शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

मंगलवार, 30 मार्च 2010

रविवार, 28 मार्च 2010

आजकलkhaniलिव इन रिलेशनशिप



दरवाजे पर किसी ने हल्की-सी दस्तक दी। दरवाजा अंदर से बंद है। अब क्या करे? मन नहीं है उठने का और किसी से बात करने का, पर उठकर खोलना तो पड़ेगा। क्या पता, प्रणव ही हो और कुछ भूल गया हो, पर चाबी, रूमाल, फाइलें सब याद रखकर दे तो दिए थे और प्रणव के जाते ही प्रतिमा ने दरवाजे का हैंडल लॉक किया और चिटकनी लगा ली थी। उसने उठकर चिटकनी खोली तो दरवाजे पर अपरिचित महिला खड़ी थी। वह मात्र चेहरे से पहचान रही थी कि वह उसके सामने वाले फ्लैट में रहती है। प्रणव के आने और जाने के वक्त प्रतिमा ने दरवाजा खोलते हुए या बंद करते वक्त इस महिला को बालकनी में खड़े देखा है। दरवाजे को पकड़े प्रतिमा उलझन में थी, आइए कहूं या नहीं?
''हलो! मैं मिसेस कुलकर्णी आपके सामने वाले फ्लैट में....'' आगंतुक महिला ने बातचीत शुरू की।
''ओह, हां! आपको बालकनी में खड़े देखा है, आइए।'' प्रतिमा सहज होने की कोशिश के साथ दरवाजे से हटकर अंदर आ गई। घर की सजावट का मुआयना करती पड़ोसन मिसेस कुलकर्णी ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया।
''एक महीना हो गया, जबसे आप लोग रहने आए हैं, रोज सोचती हूं, आपसे मुलाकात करने की, पर जब फुर्सत होती है आपका दरवाजा बंद रहता है। लगता है, आप व्यस्त होंगी या आपके आराम का समय होगा। यही सोचकर आते-आते रूक जाती हूं।'' बिना किसी औपचारिक भूमिका के उन्होंने बातचीत की भूमिका शुरू कर दी।
''सोचा तो मैंने भी था आपके घर आने का पर सोचती ही रही। इधर थोड़ी तबीयत भी ठीक नहीं है, इसीलिए आलस कर गई।'' कहने को कह गई, पर लगा तबीयत वाली बात नहीं बतानी चाहिए थी।
''क्या हुआ आपकी तबीयत को?'' मिसेस कुलकर्णी ने विस्मय से प्रश्न किया।
फंस गई थी मैं! पर कुछ तो बोलना था सो कह दिया, ''कुछ खास नहीं, यूं ही थोड़ी सुस्ती रहती है आजकल।''
''अच्छा समझी....खुशखबरी है, क्यों? अरे भई, बतलाना तो चाहिए हारी-बीमारी में पड़ोसी पहले काम आते हैं।''
चेहरे पर प्रसन्नता के मिले-जुले भाव ने स्वतः उत्तर दे दिया था।
''कितने दिन चढ़े हैं?'' मिसेस कुलकर्णी ने जिज्ञासावश पूछा।
''पांचवा महीना है।'' प्रतिमा ने पांच माह कहा तो, पर एक बार मन ही मन स्वयं को टटोला। यह बात बतानी चाहिए थी या नहीं। कल को यह शादी के लिए पूछेगी तो? एक निरर्थक-सी चिंता से माथा ठनका। पर चिंता निरर्थक नहीं थी। मिसेस कुलकर्णी ने अगला प्रश्न पूछ ही लिया, ''पहला बच्चा है?''
''हां।'' कहकर प्रतिमा चाय-पानी की व्यवस्था के बहाने वहां से उठकर रसोई में आ गई- मन ही मन विचार करते हुए कि चाय लेकर आऊंगी तो बातचीत का विषय बदल दूंगी। उनके बातचीत के विधान मेरी व्यक्तिगत जिंदगी को सेंध लगाएं, यह मुझे मंजूर नहीं था। इसी ऊहापोह में बाहर की गर्मी और मन का तापमान एक-सा लगा, अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व और मुक्त विचारधारा में भय के बादल देख प्रतिमा बेचैन हो उठी, पर यह कैसा भय? चाय की ट्रे लेकर लौटी तो देखा, मिसेस कुलकर्णी कॉर्नर टेबल पर रखी उसकी और प्रणव की तस्वीर देख रही है। उसे देखते ही उत्साह से पूछ ही बैठीं, ''यह फोटो आपके हनीमून की होगी, है न? बहुत सुंदर आई है। कहाँ गए थे हनीमून पर?''
''जी ये....ऽऽ...'' प्रतिमा सकपका गई पर बात संभाल ही ली-यह फोटो सिंगापुर की है। हम यूं ही घूमने गए थे तब की है।'' कह तो दिया उसने, पर हनीमून और डेटिंग का फर्क आज एकदम सामने आकर खड़ा हो गया। फोटो हनीमून की होती तो कितने उत्साह से कहती वह, पर डेटिंेग पर वह और प्रणव सिंगापुर गए थे और यह पांच माह का जीव तभी से उसकी कोख में है। क्यों नहीं खुलकर कह पाई यह कि वह बच्चा केवल उसका कहलाएगा। बगैर पुरूष के नाम के भी वह मां हो सकती है-एक स्वतंत्र मां। प्रतिमा ने चाय का प्याला पकड़ाते हुए बात बदलने के लिए पूछा, ''आप कब से रह रही हैं इस फ्लैट में?''
''जब मिस्टर कुलकर्णी ने मुझसे शादी की तब यह फ्लैट वे बुक करवा चुके थे। किश्तों पर लिया था। पांच साल पहले आखिरी किश्त भरी।''
''अच्छा, अच्छा।''
''हां, नही ंतो क्या?''
''चलिए, घर का घर हो गया बंबई में और क्या चाहिए?''
''तुम्हें पता है प्रतिमा, मेरी भी पहली डिलीवरी यहीं हुई थी। बेटा हुआ था। फिर ऊपर वाले वर्माजी के यहां भी....'' वे आप से तुम पर आ गई थीं।
''अच्छा....'' प्रतिमा मुस्करा रही थी।
''तुम लोगों ने फ्लैट खरीदा या किराये पर लिया है।''
''अभी तो किराये पर लिया है। दरअसल हमारा फ्लैट जुहू में है। फर्स्ट फ्लोर पर प्रणव के मम्मी-डैडी का और नाइंथ फ्लोर पर मेरी मम्मी का।''
''एक ही बिल्डिंग में ससुराल और मायका है। फिर इधर जुहू छोड़, अंधेरी में फ्लैट क्यों लिया। प्रेगनेंसी में घर के लोग साथ होने चाहिए।''
''बस यूं ही। प्रणव ने फ्लैट ले लिया तो आ गए।'' एक और झूठ, पर कब तक? कह क्यों नहीं दिया ससुराल का झंझट नहीं है। ''फ्लैट थोड़े छोटे हैं, इसलिए इधर आ गए।'' कहने को तो कह गई, पर मन पर फिर एक बोझ लदने लगा। सास-ससुर, घर, ससुराल...ये सारे शब्द इतने वजनदार होते हैं क्या? क्यों लग रहा है जैसे वह चोरी करते पकड़ी जा रही है। ये रिश्ते...क्या उसके जीवन में हैं? क्या वह इन्हीं से नहीं भाग रही थी! रिश्तों के बंधन ही तो उसे पसंद नहीं थे। तो क्या रिश्तों के नाम होना जरूरी है? रिश्तों के नाम जीवन में इतना मायने रखते हैं? अगर नहीं रखते तो क्यों मन डर रहा है उस एक प्रश्न से जिसे नकार दिया था उसने और प्रणव ने भी। मां से झूठ बोलकर वह प्रणव के साथ सिंगापुर गई थी एनसीसी के कैंप के बहाने। दिन और रात की डेटिंग थी वह। चांद जब होटल की खिड़की से आधी रात को झांकता तो पाता-प्रतिमा और प्रणव परमतृप्त, बेसुध, एक-दूसरे पर समर्पित....नींद में होते।
पांच दिन के ही किसी क्षण, किसी लम्हे का फुल पांचवा महीना बन गया है। आजकल विवाह एक रूढ़ि है-मात्र दो देह के मिलन की रस्में! जब देह बगैर रस्मोरिवाज के एकाकार हैं तो विवाह का बंधन क्यों? जब मन चाहेगा, कहीं जाकर रह लेंगे साथ। अपनी-अपनी स्वतंत्रता की चाह में दोनों ने ही बंधन नकार दिए थे। पर क्या इस नकारने को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर सकती है वह?
आजकल संबंधों को भी फैशन की तरह लिया जा रहा है-जब तक चले, चलाओ वरना आत्मा से उतार फेंको। अनचाहा बोझ नहीं चाहिए उन्हें...रिश्तों का बोझ।
चाय का प्याला खाली कर रखते हुए मिसेस कुलकर्णी ने वही सवाल खड़ा कर दिया। पूछ ही लिया वह प्रश्न जिससे प्रतिमा बचना चाहती थी। ''कितने साल हुए ब्याह को?''
चेहरा सफेद पड़ गया प्रतिमा का। जवाब न देना पड़े इसलिए अनसुनी-सी करती वह उठने लगी, ''जस्ट ए मिनट, शायद दूध की पतीली गैस पर रख आई हूं। लेट मी चेक।'' दूध गैस पर था ही नहीं, प्रश्न को टालना था, बस इसलिए उठी थी वह। सहज होने के लिए थोड़ा समय चाहिए था। वह टॉयलेट में चली गई। अंदर की हलचल से उपजी घबराहट की तीव्रता को बाहर निकालना चाहती थी। वॉश-बेसिन के नल को खोल, पानी के छींटे मुंह पर मार, नेपकिन से चेहरा थपथपाती बाहर आई। उसका चेहरा देख मिसेस कुलकर्णी ने सहज स्त्रीत्व के भाव से पूछा, ''प्रतिमा! तुम्हें घबराहट हो रही है क्या? ऐसे समय नींबूपानी, नारंगी की गोली, दूध, ग्लूकोज लेती रहा करो।''
''हां लेती हूं न....पर इस वक्त रोज ही मुझे उबकाई आती है। आफ्टर दैट आय फील अनकंफर्टेबल एंड आई फील लाइक स्लीपिंग।''
''ओके, आई विल लीव नाऊ। जब तुम्हें अच्छा लगे तब आ जाया करना मेरे पास। अकेली परेशान नहीं होना। सबके साथ होता है पति दफ्तर चले जाते हैं, बड़ा अकेलापन लगता है। पास-पड़ोसी ही काम आते हैं। समय भी कट जाता है और दूसरों के अनुभव बड़े काम आते हैं पहली डिलीवरी में।''
प्रतिमा ने सोफे पर सिर टिका लिया, स्पष्ट था वह बातचीत करने के मूड में नहीं है। पर मिसेस कुलकर्णी आजकल की प्रतिमा तो नहीं न? वह तो उम्र की प्रौढ़ता की ओर हैं।
''कुछ अच्छा खाने का मन करे तो बता देना, समझी। भूखे नहीं रहना, ऐसे वक्त। पति का रास्ता नहीं देखना खाना खाने के लिए। जब मन करे, खा लिया करो। अच्छा, मैं चलती हूं।''
भड़ाक से दरवाजा बंद किया प्रतिमा ने और कटे पेड़-सी पलंग पर पड़ गई वह। जाने क्यों उसे लगा कमरे में वह अकेली नहीं है, कोई अब भी मौजूद है। उसने खुद दरवाजा लगाया है! कौन हो सकता है? फिर उसने पेट पर हाथ रखा तो अहसास की अजीब-सी लहर उसके तन-मन में तरंगित हो गई। 'ओह, तो वो दूसरे तुम हो कमरे में मेरे बच्चे।' वह मुस्करा उठी, पर पलभर में ही चिंता का भाव फैलने लगा, 'मेरे बच्चे...मेरे बच्चे। शब्द का अहसास उसके अंतर्मन पर छा गया, 'मेरा बच्चा' भी तो एक रिश्ता है, क्या इस रिश्ते को मैं या प्रणव अपने रिश्ते की तरह नकार पाएंगे कभी? मेरा बच्चा जब प्रणव कहेगा तो मैं क्या अपने बच्चे पर उसके अधिकार को रोक पाऊंगी? मेरी कोख में पलने से वह मेरा बच्चा है। पर यह स्वतंत्र अस्तित्व की मृगतृष्णा कहीं बच्चे से उसके पिता का अधिकार ही न छीन लें? और जो प्रश्न मिसेस कुलकर्णी ने पूछा और मैं बताने से कतराती रही, कल को वही प्रश्न बच्चे से पूछ लिया तो?
शादी न करते हुए प्रणव के साथ सहजीवन के बावजूद, स्वतंत्र अस्तित्व की मृगतृष्णा में कहीं मैं भटक तो नहीं रही? सिर भारी हो गया सोच-सोचकर। मां ने कितना समझाया था-''शादी कर ले प्रणव से, फिर जो जी चाहे कर। बिना ब्याह के साथ रहने का चलन हमारे देश में नहीं है, प्रतिमा।'' मां की बातें दिलो-दिमाग में घूमने लगीं। कितनी आसानी से भाषण झाड़ दिया था अपनी मां और प्रणव की मम्मी के आगे...क्या फर्क पड़ेगा शादी से? मुझे और प्रणव को साथ रहना है। हम प्यार करते हैं तो फिर रिश्ता प्यार का हुआ न? भंवरों या फेरों का क्या है? यदि मैं प्रणव का हाथ थाम लूं और तुम्हारे आस-पास घूमकर फेरे ले लूं तो क्या तुम साक्षी नहीं हो! अग्नि के फेरे एक परंपरा है। आडंबर से भरी। मैं रूढ़ियों को तोड़ रही हूं। कल को प्रणव मुझे बाध्य नहीं कर सकेगा अपनी मर्जी से हांकने के लिए, जैसे तुम्हें बाबूजी ने अपनी उंगलियों पर नचाया-''ऊषा यहां बैठो, ऊषा जल्दी आ जाना, ऊषा टीवी बंद कर दो, नानी के घर मत जाओ।''
''तू पागल हो गई है, प्रतिमा...अपने पिता के लिए इस तरह कोई बोलता है?''
''नहीं मां, मैं पागल नहीं हूं। मैं पत्नी बनकर गुलामी नहीं करना चाहती। तुम्हारी इन सदियों से चली आ रही रीति-रिवाजों की परंपराएं स्त्री-पुरूष को केवल एक-दूसरे की गुलाम बनाती हैं। मैं घुटने टेकने वाली नहीं।''
दोनों घर से बेदखल हो गए थे-प्रणव और प्रतिमा।
फ्लैट किराये पर कहाँ मिलता उन्हें ब्याह के बगैर। सुधीर से प्रणव ने कहा और सुधीर ने फ्लैट देने की हाँ कर दी और प्रतिमा लिपट गई थी प्रणव से।
प्रतिमा ने न मांग भरी, न मंगलसूत्र गले में डाला, न बिछिया पहनी, न मेहंदी लगाई, न
हल्दी, न अग्नि के भांवर पड़ी, न कन्यादान के संकल्प छूटे, फिर भी वह प्रणव के जीवन में आ ही गई और प्रणव का अंश उसकी देह में पल रहा है। पर यही देह का रिश्ता भांवरों के साथ होता तो...मां को बताना अच्छा लगता कि तुम नानी बन रही हो। सात फेरे....प्रणव के साथ ले लेती तो...
दरवाजे पर उसे प्रणव के कदमों की आहट लगी। उठी, दरवाजा खोला। दरवाजे पर प्रणव ही था। अंदर आते ही उसने प्रतिमा को चूम लिया, ''कैसी हो माय डियर डार्लिंग।''
वह चुप रही।
प्रणव ने टाई ढीली करते हुए कहा, ''प्रतिमा,प्रतिमा! तेज भूख लगी है, कुछ पकौड़े-वकौड़े बनाओ।''
इच्छा नहीं थी प्रतिमा की....पर डिब्बे में बेसन ढूंढने लगी। कढ़ाई में हर छूटते पकौड़े की छन्न....उसके अंदर भी होती। क्या अंतर रहा उसमें और बीवी मेंे?
पकौड़े के साथ हल्की-सी हि्वस्की प्रणव लेने लगा तो प्रतिमा ने रोका था, ''नहीं प्रणव, मत लो।''
एक-दूसरे की स्वतंत्रता को बनाए रखने का दावा करने वाले प्रणव और प्रतिमा क्या स्वतंत्र हैं? हस्तक्षेप नहीं है उनका एक-दूसरे के जीवन में?
रात बिस्तर पर प्रतिमा आंखें मूंदे लेटी थी। प्रणव ने खींच लिया उसे बांहों में, ''क्या हुआ, मैडम? बड़ी चुपचाप हैं...प्यार करने का मूड हो रहा है मेरा।'' उसका उत्तर सुने बगैर ही प्रणव...
प्रतिमा उठकर बैठ गई। एक छत के नीचे, एक बिस्तर पर साथ रहते, सोते स्वतंत्रता को बचा पा रही है वह? अपने अस्तित्व को बचाए रखना संभव नहीं रहा। प्रणव अपनी इच्छापूर्ति के बाद करवट बदलकर सो गया, पर प्रतिमा का मंथन चलता रहा। एक प्रश्न आकर लेट गया उसके और प्रणव के बीच। क्या उसका बिन ब्याहे मां बनने का निर्णय गलत है? उसका प्रणव से रिश्ता....एक दैहिक सुख की मृगतृष्णा नहीं....
अगले दिन फिर मिसेस कुलकर्णी उसके दरवाजे पर थीं,''प्रतिमा थालीपीठ बनाया है। लो थोड़ा चखकर बताओ।'' प्रतिमा को चिढ़-सी आने लगी। बड़ी बोर औरत है। अनावश्यक हस्तक्षेप करने लगी है उसके जीवन में। फिर एक दिन दरवाजे पर मिसेस कुलकर्णी थीं, ''प्रतिमा पूरनपोली बना रही हूं, चलो, वहीं एक, गरम-गरम पोली खा लो। जानती हूं, तुम्हें एकांत पसंद है, पर कुछ भी बनाती हूं तो तुम्हारा खयाल अपने-आप आ जाता है। मैं जब प्रेगनेंट थी तो कुलकर्णीजी की आई पूरे टाइम साथ रहीं। सासु मां ने रोज नए पकवान खिलाए। तुम अकेली हो यहाँ, यही सोचकर मन तुम्हारी तरफ दौड़ता है।''
''नहीं, नहीं, अच्छा लगता है मुझे भी।'' पूरनपोली की थाली उठाते हुए प्रतिमा ने कहा।
''सातवें माह में सासु मां को बुलवा लेना। सातवां महीना थोड़ा रिस्की होता है। आठवें में नदी-नाले पार नहीं करना....तुम्हें मां ने बताया तो होगा न?''
''अच्छा, शाम को तुम्हारे पति को समझाऊंगी, अपनी मां को ले आएंगे।''
''वे नहीं आएंगी।''
''क्यों नहीं आएंगी? पोता क्या यूं ही मिल जाएगा?''
''.....ऽऽ....''
''बहू को लाड़-प्यार किए बगैर?''
''वे नाराज हैं।''
''तो अपनी मां को बुलवा लो?''
''वे भी नहीं आएंगी।''
''क्यों? भागकर शादी की थी क्या?''
''नहीं।''
''तो?''
''वी आर नॉट मैरिड।एक्चुअली वी आर इन्वॉल्वड इन अ 'लिव इन' रिलेशनशिप....दरअसल हमने शादी नहीं की। सिर्फ साथ रहने का फैसला किया है।'' प्रतिमा ज्यादा समय तक इस सच को छिपाकर नहीं रख सकती थी। जब-जब छिपाया मन पर बोझ बढ़ता जाता था। कहकर हल्का लगा, पर साथ ही आवाज की बुलंदी गायब थी-वह बुलंदी जो ब्याह की बात पर मां को उनके और बाबूजी के रिश्तों की गुलामी पर कहते वक्त मौजूद थी।
''वॉट आर यू टॉकिंग? क्या बात कर रही हो।'' उन्होंने गैस बंद कर दी। प्रतिमा को लगा कि गर्भवती को गरम-गरम पूरनपोली खिलाने के उत्साह पर पानी फिर गया।
''तुमने शादी नहीं की?''
''नहीं की।''
''क्यों?''
''हमें लगता है कि शादी एक बंधन है। वह केवल गुलाम बनाती है और शादी के बाद प्यार खत्म हो जाता है। मैंने देखा है, अपने मम्मी-डैडी को दुश्मनों-सा लड़ते हुए।''
''पागल हो प्रतिमा, सारे रिश्ते रस्मों के मोहताज हैं?''
''स्वतंत्रता, अस्तित्व, वजूद, पसंद, सब शादी के साथ मिटने लगते हैं। हम अपना-अपना जीवन अपने अनुसार नहीं जी पाते हैं। मैंने देखा है, अपनी मां को बाबूजी की पूजा की थाली से लेकर अंडरवियर-बनियान तक बाथरूम में टांगने की गुलामी को!''
''मैं तो मॉडलिंग की दुनिया में हूं, जहां शादीशुदा लड़की का कैरियर ही खत्म हो जाता है।''
''मॉडलिंग का कैरियर शादी से नहीं, उम्र के साथ यूं ही खत्म हो जाता है।''
''आर्थिक स्वतंत्रता के बाद हम एक-दूसरे पर निर्भर नहीं हैं तो क्यों बंधनों में बंधें?''
''प्रतिमा, जिसके साथ बंधन में बंधना नहीं चाहती हो उसका ये बंधन! कोख के अंदर तो बंधा है। जानती हो, मां का सबसे पवित्र रिश्ता बच्चों से ही होता है, पर पवित्रता की मोहर शादी की रस्मों से ही लगती है। जिसकी पत्नी नहीं कहलाना चाहती हो, उसी के बच्चे की मां कहलाने को तैयार हो और शादी कोई रस्म नहीं, एक संस्कार है, प्रतिमा। एक संस्कार संतान को जन्म देने के पहले का। उसके बगैर पत्नी नहीं, उपपत्नी ही कही जाओगी। उपपत्नी मतलब 'रखैल'। बच्चे के जन्म से पहले कोर्ट में या मंदिर में जहाँ भी चाहो, इस संस्कार को पूरा कर लो। बच्चा तुम्हारे रिश्ते की इज्जत करेगा, वरना बड़े होकर सबसे ज्यादा कटघरे में उसे ही खड़ा किया जाएगा।''
पूरनपोली रखी रही थाली में। न उन्होंने सरकाई, न मैंने खिसकाई। प्रतिमा अपने फ्लैट में लौट आई। पलंग पर पड़ी रही-खाली, निष्प्रयोजन, उदास.... तो क्या इस बंधन से भी मुक्त हो जाऊं? या इसके लिए उस बंधन को स्वीकार लूं।
मिसेस कुलकर्णी कह बड़बड़ाहट महसूस करती रही प्रतिमा। उसे लग रहा था, वह मिसेस कुलकर्णी कह नजरों में उतर गई है। वे उसे डांट रही हैं और अपने पति को बता रही हैं-'वॉट द हेल इस गोइंग ऑन दीस डेज?'
'यू वोंट अंडरस्टैंड, दिस इज वेस्टर्न कल्चर माय डियर, विच इज ऑल्सो रूलिंग इंडियंस नाऊ।'

डॉ. स्वाति तिवारी
ई-एन1/9, चार इमली,
भोपाल (म.प्र.)

शुक्रवार, 19 मार्च 2010




पुस्तक समीक्षा
स्त्री-संसार का कोलाज़ रचती कहानियां- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - बैंगनी फूलों वाला पेड़ प्रकाशक - सामयिकप्रकाशन, 3320-21,जटवाड़ा
लेखिका- स्वाति तिवारी नेताजी सुभाष मार्ग,दरियागंज नईदिल्ली-2
मूल्य - रु.200/- मात्र
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हिन्दी कथा साहित्य में स्त्री के अस्तित्व को लेकर सदा दो धाराएं सामने आई हैं। एक धारा पुरुषवादी सोच की और दूसरी स्त्रीवादी सोच की। दोनों में अकसर टकराव की स्थिति रहती है। जबकि सच यह है कि स्त्री और पुरुष परस्पर मिल कर परिवार, समाज और भावी पीढ़ी का सृजन करते हैं। फिर यह टकराव की स्थिति उत्पन्न क्यों होती हैं? इसका उत्तर स्त्री के वैवाहिक जीवन के उस पक्ष में निहित है जहंा पति 'परमेश्वर' न भी हो किन्तु परिवार का सर्वोच्च शक्ति होता है और स्त्री पौराणिक कथाओं की भांति शक्ति का पर्याय माने जाने पर भी शक्तिहीन खड़ी मिलती है। उसे परिवार संबंधी किसी भी निर्णय को अंतिम रूप से लेने का अधिकार नहीं होता है। इस बिन्दु पर आ कर परिवार में स्त्री और पुरुष की सहभागिता की धारणा टूटती दिखाई देती है। अब जहंा टूटन होगी, वहंा घुटन भी होगी। कुल मिला कर यदि स्त्री 'स्व' को भुला कर परिवार बसाती है तो उससे उसका और उसके साथ विवाह करने वाले पुरुष का भविष्य सुनिश्चित आकार लेता है वरन् पुरुष किसी भी परिस्थिति में 'स्व' को भूलने को तैयार नहीं होता है। इन कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि ये स्त्री की दीन-हीन दशा पर प्रलाप नहीं करती हैं वरन स्त्री के दृढ़ स्वभाव का वह चित्र प्रस्तुत करती हैं जिसमें स्त्री अपने सारे दुखों, तमाम घुटन के बीच भी ताज़ा हवा की एक सांस या सूरज की एक किरण ढूंढ ही लेती है। यही तथ्य स्वाति तिवारी के नवीन कथा संग्रह 'बैंगनी फूलोंवाला पेड़' में बखूबी उभर कर सामने आया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो 'बैंगनी फूलोवाला पेड़' में स्त्री-संसार का कोलाज़ रचती कहानियां हैं।
संग्रह में कुल इक्कीस कहानियां हैं। ये सभी अलग-अलग कथानकों में पिरोयी गई हैं। इन कहानियों में कथ्य का वैविध्य लेखिका की गहन अंतर्दृष्टि को व्यक्त करता है। इन कहानियांे की स्त्रियां घरेलू हैं, कामकाजी हैं, युवा हैं, प्रौढ़ हैं और व़ृद्धा भी हैं। लगभग सभी आयु वर्ग की स्त्रियों के जीवन के विविध पक्षों के विविध पन्ने अंाखों के सामने खुलते दिखाई पड़ते हैं। संग्रह की पहली कहानी है-'बैंगनी फूलोंवाला पेड़'। यह प्रेम के शाश्वत प्रवाह की कथा है। मनुष्य की प्रत्येक पीढ़ी प्रेम के अनुभव से गुज़रती है फिर भी उसे अपनी बाद वाली यानी युवा पीढ़ी में प्रेम की उष्मा सदा नए रूप में प्रतीत होती है। एक स्त्री जो आयु की उठान के साथ-साथ प्रेम की युवा अनुभूति को लगभग खो चुकी थी, एक युवा प्रेमी जोड़े में अपने अतीत के बिम्ब को टटोलते हुए अपनी खोई हुई अनुभूति को पुनः ढूंढ लेती है।
'झूठ की बुनियाद' एक अन्य दृश्य दृष्टगत होता है। समाज ने जो अधिकार पुरुषों को दिए हैं, स्त्रियों को नहीं दिए। पुरुष अपने विवाह से पूर्व और विवाहेत्तर संबंधों के संदभर्ों के साथ गर्व से सिर उठा कर जी सकता है, वहीं स्त्री को संबंधों के एक खूंटे से बंध कर रहने को उसकी नियति बना दिया गया है। लेखिका ने इस कहानी में सदियों से चली आ रही विसंगति पर बखूबी कटाक्ष किया है-'क्या रखा है ऐसे शादी-ब्याह के सुख में। हम किस समाज में जी रहे हैं? एक-दो बच्चों का पिता अपने दूसरे विवाह में निःसंतान स्त्री चाहता है और एक स्त्री अपने दूसरे विवाह को अपराध की नज़र से देखती है, क्योंकि वह झूठ की बुनियाद पर खड़ा किया गया है। पति पाने के लिए अपने बच्चे को छोड़ने के लिए मज़बूर है।' (पृ.21)
स्त्री और मातृत्व का पारस्परिक संबंध प्रकृति प्रदत्त है। 'लौट जा पुत्तर अपने घर' कहानी में मातृत्व के प्रति स्त्री के मनोविज्ञान को समझा जा सकता है। एक युवा स्त्री जो विवाह करती है किन्तु मातृत्व धारण करने के मामले में उसके मन में तनिक भी उत्साह नहीं है। वह स्वयं को जी लेना चाहती है। विवाह के कुछ वर्ष बाद तक मातृत्व धारण न कर पाने के कारण वैवाहिक जीवन को निस्तेज होते देख कर वह मंा बनने को उत्सुक हो उठती है। फिर एक दिन अचानक जब उसे पता चलता है कि वह मंा बनने वाली है तो उसकी अंाखों के आगे उसके वैवाहिक जीवन का महल भरभरा कर गिरता हुआ लगता है। तब उसे अपनी उस मां की याद आती है जो अब इस दुनिया में नहीं है। यदि वह होती तो उसे उचित सलाह दे कर उसके वैवाहिक जीवन को एक बार फिर संवार देती। एक मातृत्व दूसरे मातृत्व में सहारा ढूढता है। यह कहानी संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी बन पड़ी है।
परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने पर केन्द्रित कहानी है 'फैसला'। एक सुन्दर युवती जो स्वाभिमान की रोटी जुटाना चाहती हो, उसे वासना लोलुप पुरुष पग-पग पर हताशा और निराशा ही देते हैं। फिर भी वह झुकती नहीं है और तमाम विषम परिस्थितियों को अपने पक्ष में कर के दम लेती है। 'निष्कासन' स्त्री के उस त्रासदी की कथा है जो प्रायः हर उस कामकाजी स्त्री को भुगती ही पड़ती है जो अपने पति से बड़े पद पर काम कर रही होती है। कोई भी पति अपनी पत्नी को अपने से बड़े पद अथवा अधिक अधिकारों के साथ देखना पसंद नहीं करता है। कतिपय स्वार्थवश यदि वह इस अवस्था को झेल भी ले तो भी वह अपनी पत्नी को हर पल यह जताने से नहीं चुकता है कि तुम चाहे आसमान छू लो लेकिन रहोगी तो मुझसे गौण ही क्योंकि तुम मेरी पत्नी हो और पत्नी तो पांव की जूती होती है। कहानी में ड्राईवर अपनी महिला अधिकारी से कहता है,' मैडम आज आपने पुरुषों के थाली फेंकने का बदला फाईल फेंक कर ले ही लिया।' (पृ.40)
किन्तु क्या यह बदला एक स्त्री लेना चाहती है? नहीं, वह अपने सुखी वैवाहिक जीवन को देखना चाहती है। यदि यह संभव न हो सके तो उसे अपने अस्तित्व को तो बचाना ही होगा न। यह कहानी एक ऐसा मार्ग प्रशस्त करती है जो स्त्री को उसके मान-सम्मान के साथ जीने का अवसर देता है।
'अपने ही कटघरे में' पारिवारिक दायित्वों और कामकाजी परिवेश के बीच संघर्षरत स्त्री की कहानी है। 'स्वयं से किया गया वादा' सास बनने जा रही स्त्री के अंतर्द्वन्द्व की कथा है। एक स्त्री जिसने बहू बनने पर स्वयं को अपनी सास के अनुरूप ढाला, उसे एक बार फिर स्वयं को बदलने की विवशता आ खड़ी होती है जब वह सास बनती है और उसे बहू के अनुरूप स्वयं को ढालना होता है। स्त्री परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने में निपूण होती है, यह उसका प्रकृति प्रदत्त गुण है। किन्तु क्या हर बार यह सहज संभव है? इस प्रश्न का उत्तर इस कहानी में भारतीय परिवारों में सास-बहू के संवेदनशील रिश्ते के आलन के साथ बड़े ही व्यावहारिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
'आजकल' के द्वारा लेखिका ने भारतीय समाज के उस एकतरफा व्यवहार को रेखांकित किया है जिसमें 'सिंगल मदर' की धारणा को सामाजिक स्वाकृति मिलना कितना कठिन है, यह बताया गया है। ऐसी ही अतिसंवेदनशील कहानी है 'अस्तित्व के लिए' इस कहानी में कन्या भ्रण हत्या के मसले को बड़े ही मार्मिक शैली में उकेरा गया है। वहीं 'मुट़ठी में बंद चाकलेट' इस बात की तसदीक करती है कि यदि स्त्री-पुरुष दोनों में पारस्परिक समझदारी हो तो वे अपने विवाहपूर्व संबंध का निर्वाह विवाह के बाद भी गरिमापूर्ण ढंग से कर सकते हैं, बशर्ते उनका प्रेम मात्र दैहिक नहीं अपितु आत्मिक हो।
'फूटी कोठी' एक अलग तरह की कहानी है। यह स्त्री के उस रूप को सामने रखती है जिसमें वह एक प्रेयसी के रूप में अपने प्रेमी द्वारा दिए गए प्रेम के नवांकुर को अपने गर्भ में धारण कर के अपने प्रेमी के विदेश से लौटने की प्रतीक्षा करती है फिर एक दिन सच्चाई के धरातल पर खड़ी हो कर एक ठोस निर्णय लेती है जो उसके अस्तित्व को सही अर्थों में पूर्णता प्रदान कर सकता है।
स्वाति तिवारी की कहानियों में समाज और स्त्री के समीकरण का प्रत्येक कोण बखूबी उभर कर सामने आता है। उनकी ये कहानियां स्त्री विमर्श से अधिक स्त्री के समाज विमर्श पर केन्द्रित हैं क्यों कि इन कहानियों में समाज में स्त्री को उचित स्थान दिलाने का दृढ़ आग्रह है। जैसा कि संग्रह के फ्लैप में दिया गया है-'इक्कीस कहानियों के इस गुलदस्ते में ज़िन्दगी के कई राग-रंग खिल-खिल उठे हैं। यहंा संघर्ष भी है और उम्मींद भी, सपने भी हैं और प्रायश्चित भी, समय का दिखावटी चेहरा भी है और उसे बेनकाब करने की कोशिश भी।'
स्वाति की शैली में वह प्रवाह है जो पाठक को बंाधे रखने में सक्षम है। इन खूबियों के साथ स्वाति तिवारी का कहानी संग्रह 'बैंगनी फूलों वाला पेड़' मन-मस्तिष्क पर छाप छोड़ने वाला पठनीय संग्रह है।
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- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
ः एम-एक सौ ग्यारह, शांतिविहार, रजाखेड़ी,
सागर (मध्यप्रदेश)-470004

पुस्तक समीक्षा



>स्त्री के इर्द गिर्द>- हिंदी कहानी संसार में जिन महिला कथाकारों ने इधर लगातार कथा सृजन किया है और जिनकी कहानियाँ सहज रूप में पाठकों को उस दुनिया में ले जाती हैं जिनके वे सक्रिय पात्र हैं, उनमें स्वाति तिवारी का नाम उल्लेखनीय है। जीवन को एक नई दृष्टि से देखती इनकी कहानियाँ उस अदृश्य तार को पकड़ने की कोशिश करती दिखती हैं जो इस उत्तर आधुनिकता की ओर भागते समाज को आज भी उम्मीदों और आस्थाओं से जोड़े हुए है।
'बैंगनी फूलों वाला पेड' स्वाति तिवारी का नवीनतम कथा संग्रह है। इससे पहले उनके छः कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 'बैंगनी फूलों वाला पेड़' में कुल 21 कहानियाँ संग्रहित हैं। संग्रह की पहली कहानी जो संग्रह का शीर्षक भी है एक प्रेम कथा है। प्रेम एक शाश्वत सत्य है। वह सृष्टि के आरंभ से आज तक प्रकृति के कण कण में तो व्याप्त है ही, रचनाकारों की कलम से हर विधा में अपनी जगह भी बनाता चला गया है। शायद यह एक ऐसा तत्व या भाव हैं जिसमें अतिव्याप्ति शब्द की कोई जगह नहीं। वह अपनी परिणति पर पहुँचे या न पहुँचे, स्मृतियों में तो रहता ही है। कहानी के पात्र तनु और विनय विस्मृत होते पन्ने की धूल झाड़ते हैं, वह भी दूसरों के बहाने। पाठक ठीक विनय और तनु की तरह खुद को वहाँ खोजने लगता है और विनय का कथन कि ''कहानी वही होती है। किस्से वहीं होते हैं। पेड़ कभी गुलमोहर का होता है या बैंगनी फूलों वाला, क्या फर्क पड़ता है'' उसे नॉस्टेल्जिक बना देता है।
ये यथार्थ घटनाएँ हैं जो आम आदमी के जीवन में घटित होती हैं और कथारूप में बदल जाती हैं। बकौल राजेंद्र यादव कि ''कहानी मूलतः यथार्थ का ट्रीटमेंट है, इस यथार्थ को हम कैसे प्रस्तुत करते हैं- एक अनुभव का यथार्थ है, एक वास्तविकता होती है यानी एक जो होता है फैक्चुअल घटना है, जिस तरह से मैं व्यक्तिगत रूप से किसी चीज को देखता हूँ वो मेरा यथार्थ है और उस यथार्थ को हम कई तरह से कह सकते हैं।''
स्वाति तिवारी की कहानियाँ शहरी मध्यवर्ग के इर्द गिर्द बुनी गई हैं खासकर मध्यवर्गीय स्त्री के इर्द गिर्द। तेजी से बदल रहे समाज में वह स्थितियों से संघर्ष करती स्त्री को विशेष रूप से चित्रित करती हैं। स्त्री का द्वंद स्वाति तिवारी की तमाम कहानियों में दिखता है। इसी संग्रह की कहानी 'लौट जा पुत्तर' की माला आधुनिकता और पारिवारिकता के उहापोह में फँसी दिखती है जबकि 'फैसला' कहानी की सुभद्रा परिस्थितियों से लड़ते लड़ते अंततः अपनी उम्र से बड़े पुरुष जो उसका बॉस भी है, से विवाह कर लेती हैं, वहीं 'निष्कासन' की निरुपमा जो उच्चाधिकारी है वह पारिवारिक बंधनों में अपने आपको व्यवस्थित और सहज नहीं कर पाती और अंततः तलाक की पहल करती है। इन तीनों कहानियों की नायिकाएँ स्त्री स्वातंत्र्य की पक्षधर तो दिखती हैं लेकिन वे स्त्री स्वातंत्र्य की अतिवादी दृष्टि के कारण प्रतिक्रियावादी हो गई हैं।
स्वाति तिवारी की कहानी के स्त्री चरित्र स्वयं निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं लेकिन बावजूद इसके वे स्त्रियाँ अपने अंतर्द्वंद में भी उलझी हुई हैं। 'अपने ही कटघरे में' की नायिका आशिमा अपने कैरियर के लिये घर छोड़कर दूसरे शहर जाती है पर उसे बार बार घर गृहस्थी से दूर जाना कचोटता है। स्वाति तिवारी की अधिकतर नायिकाएँ शहरी मध्यवर्ग से आती हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद पारिवारिक संस्कारों से मुक्त नहीं है। विद्रोह का स्वर मुखरित करने के बाद भी वे बार बार पारिवारिकता की तलाश में भटकती हैं। उन्हें अपनी ओर से पहल या समझौते करने में कठिनाई का अहसास होता है पर वे समझौता करने को आतुर भी दिखती हैं। शायद आज की मध्यवर्गीय स्त्री इस दोधारी स्थितियों में जीने के लिये विवश हैं। दरअसल मात्र आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाना भर ही स्त्री के लिए पर्याप्त नहीं है। पुरुष सत्ता के सामने आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री भी उसे हर पल जैसे खुश रखने को अभिशापित है। यह उसकी नियति है और यही उसकी परिणति भी।
इस संग्रह की अन्य कहानियाँ भी ध्यान खींचती हैं। 'ऋतुचक्र' कहानी की नायिका वसुधा अपने विदेश गए पति की प्रतीक्षा मंे सारे भारतीय संस्कारों का पालन अपनी सास के आदेशानुसार करती जाती है। उसका पति भास्कर अनचाहे विवाह में उससे बंध चुका है और बरसों बाद जब वह लौट कर आता है तो प्रतीक्षातुर वसुधा पाती है कि वह अकेला नहीं है बल्कि उसके साथ एक अन्य स्त्री भी है जिसे उसकी सास आशीर्वाद दे रही हैं। स्त्री का स्त्री के प्रति यह दृष्टिकोण आम भारतीय समाज की तस्वीर प्रस्तुत करता है।
विदेश गए एक अन्य युवक की कहानी है 'एलिस के देश में।' यह कहानी विदेश में रहने वाले भारतीयों के संत्रास को बयान करती ऐसी कहानी है जो पैसे के लालच में विदेशों में छोटी मोटी नौकरी करते हैं और अनेक अनचाहे समझौते करते हैं। यह कहानी मानव तस्करी के घिनौने खेल को चिन्हित करने का प्रयास भी करती है।
स्वाति तिवारी की दृष्टि पूरे मध्यवर्गीय समाज के सुखदुख को समेटती है। यथार्थ की भावभूमि पर खड़ी उनकी कहानियाँ उन सारी संेवदनाओं के निकट हैं जिनमें मध्यवर्गीय समाज डूबता उतरता है। वह एक ओर आधुनिकता के मोहपाश में बद्ध होता जा रहा है दूसरी ओर उसकी टँागे परंपरा के बंधन से मुक्त नहीं हो पा रही हैं। 'प्रायश्चित, आजकल और कोई नहीं' ऐसी ही कहानियाँ हैं जो उत्तर आधुनिक होते समाज को चित्रित करती हैं। वहीं 'अस्तित्व के लिये' की नायिका अपनी तीसरी संतान को भ्रूण परीक्षण के बाद यह कहकर कि बेटा होने वाला है उसे जन्म देती है पर फिर से मृत बच्ची का जन्म होता है। कहानी का यह संवाद कि 'बेटे की चाह में जाने अनजाने ही एक हत्यारे समाज को जन्म दे रहे ये लोग' एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। आज का समाज बेटे बेटी में विभेद करते हुए उसी पोंगेपन को बढ़ावा दे रहा है जिसके कारण कितनी ही बच्चियाँ जन्म लेने से पूर्व ही काल कवलित कर दी जाती हैं। आज भी हम एक निर्मम समाज में जीने के लिये विवश हैं।
इसी संग्रह की 'उत्तराधिकारी' कहानी उच्च वर्गीय शोषण की ओर संकेत करती है पर उसका अंत सकारात्मक सेवा है। एक ऐसा अप्रत्याशित जो अविश्वसनीय सा लगता है। कहानी को यही अप्रत्याशित विशिष्ट बना देता है।
संग्रह की एक अन्य प्रेमकथा है 'मुट्ठी में बंद चाकलेट'। मनुष्य कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए उसके संवेग और स्मृतियाँ उसे ऊष्मा देते हैं लेकिन इस ऊष्मा के लिये अपनों से भी झूठ बोलना पड़ता है। शायद संसार के अधिकतर व्यक्तियों की यही स्थिति है। 'फूटी कोठी' इस संग्रह की अंतिम कथा है जिसमें प्रेम का सारा संसार एक झटके से तोड़कर कथा की मुख्य पात्र माता पिता द्वारा निश्चित किये संबंध से विवाह करने को तैयार हो जाती है। एक और वह खुद को छल रही है दूसरी ओर उसे जिससे वह विवाह करने जा रही हैं। दरअसल यह उचित अनुचित और झूठ सच का ऐसा संसार है जहाँ सब कुछ स्वीकार्य हो चला है। मनुष्य अपने लिये जी रहा ह,ै सोच रहा है और अपनी सुविधानुसार ही सब कुछ पाना चाहता है।
स्वाति तिवारी का यह संग्रह 'बैंगनी फूलों वाला पेड़' वास्तव में स्त्री केंद्रित दुनिया के इर्द गिर्द घूमता है जिसमें पुरुष की उपस्थिति तो है लेकिन अधिकतर एक शोषक के रूप में। स्त्री होने के नाते स्त्री मन की गुत्थियों को स्वाति जी ने बहुत निकटता से रूपायित किया है। निश्चय ही उनकी कहानियाँ स्त्री विमर्श के धरातल पर उल्लेखनीय और चर्चा के योग्य हैं।



(आनंद वर्धन)
एफ-5ध्64 चार इमली
भोपाल
२६ मई १० इंडिया टुडे में प्रकाशित

मृगतृष्णाkahani





आसमान छूने की मेरी अभिलाषा ने मेरे पैरों के नीचे से जमीन भी खींच ली, पर तब ... मैं जमीन को देखती ही कहां थी। मैं तो ऊपर टंगे आसमान को ताकते हुए अपना लक्ष्य पाना चाहती थी । तब अगर कुछ दिखाई देता था तो वह था केवल दूर-दूर तक फैला नीला आसमान, जहाँ उड़ा तो जा सकता है, पर उसका स्पर्श नहीं किया जा सकता है। ऊंचाइयों का कब स्पर्श हुआ है जब हाथ उठाओं वे और ऊंची उठ जाती हैं--मरीचिका की तरह। एक भ्रम की तरह आसमान जो नीला दिखता है पर कैसा है, कौन जानता है? जमीन कठोर हो, चाहे ऊबड़-खाबड़, पर उसका स्पर्श हमें धरातल देता है, पैरों को खड़े रहने का आधार। पर यह अहसास तब कहां था ? मैं तो जमीन के इस ठोस स्पर्श को पहचान ही नहीं पाई। अंदर-ही-अंदर आज यह महसूस होता है कि जमीन से सदा जुड़े रहना ही आदमी को जीवन के स्पंदन का सुकून दे सकता है।
आज दस वर्षों बाद उसी शहर में लौटना पड़ रहा है, और जीवन की किताब का वह पृष्ठ जो मैं यहां से जाते वक्त फाड़कर फेंक गई थी, आज वहीं पन्ना हवा के झोंके से उड़ आए पत्ते की तरह फिर मेरे आंचल में आ पड़ा है। उस पर लिखा जीवन का स्वर्णिम इतिहास फिर स्मृति-पटल पर उभरने लगा। यादों का भी क्या खेल है? चाहो न चाहो, पर वक्त-बेवक्त यादें आ ही जाती हैं और उन्हीं क्षणों की अनुभूतियां दिल में जगा ही जाती हैं जिन्हें हम भूलना चाहते हैं। एक कसक बन याद दिला ही जाती है जिन्दगी अपने गुजरे अतीत को। जैसे-जैसे इंदौर पास आ रहा था , मेरी धड़कन अनजाने भय से तेज होती जा रही थी। पता नहीं अरूण लेने आते भी हैं या नहीं ? मन दुविधा में है। दस वर्ष लम्बा अंतराल हमारे मध्य से गुजर गया है। पसरे हुए इस समय और समय ही क्यों, जाने क्या-क्या गुजर गया है... फिर भी एक विश्वास था मन में अरूण के आने का।
देवास के बाद वही जाना-पहचाना रेल रूट। धडधड़ाती हुई एक ट्रेन मन के अंदर भी दौड़ रही थी-- गांधी हॉल के पास से गुजरते हुए दिल की धड़कन तेज और तेज हो गई। बस आने ही वाला था इंदौर स्टेशन, अरूण... अरूण...अरूण... बस यही एक नाम दिलोदिमाग पर गूंज रहा था। एक पल को लगा दस साल अरूण से अलग रहकर भी, अविनाश का साथ होने के बावजूद, शायद ही ऐसा कोई दिन होगा जब अरूण यादों में न आया हो। मै क्यों नहीं भूल पाई उसे ? सच तो यह है कि मेरे रोम-रोम ने अरूण से प्यार किया था। शायद आज भी मैं अरूण से प्यार करती हूँ, अविनाश तो बस...
गाड़ी स्टेंशन पर रूकते ही नजर बेचैनी से अरूण को तलाश कर रही थी। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा, शायद अरूण न आए! पर तब भी मन का कोई कोना आवश्स्त था कि अरूण जरूर आएगा। यदि न आया तो ? शंका ने सिर उठाया। पर अरूण सामने से हाथ हिलाते हुए दिख गया, मैंने भी हाथ हिलाया। लगा जैसे मैं फिर जीत गई। गाड़ी से उतरते ही अरूण ने हाथ मिलाया, हाथ पकड़ते ही तुझे लगा अरूण दस साल के विरह में दोनों हाथ फैलाएगा, मुझे बांहों में समेट लेगा, और कहेगा-- मैं जानता था तुम जरूर वापस आओगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
‘‘ हलो, नीरजा ! कैसी हो ?’’ अरूण ने मुस्काराकर पूछा।
‘‘ ठीक ही हूं।’’ छोटा-सा उत्तर दे मैं चुप हो गई थी। अरूण सहज था, पर मैं उसके हलो से आहत हुई थी। बैगर ज्यादा कहे मैं अरूण के साथ आगे बढ़ गई। अटैची गाड़ी की डिक्की में रख अरूण ने कहा, ‘‘ चलें ?’’
मैं चुपचाप, अरूण के साथ वाली सीट पर आ बैठी थी। उसका चेहरा शांत था। वह निर्विकार भाव से गाड़ी स्टार्ट कर चल दिया। गाड़ी स्टेशन से बाहर निकालकर वह मुझे बरसों पुराने हमारे फेवरेट कॉफी हाउस में ले गया। मैं सोच रही थी। अरूण वहां ले जाकर उन पुराने दिनों को ताजा करना चाहता है। मैंने ध्यान हटाना चाहा इन बातों से, ‘‘कितना बदल गया है काँफी हाउस !
‘‘ हां नीरजा, समय के साथ बदलाव आ ही जाते हैं। देखो, तुम भी तो पहले से मोटी हो गई हो।’’
‘‘हां, कुछ बदलाव न चाहते हुए भी आ ही जाते हैं। मोटा होना भी उन्हीं अनचाहे बदलावों में शामिल है। ’’
एकदम गरिमामय, वातानुकूलित कॉफी हाउस का हॉल, कांच वाली टेबलें, चारों तरफ गमले में सजे हरे-भरे पौधे.. पहले कहां था यह सब यहां। अच्छा लगा मुझे तुम्हारे साथ यहां आना.. गुजरे हुए लम्हों को फिर से जी लेने का मन होने लगा। तुमने आगे बढ़कर मेरे लिए स्टील की वह सुंदर चेयर खींची और अदब से कहा, ‘‘ बैठो, नीरजा। ’’
कॉफी के साथ तुमने कटलेट का भी आर्डर दिया था। कटलेट तुम्हें पसंद नहीं थे, पर तुमने कटलेट स्वाद से खाए। ‘‘ तुम्हारा स्वाद भी बदल गया है, अरूण, तुम्हारा काम कैसा चल रहा है आजकल?
‘‘एकदम बढ़िया।’’ अरूण मुस्कराया-- ‘‘और तुम्हारा ?
‘‘ अच्छा चल रहा है। इस बार मुझे मध्यप्रदेश की फोटोग्राफी का कांट्रेक्ट मिला है। बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है। सोच, इसी बहाने कुछ दिन तुम्हारे साथ रहने को मिल जाएगा।’’
‘‘ कब से काम शुरू कर रही हो ?’’ अरूण ने बगैर किसी उत्साह के पुछा था।
‘‘शायद कल से। ’’ मैंने सहर्ष बताया, ‘‘तुम फ्री हो न, अरूण ?’’
‘‘बस, आज किसी तरह कुछ घंटे निकाल पाया हूँ। नहीं निकालता तो तुम समझतीं, मैं अब तक नाराज हूं तुमसे ।’’
मैं अन्दर ही अन्दर एक बार फिर आहत हुई थी- अरूण्र के पास आज भी मेरेे लिए समय नहीं है! मैं चाय खत्म कर उठ खड़ी हुई थी चलने के लिए।
गाड़ी मैं बैठते ही अरूण ने पूछा था, ‘‘ तुम्हें कहां ड्रॉप करना है ?
‘‘घर।’’
‘‘ हां, हां, पर किसके घर ? अरूण ने चेहरा मेरी तरफ किया था।
‘‘अपने घर, अरूण.. एक बार मैं फिर देखना चाहती हूं उस घर को।’’
मैं आंखों के नम हो आए कोरों को रोक लेती हूंझपकने से। झपकेंगे तो बूंदें टपक ही जाएंगी और मैं अरूण के सामने कमजोर पड़ जाऊंगी।
अरूण ने गाड़ी मोड़ दी। अब पलासिया चौराहे से आगे बढ़ गया। थोड़ी ही देर में हम उसी घर के सामने थे। मैं उतरने लगी तो अरूण ने रोका था, ‘‘ बाहर से ही देख लो, नीरजा.. यह घर तो आठ साल पहले ही हम बेच चुके हैं। ’’
‘‘ क्या ?’’
‘‘हां।’’
‘‘ तो अब कहां रहते हो ?
‘‘विजय नगर में। ’’
‘‘यह कोई नया नगर है क्या ?
‘‘ नया नहीं है । अब वहां हमारे पास फ्लेट है‘‘।
‘ क्यों बेचा, अरूण...मैं नहीं तो तुम तो जुडे रहते इस घर से ....‘ मै मन ही मन सोचने लगी थी । अरूण ने गाडी फिर स्टेशनवाली एबी रोड पर मोड़ ली । मैं चुप बैठी थी । एक बार फिर मैं आहत हुई थी । गाड़ी होटल श्रीमाया के सामने रूकी । अरूण ने रिसेप्शन पर पूछताछ की ओर मेरा सामान रूम में पहुंचवा दिया ।
मैं मौन साधे रही । मुझे लगा, अरूण मुझे घर नहीं ले जाना चाहता ।वह नहीं चाहता कि उसकी अस्त-व्यस्त जिंदगी मेरे सामने उजागर हो । अपने टूटे दिल और बिखरे घर को वह समेट नहीं पाया होगा अब तक, इसीलिए घर की बजाय होटल में छोड़ रहा है।
‘‘ मैं चलता हूं, नीरजा ! तुम अभी यहीं पर हो तो मुलाकात होगी ही। अगर कुछ परेशानी हो तो मुझे इन नंबरों पर कांटेक्ट कर लेना। और हां, यहां की ‘ बेक्ड सब्जी’ स्पेशल है, लंच में जरूर ऑर्डर देना मैं चलता हूं।’’ वह जल्दी में था। मेरा जवाब सुने बगैर ही चला गया।
अगर अरूण की जगह अविनाश ऐसा करता तो मैं तूफान खड़ा कर देती, पर अरूण के इस बर्ताव पर उदासी ने मुझे घेर लिया था । मैं रूम लॉक करके लेटी तो झपकी आ गई।
दो घंटे बाद आंख खुली तो उठने का मन नहीं हुआ, एक मनहूस बोरियत पसरी थी कमरे में। मैं सोचकर आई थी कि अरूण को प्छतावा होगा मुझसे अलग होने का। वह एक बार फिर आग्रह करेगा-- निरजा, अब घर लौट आओ।’ परऐसा कुछ नहीं लगा अरूण के व्यवहार से। रिश्तों का अटूट बंधन न सही,पर कोई तो धागा जुड़ा ही होगा यादों का। पर एक औपचारिक व्यवहार-कुशलता के अलावा अरूण में कुछ भी दिखाई नहीं दिया था। अब क्या करूं, सही सोचते हुए उठी, चाय का ऑर्डर दिया और नहाने चली गई। नहाकर निकली तो थोड़ा फ्रेश लग रहा था। मैंने हल्के आसमानी रंग कर शिफॉन वाली साड़ी पहनी, तैयार हुई और कैमरा लेकर होटल से बाहर आ गई थी। रिक्शा ले राजबाड़े तक जाने का मूड बनाया। ‘ मिनी मुंबई ’! कुछ लोग कहते हैं-इंदौर मुंबई का बच्चा है, पर मुंबई जैसा यहां कुछ भी तो नहीं है। यह शहर एकदम अलग ही--सहज-सरल। मल्टीस्टोरी घर जरूर बनते जा रहे हैं, पर लोग अब भी मालवा की सांस्कृतिक खुशबू समेटे हैं, दुकानों पर चाय-काफी ऑफर होती है, रिक्शे वाले बहनजी या मैडम बुलाते हैं। पता पूछने पर लोग साथ जाकर घर बता आते हैं। और कहीं है इतना अपनापन! इंदौर की यही खास बात मुझे अच्छी लगती है।
मैंने हल्का-सा सरदर्द महसूस किया, पर्स में देखा तो एनासिन मिल गई। पानी का पाउच दुकान से ले एनासिन ले ली। राजबाड़े के जीर्णोद्धार के बाद, अब राजबाड़ा नए स्वरूप में देखा तो कई एंगल से फोटो ले डाले--एकदम अलग ही ढंग के फोटोग्राफ लिए इस बार। सामने वाले गार्डन में माता अहिल्या के भी फोटो खींचे। अकेले घूमने में मजा नहीं आ रहा था। कितना घूमती थी मैं अरूण के साथ राजबाड़े और सराफे में, रबड़ी,गराडू, देशी घी की जलेबी.... कितना स्वाद है यहां के खाने में ! राजबाड़े के पीछे चाट-पकौड़ी-समौसा सब कितना पसंद था मुझे, पर अरूण को यह सब कभी-कभी ही अच्छा लगता था। वह रोज आता था मेरे साथ। पहले एक-एक दोना लेते, दोनों मिलकर टेस्ट करते, फिर एक बार लेते...शिकंजी की ठंडक मन में उतर आती.. अरूण तो शाम होते ही पूछते थे, ‘‘ आज चटोरी कहां ले जाएगी ?
यादों के झुरमुट में भटकते हुए मैं उसी चाट हाउस के सामने पहुंच गई थी। पर अकेले खाने का मन नहीं हुआ, कुछ देर रुककर खाती हुई भीड़ के फोटो लिए और पलटने लगी तो अरूण की आवाज सुनाई दी--
‘‘ ऐ, नीरजा रुको!’’
पलटी तो अरूण मेरी ही तरफ आ रहा था मैं रुक गई। ‘‘बगैर कुछ खाए जा रही हो ? जानती हो तुम्हारे जाने के बाद कई दिनों तक दुकनावाला पूछता था-- आपके साथ वो, चटोरी मैडम नहीं आतीं अब...’’
मैं मुस्करा दी। हल्की-सी चपत लगा देती--ये मजाक कर रहे हो क्या? पर ऐसा कुछ नहीं कर पाई। अरूण मेरे हाथ में पेटिस चटनी का दोना पकड़ा एक छोटे-से बच्चे को लेने आगे बढ़ गया। एक खनकती-सी आवाज सुनाई दी थी, ‘‘ अरूण, देखो बंटी कहां है !’’
मैंने आवाज की तरफ देखा-दुबली, गौरवर्णी सुन्दर-सी स्त्री अरूण से बच्चा ले रही थी। वे तीनों मेरे पास आ गए थे। अरूण ने परिचय करवाया, ‘‘ नीरजा, ये अंजली है माई वाइफ और ये हमारा बंटी। और अंजली , नीरजा को तो तुम जानती ही हो। ’’
‘‘हलो!
‘‘हाय!’’
‘अंजली...अंजली माई वाइफ...। मेरे कानों में सीसा-सा उड़ेलते हुए शब्द थे। अरूण ने शादी कर ली। उसका बेटा भी है। सुबह दो घंटे साथ रहा, पर बताया तक नहीं। मैं भी बच्चे को गोद में ले प्यार करने लगी, बेटा सचमुच बहुत प्यारा है एकदम अरूण की तरह। मैंने पर्स में हाथ डाला सौ-सौ और पांच-पांच सौ के नोट थे। मैंने पांच सौ का एक नोट बच्चे को शगुन कहकर पकड़ा दिया था।
पैरों में अब मानों ताकत नहीं थी। मैं फिर मिलने का वादा कर ऑटो से होटल लौट आई। सारे रास्ते ‘अंजली, माई वाइफ’ शब्द मेरा पीछा करते रहे। मैं थक गई थी खुद से लड़ते-लड़ते। मैं अब भी अरूण से बंधी हूं मन से और अरूण....एक बार भी एक्स वाइफ के रूप में भी नहीं मिलता, न ही किसी से मिलवाता है।
‘‘ कल मिलती हूं।’’ कहकर मैं लौट आई थी होटल में। लंच मैंने लिया ही नहीं था और डिनर लेने का अब मन नहीं था। कमरे में लौटकर मैं निढाल हो पलंग पर पड़ी रही। खूब रोई थी। इतना तो शायद जब अरूण से अलग हुई तब भी नहीं रोई थी। कमरे में अंधेरा पसरा था, पर मन लाइट जलाना नहीं चाहता था। शायद बिजली के उजाले में खुद को खुद ही फेस नहीं कर पाने के डर से अंधेरे में छिपकर बचाना चाहती थी। पर क्यों?
अंधेरे में जो मानक गढ़े और जिनको आधार बनाकर मैंने अपने भविष्य को गढ़ा था,उससे यदि मैं खुश और सुखी रह सकती होती तो आज रोती ही क्यों कितना सरल-सहज जीवन था जो अरूण के आगोश में सुरक्षित-सा था,पर महत्वाकांक्षा उछालें मार रही थी । गृहस्थी के दायित्व यूं तो कुछ थे ही नहीं, पर तब भी मैं उस बंधन से मुक्ति मांग बैठी थी पर समय ने मेरे सारे मुगालते दूर कर दिए । आज अरूण,अंजली और उनके बच्चे को जिन्दगी जीते हुए देखा, तभी से लगा, मैं हार गई । अपनी सारी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के बाद भी हार महसूस कर रही हूं । लग रहा है, आज उस मोड़ पर खड़ी हूं जहां जीवन के रास्ते सरल हैं, पर जी पाना अब दूभर है ।
मैं केवल स्टिल फोटोग्राफी में ही कैरियर बनाती रही । नाम,याश,पैसा,क्रिएशन्स,रचना,सृजन कितने शब्द थे मेरी महत्वाकांक्षा की डिक्शनरी में, पर असल तस्वीर तो अंजली ने बनाई है अरूण की-बंटी के रूप में । रचना भी वही,सृजन भी ओर क्रिएशन भी । स्त्री के स्त्रीत्व का अनमोल क्रिएशन मैं नहीं कर पाई । शायद अविनाश न आया होता जीवन में तो महत्वाकांक्षा यूं प्रबल नहीं होती ‘अरूण ‘ जैसा सूर्य था मेरे पास । अब कितना मुश्किल है ऐसे किसी सूर्य को खोज पाना । अरूण सूर्य था । हां, पर अविनाश एक ऐसा अकर्मण्य अंधकार ले आया था जिसने नई इच्छाशक्ति जगाई थी । पर आज आभास हुआ कि वे मृत्युमुखी इच्छाशक्तियां थीं । उसने मेरे कैरियर में सुविधा का सागर जुटाया, पर मेरा भविष्य डुबो दिया । नहीं भागी होती उस दिशा में तो बंटी मेरा होता ।
पर तब एक ही जिद थी- नहीं चाहिए अभी बच्चा । मैं एबॉर्शन पर अड़ी रही थी । अरूण रो दिया था मेरे फैसले पर । ऑटोमेटिक कैमरे से तुरन्त बंटी की तस्वीर बाहर निकाली । न चाहते हुए भी उस पर प्यार आ रहा था । उसे घंटों प्यार से देखती रही । अंदर ही अंदर एक अनजानी आवाज सुनाई देती रही, ‘मम्मी...मम्मी...मम्मी‘ और अकेले ही उस फोटो से बात करने लगी थी मैं- ‘ बंटी तुमने आज जैसे मेरा वजूद ही बदल डाला...’
‘मां’ बनना शायद स्त्री की आत्मा में दबी सबसे बड़ी महत्वाकांक्ष होती है, जो पता नहीं कब सिर उठा लेती है। अरूण चाहता था, मैं मां बनू, पर मैं नहीं चाहती थी। अब मैं चाहती हूँ, पर अविनाश के साथ शादी ही नहीं की तो वह बच्चे के लिये क्यों तैयार होगा! मैं उदासी से बचना चाहती थी। रूम से निकल होटल के टैरेस पर आ गई। आसमान एकदम साफ था, लाखों तारे टिमटिमा रहे थे। मैं ढूंढने लगी अपनी कोख से तोड़े उस अंकुर को जो पता नहीं कौन-सा तारा बना होगा। अचानक धीरे से किसी ने कंधे पर हाथ रखा.. पलटी तो सामने अंजली थी और अरूण बच्चे को संभाल रहा था।
‘‘ नीरजा, हम तुम्हें डिनर के लिए लेने आए हैं फटाफट तैयार हो जाओं।’’ यह अरूण का स्वर था।
‘‘ मुझे.. नहीं मैं यहीं ठीक हूं। ’’
‘‘ आप चलिए न। घर आपकों याद करता है। प्लीज नीरजाजी! एक बार हमारे लिए चलिए।’’
‘‘ अंजली, मैं कल लंच तुम्हारे यहां लूंगी, आज मुझे माफ कर दो... आज मन बहुत उदास है।’’ मैंने अंजली के कंधे को हल्का-सा थपथपाया था-- ‘‘ आओ नीचे चलते हैं। यहीं कुछ साथ में लेते हैं। अरूण, तुमने बताया था न यहां ‘बेक्ड मशरूम’ बहुत अच्छा बनता है, चलो सब मिलकर टेस्ट करते हैं।’’
वो मान गए । मुझे लगा उन्हें तो मानना ही था। दोनों सरल और सहज हैं कुंठाएं नहीं पालते। अड़ियल स्वभाव तो मेरा था, इतने मान-सम्मान से लेने आए और मैं नहीं गई। अरूण मुझे जानता है, मैं हूं ही ऐसी, इसीलिए उसने बार-बार आग्रह नहीं किया। संबंधों में तनाव भरे रहना आदत है मेरी। जानती हूं कि कहीं न कहीं गलती मेरी अपनी ही होती है। तभी तो आज यहां इस मुकाम पर एकदम अकेली हो गई हूं। खुद को सुधारकर दूसरों के हिसाब से व्यवहार करके दाम्पत्य में सुख खोजा जा सकता था। प्यार और काम-भावनाएं सदा एक-सी नहीं रहती, जीवनपर्यन्त वे घटती-बढ़ती रहती हैं... सही तालमेल करना आना चाहिए, पर वही मुझे नहीं आता।
कमरे में लौट रही थी। रिसेप्शन पर चाबी लेने पहुंची तो पता चला, अविनाश का चार बार फोन आ चुका है। ‘क्या हुआ अविनाश को ? फोन लगाया और रूम में ट्रांसफर करवा लिया।
‘‘कैसी हो, नीरजा? तुम्हें वो मिले या नहीं तुम्हारे अरूणजी? अविनाश आदत के अनुसार मजाक करने से बाज नहीं आता।
अविनाश से बात की तो अच्छा लगा, मन पर से थोड़ा-सा बोझ कम हुआ-सा लगा। मैं फिर कमरे में लौट आई। दिनभर के फोटोग्राफ छांटकर अलग किए। सुबह के लिए कुछ प्लान बनाए। आधा ग्लास रम का बनाया, खुद ही चियर्स कर लेट गई। यह आधा पेग लेने की आदत मुझे अविनाश ने डाली। उसे लत है, उसके साथ मुझे भी लग गई। अरूण को देर रात तक काम करने की आदत है, पर वह अच्छी-सी अदरक-इलायची वाली चाय लेता है।
बिस्तर पर पड़े-पड़े सोचतीरही--‘सत्य क्या है? जीवन का ‘सत्य’? लगा, सत्य के लिए भटकना नहीं पड़ता। मैं भटक रही थी। आज सत्य को पा लिया था। अपने भीतर के सत्य को अपने भीतर से ही पाना होता है। वह ढूंढने, मांगने या शब्दों से बयां नहीं होता, अनुभव से उतरता है। आज एक सत्य को मैंने बंटी को देखने के बाद खुद में पाया और पहचाना... और सचमुच कड़वा होता है सत्य। फोटोग्राफी में अविनाश की मदद और गाइडेंस से तब मेरा काम चल पड़ा था--एक लड़की और इतनी अच्छी फोटोग्राफी! लोग अक्सर यह जुमला बोलते थे और मैं गर्व से तन जाती थी। प्रशंसा अगर केटेलिस्ट है तो अति प्रशंसा स्लो प्वाइजन। मेरी बातों, मेरे काम, मेरी कला में अहंकार झलकने लगा था। वह अहं ही तो था जो मेरे और अरूण के मध्य पसर गया था, वरना आज अंजली नहीं, मैं.. हां मैं नीरजा ही बंटी के साथ होती।
क्यों हो गया यह सब... हमारे तो संबंध भी शुरूआत में अच्छे थे। हमने तो प्रेम-विवाह किया था। आज समझ में आ रहा है। सेक्स और आपसी समझ जहां एक-दूसरे के पूरक हैं, वहीं एक-दूसरे पर पूरी तरह निर्भर भी हैं, पर हम प्रेम-विवाह के बावजूद बिना एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र किए, बिना उन्हें समझे, एक-दूसरे से धीरे-धीरे अजनबी होते गए। तो क्या विवाह के शुरू के महीनों में जो कुछ था वह महज ‘इनफैचुएशन’ (यौनाकर्षण) ही था.. केवल शारीरिक आकर्षण मात्र? शायद हां, वह स्वाभाविक था, पर वहीं मैं चूक गई। यही तो वह समय था जब हमें एक-दूसरे की रुचियों से, शौकों ◌े, पसंद-नापसंद से जुड़ना चाहिए था। तभी पनपता वह प्यार जो मैंने अंजली की आंखों में लबालब देख लिया था, वहीं प्यार जो अरूण मुझे करना चाहता था, पर वह अब पूरी तरह अंजली को अर्पित है। हां, अंततः यही प्यार है, जिसके लिए दुनिया भागती है और जिसे मैं ठुकराकर चली गई थी। यही तो वह सिलसिल है जो आगे चलकर एक सुखी सफल लम्बे वैवाहिक जीवन की नींव बनता है। मैंने नींव रखी ही नहीं और अब ध्वस्त अवशेषों पर आंसू बहा रही हूं।
आखिर कोई कब तक सहन करता! और यही हुआ अरूण के साथ। एक दिन मैं अविनाश के आकर्षण में जमीन से ऊपर उठ गई और बिफर पड़ी थी अरूण पर। पर कहां जानती थी, पैरों के नीच अब जमीन आएगी ही नहीं।
होटल के कमरे की खिड़की सड़क की तरफ खुलती है। परदा हटाया और सड़क की तरफ देखने लगी। सुबह होते ही उस पर निरंतर ऑटो,टेंपों,बस,साइकिलों और पैदल यात्रियों का आना-जाना चालू हो गया था। बस, यही एक भीड़ इंदौर को मुंबई का बेटा बना देती है। स्कूटर पर जाता एक जोड़ा अच्छा लग रहा है। लड़की मस्टर्ड कलर का सूट पहने है और चेहरा स्कार्प सेढका हुआ है। वह लिपटी हुई-सी बैठी है स्कूटर चालक से। उसे लगा, आजकल प्रदूषण से बचाव के नाम पर मुंह पर आतंकवादी स्टाइल में कपड़ा लपेटने के कई फायदे हैं-- कोई पहचान भी न पाए कि कौन किसके साथ घूम रहा है.. पर यह उम्र ही ऐसी होती है। वह भी तो स्कूटर पर अरूण के पीछे ही बैठती थी।
कितनी बातें थी जो यूं लांग ड्राइव पर जाते हुए ही होती थीं। और तब अविनाश से बात किए दो-तीन दिन गुजर जाते हैं। मैं महसूस कर रही हूं कि दिलो-दिमाग में फिर हताशा रेंगने लगी है। लगा, एकाएक बहुत भावुक हो आई हूं। क्या पाया मैंने? क्या खो दिया? यश,नाम, रूपया,स्वतंत्रता जैसे बड़े शब्द हैं, जो मैं प्राप्ति के पलड़े में रख सकती हूं, पर दूसरे पलड़े में एक सुंदर घर, बांहों में समेटता पति, मुस्कराता बंटी आकर बैठ जाते हैं तो वह पलड़ा भारी होता चला है-- इतना भारी कि जमीन छूने लगता है। दूसरे पलड़े के हवा में लटकने का अहसास एक त्रासदी की तरह कड़वा लगा। यह अहसास इंदौर लोटने के बाद ही ज्यादा कचोट रहा है। इससे तो न ही आती तो अच्छा था। अविनाश ने तो कहा भी था, ‘‘ क्या करोगी जाकर?
‘‘अरूण से मिलने का दिल कर रहा है।’’
‘‘जो अतीत का हिस्सा हो जाते हैं, उनसे मिलना तकलीफ देता है, नीरजा! मेरे ख्याल से न जाओं तो अच्छा है।’’
‘‘तुम अरूण से जैलेस हो रहे हो, अविनाश ?’’
‘‘ तुम पागल हो गई हो? अरूण मुझसे ईर्ष्या कर सकता है, मैं क्यों करूंगा? तुम उसे छोड़ मेरे साथ आई हो’’
‘‘ मैं तो मजाक कर रही हूं, अविनाश।’’
मैं इन विचारों से उबरना चाहती हूं चाय और नाश्ता रेस्तरां में जाकर लेती हूं, ताकि ध्यान बंटे। ‘इडली-सांभर’ मंगवाती हूं। नाश्ता कर चाय लेती हूं तो याद आता है--यहां चाय बेहद मीठी बनती है। ‘मालवा की चाय ’ चाय नहीं, चाय का काढ़ा होती है, पर स्वाद में अच्छी लगी। धीरे-धीरे चुस्कियां लेने लगी। चाय समाप्त हुई ते नजर सामने बैठी महिला पर गई। नजरें मिलते हम एक-दूसरे को पहचान गए।
‘‘नीरजा ?’’ वह महिला उठकर आ गई।
‘‘शुभा..शुभा शर्मा ?’’
अब शर्मा नहीं... शुभा जोशी हूं।’’
‘‘अच्छा?’’
‘‘ कब आई इंदौर?
‘‘ बस, कल ही आई हूं। कुछ फोटोग्राफ लेने थे राजबाड़ा, मांडू,महेश्वर वगैरह के।’’
‘‘अरे वाह...’’
‘‘तुम कैसी हो, शुभा?’’
‘‘ अच्छी ही हूं, शाम को आओ घर। खाना हमारे साथ लेना... ये मेरा कार्ड।’’
‘‘नहीं शुभा..’’
‘‘क्या नहीं ? अरूण अंजली से मिली ?
‘‘हां’’
‘‘उन्हीं भी बुला लेते हैं शाम को।’’
वह चली गई और मैं रूम में लौट आई।
रूम में फिर वही अकेलापन था। तन्हाई जीवन को उलट-पलटकर देखने का अवसर देती है और फिर अपनी ही मत्वाकांक्षाओं,अपनी भावनाओं की समीक्षा करने लगी। लगा, वैवाहिक संबंध कितने शाश्वत होते हैं, कितने पवित्र और सात्त्विक। अविनाश् के उत्तेजनापूर्ण संबंधों में स्थायित्व नहीं हैं, वे क्षणिक आवेश ही थे। अरूण को अंजली के साथ संतुष्ट जीवन जीते देख लगा, अरूण को दोबारा कभी भी पा लेने का दंभ आज टुकड़े-टुकड़े हो गया है। छोड़कर जाना बचपना ही तो था! अब आज मैं स्वतंत्र हूं, परिपक्व भी और गढ़ सकती हूं अपना जीवन, पर संतुष्ट परिवार का सुख दोबारा चाहकर भी अब नहीं गढ़ा जाएगा।
मैं--नीरजा--आईने के सामने खड़ी हो गई, माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आई थीं। रंग अब कलसाने लगा है। आंखों के नीचे उम्र झुर्रिया बनकर उतरने लगी है तो क्या मेरा समय टल गया?
कमरे में ही सारा दिन अपनी ही नकारात्मक समीक्षा करते हुए निराश हो चली। कमरे में टहलने के बाद स्नान किया। कपड़े बदले, संवारकर देखा तो लगा, अब भी अच्छी लगती हूं। बाहर अंधेरा होने लगा। टैक्सी बुलवाई और पचमढ़ी के लिए चल पड़ी। अरूण को सूचना देना मुझे जरूरी नहीं लगा।
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