारा देश कड़ाके की सर्दी से ठिठुरता हुआ अपने-अपने घरों में आराम फरमा रहा था या अपने ही घरों के आँगन, छज्जे और ओटलों पर धूप सेंक रहा था..... मैं पार्क पहुंच गई...... पार्क में बने एक चबूतरे पर कुछ महिलाएं दिखीं, जो श्री नामदेव के साथ अपनी-अपनी समस्याएं बताने में लगी थीं, धूप का एक टुकड़ा यहाँ भी फैला था र्‍र्‍....... यहीं मेरी मुलाकात हुई 65-70 साल के आस पास की उम्र की मुन्नी बी से। अब वह अर्जुन नगर में रहती है पर हादसे के वक्त वे सेठी नगर कॉलोनी  की, स्वयं की झुग्गी में रहती थी। जिस घर में दूध का धंधा था उस घर का मालिक रोटी पानी को मोहताज हो गया था। घर में सब कुछ था। अल्ला की दुआ से भरापूरा घर था, शौहर शेरखाँ इतना कमाते थे कि दो औरतों का खर्चा भी आसानी से उठाते थे। हम एक ही चूल्हे पर दोनों मिलकर रोटियाँ पकाती थीं.... पर परवर दिगार ने जाने कैसा नसीब लिखा कि सब कुछ गैस त्रासदी में बर्बाद हो गया। उस रात हम अपने घरों में सोए थे, पड़ोस में शादी थी। हल्ले गुल्ले के बीच देर से ही नींद लगी थी कि अचानक लगा किसी ने चूल्हे में मिर्च झोंक दी है। धुंआ नाक-कान गले में लगा और तेज जलन उठने लगी, बाहर देखा तो शादी के पंडाल से लोग भाग रहे थे। चारों तरफ अफरा-तफरी........ हम भी भागे - मैं, मेरी सौत और हमारे शोहर, सौत के बच्चे मेरे साथ ही भागे थे........... उस रोज या और उसके बाद शेर खाँ........ खाट से उठ नहीं पाए - पेट में पानी भर जाता था - रोज पेट का पानी निकलवाना पड़ता था - रोज पानी पेट में भरता, रोज अस्पताल जाते। एक साल बाद शोहर नहीं रहे, सौत पहले ही नहीं रही..... मेरा अपना बच्चा नहीं था.... पर सोत सुगरा बी का बेटा....... था उसी के पास रहती थी .....बाद में बेटा बहू सब खत्म हो गए............ तेरह साल का एक पोता है मेरा, वही संभालता है मुझे........... हादसा याद करती हँू तो पड़ोसी बीबी जान का घर याद आता है। वहाँ उस दिन एक ही घर में चार-चार मय्यतें हुई थीं, चार जनाजे निकले थे बीबीजान के घर से। इतना कुछ देखा था उस हादसे में कि बताना मुश्किल है ...... सड़क पर आदमी ऐसे मरे पड़े थे कि जानवर भी इस तरह पड़े नहीं देखे हमने.......। लाश देखकर भागते हुए कोई रुकना ही नहीं चाहता था। जो भागते-भागते गिरा उसे वहीं छोड़ लोग भाग रहे थे...... ऐसा तो कभी किस्से कहानियों में भी नहीं सुना था, पर देखा है ----- इन आँखों ने..... वापस लौटने पर घर के खूँटे में बंधी बेबस लाचार गाय, भैंस की फूली हुई लाशें..... पर दुख तो इस बात का है कि खुद बेबस थे पीड़ा से, दर्द से..... अपनों के दर्द को उनकी मय्यत को आँसू भी ढंग से नहीं दे पाए।
मुआवजे में पच्चीस हजार मिले थे। बैंक में रखे हैं, अल्ला कभी हज करवा दें तो जरूर हज पर जाकर परवर दिगार से पूछूंगी....... ये कैसा इंसाफ था तेरा..... और कौन सा गुनाह था मेरा........ उम्र के इस पड़ाव पर 13 वर्ष का पोता मजदूरी करके लाता है, उसी से कुछ पकाती हूँ अपने लिए और उसके लिए।  मुन्नी बी से अलग कहानी है तारा बाई की।
45-48 साल के आस पास उम्र होगी तारा बाई की। देखने में यूँ तो स्वस्थ दिखती है, पर कहती है, ये शरीर हट्टा कट्टा तो दिखने का है, बीमार रहती हूँ। हाथ पैर और छाती में दर्द बना रहता है। थोड़ा दिखने भी कम लगा है। 19 जून 2010 को पति भी साथ छोड़ गए। अब अकेली हूँ, एकदम निराश्रित। क्या हुआ था उस दिन...... पूछने पर वह कहती है वही हुआ था जो नहीं होना चाहिए था...... तब मेरी शादी को तीन साल हुए थे.............. चार माह का पेट था (गर्भ).... नींद नहीं आ रही थी उस दिन..... बीड़ी लपेट रही थी बैठे बैठे। पड़ोस में शादी थी। हम भी शादी में खाना खाकर आए थे.... पति सो गए थे..... मुझे खांसी आयी और लगा मिर्च जल रही है पड़ोस में। मैंने दरवाजा खोलकर देखा तो भगदड़ दिखी। पति को उठाया और दोनों चूना भट्टी की तरफ भागने लगे। रास्ते में सूने कारखाने से जहरीली गैस निकली है - भागने में दम फूलने लगा। रास्ते में गिर पड़ी, पति ने उठाया पर अगले दिन अस्पताल में मेरा बच्चा गिर गया। वह कोख में ही मर गया। बस फिर महावारी कभी नहीं आयी ----- मैं फिर माँ नहीं बन पायी। पति ने दूसरी शादी नहीं की। पर बीमारी झेलते झेलते वो भी चले गए.... गैस ने मुझे बाँझ बना दिया..... मेरे अजन्मे बच्चे को खा गयी डायन। मैं जिन्दा हूँ पर किसके लिए?
75 साल की कलावती बाई के हाथ धूज रहे थे, चेहरा बोलने से पहले ही तमतमा उठा था..... नहीं बताती कुछ...... वो जाने लगी........ नामदेवजी ने कहा, अरे बताओ अपने बारे में। क्या क्या बताऊँ भैया? कितनी बार बताऊं? 26 बरस से बताने के लिए ही तो जिन्दा हूँ। वो जाती हुई धूप की टुकड़ी को देखने लगी, फिर उसी पर जाकर बैठ गयी.... फिर हल्के से मुस्कुराई .....अरे बेटा क्या बताऊं? पति पूरनचंद चालीस साल पहले ही मर गए थे - पर तीन बेटे थे मेरे। अब दो हैं, एक मर गया... ऐसी गैस निकली... उस दिन कि बस सारा बरखेड़ी भाग खड़ा हुआ और जब वापस लौटे तो गैस बाहर नहीं फेफड़ों में भरी थी...... आँखों में भरी थी...... अब तक अंदर अपना असर दिखा रही है देखो, कैसी गिल्टी बन गयी है, छाती के पास।
क्रोध से भरा चेहरा करुणा से कराह उठा- मेरी नातनी 18 साल की उम्र में चली गयी। एक बेटा भी गया.....। करम की गति बचपन में माँ मर गयी थी, सोतेली माँ ने मजदूरी करवायी - तगारी उठाते बचपन से शादी ने मुक्ति दी तो पति चले गए...... तगारी फिर उठा ली..... तगारी उठाकर पाले मेरे बच्चों की अर्थी उठती देख...... मैं जिन्दा मर गयी। पढ़ा नहीं पायी बेटों को..... अब वे भी तगारी ही उठाते है....... अब तो दिखता भी नहीं है मुझे..... पर देखने को बचा भी क्या है? डाक्टर को क्यूं नहीं दिखाती गिल्टी? पूछने पर वह कहती है, दवा मिले और दवा लगे तो फायदा ना दिखाने का। मुआवजे के पच्चीस-पच्चीस हजार रुपये तो जाने कब इलाज पर ही खत्म हो गए..... यहाँ तक क्यूँ आयी हैं? प्रश्न पर वह एक कार्ड दिखाती है - शायद वह पेंशन कार्ड था। मैने केवल देखा जिस पर लिखा था नाम कलावती उम्र 75 साल पति स्व. पूरनचन्द।
कार्ड वापस करती हूँ तो एक और महिला कार्ड मेरे हाथ में रख देती है। प्रेमबाई उम्र पच्चास साल ग्राम बरखेड़ी। उस रात जो मेरे साथ हुआ था मेडम, वो तो सिनेमा में भी नहीं देखा होगा आपने?
‘‘अच्छा!’’
उस रात जब गैस रिसी, हम सब भागे.... रास्ते में उल्टी हुई और मेरी तीन महीने की छोरी छूट गयी और गिर कर मर गयी। सास, ससुर, पति, ननद, देवर भरा पूरा कुनबा था हमारा। सब विधानसभा वाली सड़क की तरफ भाग रहे थे। दूसरी लड़की भी हादसे के बाद मर गयी। अब निःसंतान हूँ मैं। मुआवजा मिला?
प्रेमबाई कहती है, आज तक लड़ रही हूँ, पर नहीं मिला। पति ने दूसरी औरत को रख लिया था। उसी को मेरी जगह खड़ी कर दिया, पैसा उसे मिला। भगवान दास की वह दूसरी पत्नी भी अब नहीं रही। केन्द्र सरकार में नौकरी करने वाले इस कर्मचारी की पत्नी का कहना है कि रिश्तेदार देवर वगैरह अब मुझे फिर परेशान करते हैं क्योंकि प्रापर्टी की एक मात्र दावेदार हूँ मैं, फिर पति की पेंशन और नौकरी के पैसे भी मिलेंगे। संतान नहीं है, तो देवर सब हड़पना चाहता है। मुआवजा भले ही ना मिला हो पर मैं आखरी दम तक संगठन के साथ मिलकर न्याय के लिए लड़ती रहूँगी।
यह हैं लक्ष्मी बाई, करोंद की रहने वाली। पर नाम बड़े और दर्शन खोटे की तरह लक्ष्मी से दूर-दूर तक नाता नहीं है। गैस त्रासदी उसके शरीर पर जाने कौन-सा रोग छोड़ गयी जो कुष्ट रोग की तरह दिखाई देता है, जिसके चलते पति ने परित्याग कर दिया। कहीं अस्थमा तो कहीं कैंसर बन कर गैस ने जीवन में स्थायी घर बना लिए और साथ ही ले गयी। 55 साल की आमना बी कभी संगठन में सबसे आगे चलती थी.... पर कैंसर बन कर शरीर में फैली गैस उम्र से पहले ही मौत बन कर ले गयी। कहते-कहते नामदेव जी का गला भर आया, बोलते बोलते उनका ध्यान गया। अरे, वो देखिए इमली के नीचे शायद मस्जिद वाली बीबी खड़ी है। मैंने देखा गौरवर्णी नाजुक सी उस 75 वर्षीय बुरकाधारी स्त्री को। इमली और बरगद के दो विशाल पेड़ हैं पार्क में, वे उन्हीं के आस पास ढूँढ रही थी अपने संगठन के साथियों को........ मैं कैमरा खोलती हूँ पर बैटरी खत्म....... एक पल को मुझे कोफ्त होती है, अपनी लापरवाही पर... बैटरी चार्ज किए बगैर क्यूँ कैमरा उठा लायी। ....झल्लाकर कैमरा पर्स में डालती हूँ, वे वही बरगद के नीचे बैंच पर बैठ गयी थी। प्रेमबाई कहती है वही चलना पड़ेगा आपको। मैं उनके पास जाते हुए सोचती हूँ कैमरे में बैटरी नहीं होने की लापरवाही पर इतनी कोफ्त हुई मुझे...... पर उस लापरवाही का क्या जिसके चलते जाने कितनी जीवन बैटरियाँ बन्द हो गयीं?
यह मैं मुखातिब थी, 75 साल की राशिदा सुल्ताना से, जो मरहूम अब्दुल मनान की बेसहारा बीबी है। मस्जिद के पीछे इमली के पेड़ के नीचे बने घर में रहती है। एकदम अकेली है, रहन-सहन से लगता है किसी सम्पन्न घर की सदस्य रही होंगी, पास आते ही खुश हो हाथ मिलाती हैं फिर बताती हैं चेहरे पर आँखों के पास लगी चोंट। आँखों से साफ दिखाई नहीं देता, रास्ते के पत्थर से टकराकर गिर गयी थी --- उसी से चोट लगी है। दवाई लगाई। पूछने पर कहती हैं, दवाइयों ने पीछा पकड़ लिया था, अब मैंने ही दवाई लेना छोड़ दिया....... काले बुरके में लिपटी, उम्र के 75 साल की राशिदा बी कहती हैं, अपने आसपास देखती हैं कोई चाय ला दो, ये मेडम आयी हैं मिलने.... मैं मना करती हूँ, नहीं मैं चाय पी कर आयी थी - दरअसल मैं उस दर्द को उन्हीं की तरह पीना चाहती थी जो वह बताते हुए पी रही थी - जहर का एक-एक घूंट -- मुझे लगा चाय या तो बात में विघ्न डालेगी या फिर गरम चाय की प्याली उस जहर के अहसास को कम कर देगी - कल चाय पीते हैं साथ में, मैं कल आऊँगी...... अभी बहुत कुछ बाकी है...... के वादे के साथ......।
अगले गुरूवार को इन्तजार था.... वह आ ही गया... बालकृष्ण जी ने आज बताया आप थोड़ा सा लेट हो गयीं, वो अभी-अभी चली गयी।
‘‘कौन?’’
शाँतिनगर में गाँधीनगर स्कूल के पास रहने वाली भूरिया बाई। गले के कैंसर से पीड़ित है और इलाज को तरस रही है।
इलाज के लिए तरस रही का क्या अर्थ है? वह गैस राहत चिकित्सालयों में क्यूँ नहीं जा रही है? उसे पता नहीं है क्या? गैस पीड़ितों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए 33 चिकित्सा केन्द्र स्थापित किये गये हैं, मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की। मुझे लगा, 26 साल बाद भी इन्हें शायद यह जानकारी नहीं है। मैंने हाल ही में प्रकाशित एक राहत एवं पुनर्वास स्मारिका को पढ़ा था, जिसमें उल्लेख है कि वर्तमान में 6 चिकित्सालय, 9 डे-केयर यूनिट कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त देशी चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत आयुर्वेद, होम्योपैथी एवं यूनानी के तीन-तीन कुल नौ औषधालय संचालित हैं। भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल ट्रस्ट का एक मुख्य चिकित्सालय एवं इसकी 8 मिनी यूनिट, गैस पीड़ितों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने हेतु संचालित हैं। गैस राहत चिकित्सालयों में प्रतिदिन लगभग 3,477 मरीजों का बाह्यरोगी विभाग में उपचार किया जा रहा है। शासन द्वारा गैस पीड़ितों की जाँच एवं उपचार निःशुल्क हैं।
मेरी जानकारी पर संगठन में मौजूद वे पीड़ित स्त्रियाँ मुस्कुराने लगीं - उनके नेता ने कहा, आपकी जानकारी सरकारी आँकड़ों सहित एकदम सही है, पर समस्या यह है कि वहाँ नॉन गैस पीड़ित इलाज लेने लगे हैं। दवाइयों का तो सरकारी दवाखानों में सदा टोटा रहता है। उस पर ओ.पी.डी. चालू कर देने से नान गैस पीड़ित ही वहाँ ज्यादा लाभ ले रहे हैं। आप कभी गयी हैं वहाँ? उन्होंने प्रश्न किया?
‘‘नहीं।’’
तो फिर आपको समझना होगा कि एक शानदार भवन, उच्च तकनीकी वाली मशीनें हैं फिर भी गैस पीड़ितों के इलाज की कमी है। दवाइयाँ कई बार नहीं, ज्यादातर बाहर से ही लानी होती हैं। पाँच रुपये की पर्ची बनवानी पड़ती है? एक लम्बी प्रक्रिया है।
मैं आश्चर्यचकित हूँ। उनकी बात सुनकर विश्वास नहीं होता मुझे। विश्वास का आधार भी नहीं है मेरे पास। मैं तो अपनी उपलब्ध जानकारी से अपडेट थी - मैंने कहीं पढ़ा था, भारत सरकार द्वारा चिकित्सा पुनर्वास हेतु प्रथम कार्ययोजना में 150.35 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गये थे, जिसके विरूद्ध माह अक्टूबर 2010 तक राशि 4.24 करोड़ रुपये का व्यय किया गया है, जिसमें राशि रुपये 273.78 करोड़ का अधिक व्यय, राज्य शासन ने अपने संसाधनों से किया है?
नई नीति अनुसार अक्टूबर 10 तक कुल 235 मरीजों को जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल ईदगाह हिल्स, भोपाल में इलाज हेतु भेजा गया है। अब तक कुल 2,628 गैस पीड़ित कैंसर मरीजों को इलाज हेतु इस अस्पताल में रैफर किया गया है। राशि रुपये 14.78 करोड़ का भुगतान कैंसर चिकित्सा हेतु किये जाने के बावजूद भूरिया बाई के इलाज की समस्या ज्यों की त्यों है। चिकित्सालयों में फाइव स्टार होटलों जैसी सुविधा देने वाली तमाम मशीनों का सुना है, जिसमें एयर कूलर, रेफ्रीजरेटर, एक्वागार्ड, एसी, वाटर कूलर, पंखे, लेजर प्रिंटर, प्रिंटर कम फैक्स, फीटल मॉनीटर इन्वर्टर, ई.सी.जी., एक्स-रे ट्यूब, ट्रांसफार्मर आदि सब उपलब्ध हैं - फिर क्यों भूरिया बाई, लक्ष्मीबाई परेशान हैं?
इस प्रश्न पर वह सहमे हुए से लहजे में कहती हैं, ये सुविधाएं ही तो समस्याएं हैं - इनकी जरूरत बड़े-बड़े साहेबान को होती है - आम आदमी तो लम्बी लाइन में पर्ची कटवाने में ही लस्त-पस्त होकर लौट जाता है या लौटा दिया जाता है...... आप समझ रही हैं ना मैं क्या कहना चाहती हूँ?
समस्या एक हो तो गिनवायें आपको, यहाँ तो रोज एक नयी समस्या से लड़ना पड़ता है.... अब आप सामाजिक सुरक्षा पेंशन को ही ले लो?
‘‘क्यों उसमें क्या होल हैं?’’
आपको पता है सन् 1984 तक वह मात्र साठ रुपये थी, हम तब से लड़ रहे हैं। श्री नामदेव बताते हैं कि उन्होंने एक नारा दिया था - ‘‘साठ नहीं, ड़ेढ सौ दो, भीख नहीं, पेंशन दो’’, वे कहते है फार्म प्रक्रिया इतनी जटिल थी कि ये अनपढ़ निराश्रित महिलाएं क्या आवदेन कर सकती है? फार्म पर 1250 अस्पताल में डाक्टर से साइन करवाना होते थे... और डाक्टर के पास फीस लेकर इलाज का तो समय नहीं है। वहाँ गरीबों के फार्म पर साइन आसान काम लगता है आपको? आपको पता है सामाजिक सुरक्षा पेंशन अब एकीकृत वृद्धावस्था पेंशन है, जो 150 रुपये के लगभग मिलती है। यह भी लेना हजार पापड़ बेलना जैसा होता है। इसका नाम सुरक्षा नहीं, समस्या पेंशन होना चाहिए। 26 वर्ष हो गए हैं गैस त्रासदी को...... कितने लोग मर खप गए यहाँ मुआवजा और पेंशन मांगते-मांगते। पता नहीं कब सुधरेगी हमारी व्यवस्था प्रणाली और कब भरेंगे उसके होल। एक महिला बताती है, मेडम आपको नहीं पता डा. अमरसिंह तोमर 48 साल की उम्र में डाक्टर होकर भी मर गए। उनकी दोनों किडनी खराब हो गई थीं गैस त्रासदी के कारण।
‘‘ओह!’’ ही बोल पाती हूँ मैं एक दर्दभरी दास्तां पर, शायद हमारे पास अब दवाइयों की तरह शब्दों की भी कमी होती जा रही है। पर शब्दों के मलहम घावों को भरने में तो मदद नहीं कर सकते ना। क्या कहूँ? मैं रामकली बाई से, जो पचपन वर्ष की उम्र में चक्कर आने, पैरों में सूजन बने रहने की शिकायत करती है। वह बताती है, गैस ने उसके पति का लीवर खराब कर दिया था, वे नहीं रहे। मुआवजे के पैसों में इलाज हुआ और बेटों की शादी भी..... पर अब उन्हें दवाई की दिक्कत है। कार्ड गुम हो गया है। पर्चा बनवाने में पाँच रुपये लगते हैं -- और ऊपर से दवाई भी बाहर से ही लानी पड़ती है। कार्ड नया बने तो शायद कुछ हो। पास बैठी 65 वर्षीय लक्ष्मीबाई, जिन्हें सब गहना भाभी बुलाते हैं, बताती हैं उस रात का मंजर...... बाजू वाले घर में राम प्रसाद की बेटी की बारात आयी थी। भाँवर पड़ रही थीं। आधे फेरे में अचानक गैस फैलने से जी मचलाने लगे। दूल्हा-दुल्हन भी हाथ पकड़ कर भागने लगे। सड़क का यह हाल था कि उस पर कंकड-पत्थर की तरह लाशें पड़ी थी। स्कूटर, सायकल पड़े थे। पर उठाने चलाने वाले बेजान थे। किसी को घर, जायदाद, रुपया-पैसा, गहना किसी की चिन्ता नहीं थी। लोग सोते बच्चे छोड़कर भाग रहे थे.... मौत की घर-घर के दरवाजे पर दस्तक सुनायी दे रही थी.... कहीं वह गैस का बादल बन कर उतरी तो कहीं सफेद जहरीला धुँआ बन कर। किसी को बन्द उबली गोभी की तीखी गंध लगी तो किसी को ताजी कटी घास की, पर असर उसका जलती लाल मिर्च जैसा था, आँखों को जला देने वाला। भागते-भागते लोग एक जगह जहाँ पानी की टेंकर भरी जाती हैं, वहाँ नल खोल कर पानी के नीचे जमीन पर लोट रहे थे, झटपटा रहे थे। 3 दिसम्बर की सर्दी वाली रात और शरीर के अन्दर आग लगी हुई थी, जहर भरे धुएँ के साथ, पता नहीं किस जन्म का पाप था उन सबका, जिन्होंने ये मंजर देखा था..... पर क्या इतने लोग एक ही तकदीर के एक साथ हो सकते हैं...... कहाँ है वे भविष्यवक्ता, जो सबका अलग-अलग भाग्य बांचते फिरते हैं..... कोई बताता उस दिन कि उन सबकी राशियां क्या एक ही थीं? इतनी शादियाँ थीं शहर में, क्या कुण्डलियों के मिलान करने वालों ने कुण्डलियां सही मिलायी थीं? कहाँ थे भाग्य के शनि-मंगल? क्या सब धरती पर उतर आए थे। भाग्य बांचना अगर इतना आसान है तो भारतीय जो सबसे ज्यादा भाग्य पर भरोसा करते हैं, उन्हें प्रशासन की व्यवस्था ने शायद भाग्य के भरोसे ही छोड़ दिया था। ये विमर्श उन औरतों से हो रहा है जो बीसवीं सदी की भीषणतम औद्योगिक दुर्घटना - भोपाल गैस त्रासदी को अपनी करम गति को कोसते हुए याद करती हैं.....

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