शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

आज का विचार


‘‘प्रत्येक दिन एक छोटा—सा जीवन है और हमारा सम्पूर्ण जीवन मात्र एक दिन है।’’



जोसफ हॉल

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

कहानी
रिश्तों के कई रंग
September Give Away
अब कोई वर्जना नहीं
यह मेरे प्रेम की शुरूआत थी, पर उसकी बेवफाई का चरम था। वह आयी थी अपनी ज़रूरतों के हिसाब से, पर रहते-रहते वह मेरी ज़रूरतों का हिस्सा बन गयी थी। उसका आना एक सहज घटना थी, जो मेरे द्वारा एक लड़की की मदद थी, पर आज की घटना एक अप्रत्याशित मोड़ था, जो चलते-चलते अचानक आ गया था। वह सफलता की मरीचिका में भटक रही है। एक ऐसी मरीचिका, जिसमें भटकते-भटकते जीवन और सफलता दोनों चूक जाते हैं और मंजिल तो दूर रास्ते भी दिखाई नहीं देते, उसे उसी मरीचिका का रास्ता दिख रहा था तभी तो वह बाय-बाय बोल कर दरवाजा भड़ीक कर चली गयी हमेशा के लिए....मैं बन्द होते-खुलते दरवाजे को टकटकी लगाए देख रहा हूँ। जानता हूँ अब वह कभी नहीं आयेगी....आना होता तो वह जाती ही क्यूँ? पर एक चाह सी थी मन में कि वह पलट कर आए....मेरे हाथ जोड़ कर अपनी गलती के लिए माफी माँगे और मैं उसे धक्के मार कर निकाल दूँ। मेरे अन्दर का पौरूष उसके यूँ जाने से आहत हुआ था। लगा वह मेरे वजूद पर लात मार कर चली गयी है। एक लड़की के द्वारा यूँ नकार देने पर मेरा 'मेल इगो हर्ट हुआ था। जानता था, वह बिल्कुल इमोशनल नहीं है, परफेक्ट प्रेक्टिकल वूमन है। पूरी तरह लीव इन पार्टनर जो यूज एण्ड थ्रो में विश्वास करती है। उसके लिए डेटिंग एक फिजिकल डिमांड थी, अपनी बायलोजिकल नीड्स को पूरा करने की। मैं भी तो कहाँ स्थायी प्रतिबद्धता रखना चाहता था, पर यूँ तीन साल साथ रहते एक आदत सी हो गयी है उसकी और आदतों से उबरने में मुझे समय लगता है। जब आयी थी वह...हाँ इसी दरवाजे से तब भी मुझे अपना फ्लैट एक वर्किंग लड़की के साथ अपने बेड सहित शेयर करने में भी आदत डालने में समय लगा था। मुझे पलंग पर पसर कर टाँगे फैला कर सोने की आदत थी, पर फिर उसकी आदत हो गयी थी। दरवाजे पर किसी की आहट से मैं चौंककर उठता हूँ।
दूध ब्रेड वाला है, वह पूछता है-''मेमसाब को अण्डे तो नहीं चाहिए।''
''नहीं, तुम जाओ।'' भाड़ में गई तुम्हारी मेम साब, वो अब ना अण्डे दे सकती है, ना अण्डे ले सकती है।
वह चेहरा देखता है मेरा और लिफ्ट का बटन दबा देता है, मैं पलटता हूँ। दरवाजा बंद करके टीवी ऑन करता हूँ....बिपाशा अपनी लम्बी चिकनी खुली टाँगें दिखाते हुए जादू है नशा है, गा रही है। गुस्सा आता बिपाशा पर साल्ली-ऽऽऽ--! सारी दुनिया की लड़कियां बिपाशा बनती जा रही हैं। गुस्से में चैनल बदलता हूँ, मल्लिका शेरावत को देखते ही फिर निक्की याद आ जाती है। मल्लिका के शरीर का भूगोल बिल्कुल निक्की की तरह गोल है।
शायद मैं भी इसी में उलझ कर उसको सहर्ष लिव इन पार्टनर बना बैठा था। वरना बाहर सब चलता था,पर फ्लैट पर लड़की लाना पसंद नहीं था। मैं एक बार फिर पसर जाता हूँ अपने बिस्तर पर। छत के सफेद प्लास्टर के शून्य में कुछ खोजता हूँ।
कॉल सेन्टर से बाहर निकलते हुए उससे मेरी मुलाकात हुई थी, शायद कुछ परेशान थी किसी से बात करना चाहती थी, पर बात नहीं हो पायी थी। निराश और उद्विग्न थी। व्यक्तित्व में उग्रता और बेपरवाह। बार-बार नम्बर डायल करती रही....और मुझे अपनी ओर देखता, चली आयी थी मेरे पास ''क्या मेरी मदद करोगे?'' कोई कमरा या फ्लैट चाहिए है। ग्राफिक्स कम्पनी में काम करने के साथ वह पार्ट टाइम मॉडलिंग भी करती है। सीधे-सीधे सपाट शब्दों में वह कहती है कि उसे किसी लिव इन पार्टनर की तलाश है। अभी वह एक एंग्लोइंडियन एजेड लेडी के यहाँ पेइंग गेस्ट है। पर पिछले दस दिनों में बुढ़िया रोज तंग कर रही है ''कमरा खाली माँगता।'' जान खा रही है मेरी जब तक कोई व्यवस्था नहीं हो जाती यूँ ही रोज शाम खराब कर देती है मेड वूमन।
''वर्किंग गर्ल्स होस्टल क्यूँ नहीं चली जाती।'' मैंने सलाह दी थी।
''देट शीट प्रिजन, वेयर यू आर लॉक्ड इन आफ्टर 7 ओ क्लॉक, देट्स जस्ट लाइक ए पोल्टरी फार्म वेयर आल चिकन्स आर पुट अप।'' और हम दोनों ही ताली मार कर हँसे थे। यार पोल्ट्री फार्म से तो मेड वूमन बेहतर है।
चलो कल मिलते हैं, कह कर हमने एक दूसरे के नम्बर ले लिए थे। अगले दिन दफ्तर से ही उसने फोन मिलाया था। वह शाम हमारी एक तरह से ब्लाइंड डेट थी। वह वहीं से मेरे साथ फ्लैट पर आ गई थी। सारी वर्जनाएँ तोड़ते हुए उसने पहल की थी यह कहते हुए कि दस दिनों के तनावों से रिलेक्स होना चाहती है और यह भी कि हम जब तक साथ रहेंगे एक दूसरे के प्रति वफादार रहेंगे पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं रहेगी कि हम किसी दूसरे से संबंध नहीं रख सकते।
एक पल को लगा था क्या यह इंडियन लड़की है? ज़रूर माता-पिता में से कोई एक...ऽऽऽ। पूरी तरह पश्चिमी जीवन मूल्यों से प्रभावित। अपने मतलब के लिए वह अपनी वर्जनाएँ तोड़ देती यह कहना भी गलत होगा। वर्जनाएँ तो उसके साथ है ही नहीं। रात में सफेद वाईन में बर्फ के टुकड़े डालने के बाद उसकी दुनिया ही बदल जाती है। कहती है रोमांस एक पागलपन है इसके लिए उसे समय नहीं गँवाना, सेक्स उसके लिए शरीर की ज़रूरत है। पैसा वह भरपूर कमाती है उसने अपने पिता की बेवफाई के बाद अपनी माँ को पागल होते देखा है। जीवन भर का ढकोसला शादी उसे पसंद नहीं। पर जब भी अंतरंग होती एकदम किसी अलग मूड में लगती। उसकी नसों में रेंगती उतावलेपन की कँपकँपी के साथ ही वह मेरी सम्पूर्ण देह को अपनी बाँहों में लपेट लेती और बोलने नहीं देती। कभी भीतर तक तन्मय होती तो आई लव यू कह कर लिपट जाती वरना देह के आदान-प्रदान से ज्यादा उसके लिए मेरा कोई वजूद नहीं था। शायद वह अपनी माँ की दबी-कुचली पति द्वारा उपेक्षित सेक्सुअलिटी से इतनी ज्यादा भयाक्रांत रही होगी कि उसके लिए सब कुछ वहीं तक सिमट कर रह गया है। शोहरत और सम्पन्नता के आसमान को अपने वश में करने की ख्वाहिश उसके मन में विस्तार की सारी हदों के पार तक फैली थी। ''वेलेन्टाइन डे'' पर रेड रोज की एक सो एक कलियाँ दी तो मुस्कुराई थी फिर गले में झूम गई। अपना सारा भार मुझ पर डालते हुए कहा था तुम लड़के ना वेलेन्टाइन की बात को कुछ ज्यादा ही रोमान्टिसाइज करते हो।
तीन साल साथ रहते-रहते मैं उसे शायद प्यार करने लगा था और वो जब भी मेरे पास होती मैं अपने दृष्टिकोण और आत्मा के सुप्त आदर्शों को अनगढ़ रूप देता। किसी धुंधली अधूरी तस्वीर की तरह हमारे रिश्ते के कई रंगों के बीच छूटी हुई जगह साफ नजर आने लगती। मैं भरना चाहता था इस रिक्त जगह को। उसके साथ अपने रिश्ते को।
उससे कहता उसके पहले ही अचानक डिस्को में उसे किसी ओर के साथ मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया... यह जानते हुए कि हम स्वतंत्र है। हमारे पास घर-परिवार जैसे शब्द नहीं। बटन दबा कर या क्रेडिट कार्ड स्वैप करके पैसा निकालने और डालने वाली तेज रफ्तार जिंदगी है। हम आदम और हव्वा तो हो सकते हैं पर सोनी महिवाल या लैला मजनू नहीं, फिर भी मैं लगभग खिंचते हुए उसे अपने साथ ले आया था। फ्लैट पर आते ही मैंने उससे माफी माँगी थी। ''निक्की, मैं घर बसाना चाहता हूँ तुम्हें निकिता बुलाना चाहता हूँ।''
''डू यू नो वाट आर यू सेइंग।''
तुमने आज जो किया उसके बाद भी तुम मुझसे....ऽऽऽ? जानते हो वो मेरा नया प्रोड्यूसर था मॉडलिंग की दुनिया में अभी तो मेरी दूसरी एड फिल्म बनने वाली है। शादी करके मैं अपना सारा केरियर.....उसने मुझे पाँच फिल्मों में साईन किया है। जानते हो नया फ्लैट देने वाला है, ये सब छोड़कर शादी? और फिर फ्लैट मिलते ही चली गयी। आज पूरे तीन साल दो दिन हुए हैं हाँ, एक हजार सतान्वे दिन। इस दहलीज में आने को। मैं अन्दर से अब भी आदिम पुरूष हूँ। स्त्री को वश में रखने की चाह रखने वाला पर वह अब आदिम स्त्री नहीं है वह ''आइ जनरेशन'' की ''एपल गर्ल'' है। मैं इस दहलीज को ही स्त्री की सारी वर्जना समझ बैठा पर उसके लिए अब कोई वर्जना नहीं है। छोटी सी दहलीज पर मेरा इतना बड़ा अटकाव कि वह अब इसमें कैद रहेगी मेरी बन कर। क्यों? जानता हूँ वह कोई मेहंदी रचे रोली के छापे देते गृहलक्ष्मी के पैर लेकर इस दहलीज में नहीं आयी थी। याद है मुझे उसकी खुली टाँगों वाली स्कर्ट और पैंसिल हिल वाली सैंडिल।

डॉ. स्वाति तिवारी
ई एन1/9, चार इमली,
भोपाल-462016

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010







शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

गांधी : विश्व समाज के निर्माता
डा. स्वाति तिवारी
तुम रक्तहीन तुम माँसहीन
है ! अस्थिशेष तुम अस्थिहीन
तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल
हे ! चिरपुराण .....हे चिरववीन ।
उक्त पंक्तियां महात्मा गांधी के लिए कही गयी थीं, क्योंकि वे कल भी प्रासंगिक थे और आज भी प्रासंगिक हैं। आधुनिक युग के एक महान पुरुष एवं युग निर्माता जिनके बगैर आधुनिक भारत की एवं यहाँ के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वे एक ऐसे भारतीय व्यक्तित्व थे जिन्होंने हमारे प्राचीन दर्शन एवं संस्.ति से प्रेरणा प्राप्त की, समकालीन विश्व ज्ञान एवं तकनीक को समझा एवं भावी विश्व-बंधुत्व वाले विश्व की कल्पना की। भारतीय इतिहास इस महान आत्मा का सदैव ऋणी रहेगा। वे इतिहास में सत्यनिष्ठ, समाज सुधारक, विचारक तथा मुक्त मनुष्य के रूप में स्थापित हुए। वे अपने आदर्शों एवं धार्मिक चिन्तन के कारण महात्मा कहलाए। उन्होंने राजनीति में नैतिकता का समावेश करके विश्व के सामने एक अद्भुत आदर्श प्रस्तुत किया। उनकी राजनीति सत्य और अहिंसा पर आधारित थी। सत्य और अहिंसा पर आधारित उनका जीवन दर्शन ''गांधीवाद'' कहा जाता है, जिसे आम बोल-चाल एवं आज की भाषा में गाँधीगिरी भी कहा जाने लगा है। उन्होंने एक ऐसे विश्व-समाज की परिकल्पना को जो 'रामराज्य' के समान लोक हितकारी राज्य पर आधारित थी। स्वराज के लिए उनकी मान्यता थी कि जब जनता इतनी शिक्षित हो जाए कि वह सत्ता का सदुपयोग, संतुलन एवं नियंत्रण कर सके, तब स्वराज आएगा।
गुजराज के काठियावाड़ जिले में पोरबन्दर नामक स्थान पर दो अक्टूबर 1869 ईस्वी को जन्मे मोहनदास करमचन्द गाँधी ने धर्म और राजनीति का समन्वय किया। वे धर्म (आचरण) और व्यवहार को एक साथ देखते थे। गाँधीजी का 'सर्वोदय' सिद्धांत समूची मानव जाति के कल्याण की भावना पर आधारित है। उनका सर्वोदय सिद्धान्त प्रजातंत्र की लीक से हटकर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित है जिसकी स्वभावगत प्र.ति आध्यात्मिक रही। महात्मा गाँधी के अनुसार सर्वोदय आधारित समाज में सभी व्यक्ति आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों से संचालित होते हैं। इसीलिए उनके सर्वोदय में समाज के सबसे निचले वर्ग के उत्थान एवं कल्याण की भावना में भी आध्यात्म दिखाई देता है। सर्वोदय से उनका तात्पर्य सर्व उत्थान से ही था। उनके अनुसार यदि सर्वोदय सिद्धान्त का पालन प्रत्येक व्यक्ति करे तो रामराज्य स्वतः स्थापित हो जाएगा। इसीलिए वे सत्ता का विकेन्द्रीकरण चाहते थे जिसका रूप ग्राम स्वराज्य ही था। आदर्श समाज के लिए शासन के क्षेत्र में ग्राम पंचायत व्यवस्था तथा आर्थिक क्षेत्र में कुटीर-उद्योग उन्हें मान्य थे। चरखा उनकी विकेन्द्री.त आर्थिक व्यवस्था का प्रतीक है। वे शोषण समाप्त करने के लिए आस्तेय एवं ट्रस्टीशिप के सिद्धान्तों की आवश्यकता पर बल देते थे।
उनकी मान्यता थी कि सच्ची सभ्यता जानबूझकर आवश्यकताओं को बढ़ाने में नहीं हैं, आवश्यताओं को घटाने में हैं। उनका मानना था कि जीवन का निर्माण और जगत की रचना शुभ और अशुभ, जड़ और चेतन को लेकर हुई है। इस रचना का प्रयोजन यह है कि असत्य पर सत्य की और अशुभ पर शुभ की विजय हो।
महात्मा गाँधी का दर्शन एक प्रकार से जीवन, मानव समाज और जगत का नैतिक भाष्य है। इसीसे उनकी अहिंसा का प्रादुर्भाव हुआ। गाँधीजी मानते थे कि संसार में जो कुछ अनैतिक है वह सब हिंसा है। उनकी इसी चिन्तनधारा से असहयोग और सत्यागृह का जन्म हुआ। उनकी .ष्टि में अहिंसा अमोघ शक्ति है जिसका पराभव कभी हो नहीं सकता। सशस्त्र विद्रोह से कहीं अधिक शक्ति अहिंसक विद्रोह में हैं। सत्य है और विजय हमेशा सत्य की होती हैं। इस तरह महात्मा गाँधी ने विश्व के सामने सत्य और अहिंसा के रूप में उज्जवल महान नैतिक पथ निर्मित किया, जिसने मनुष्य समाज और जगत को गतिशील होने की प्रेरणा प्रदान की।
महात्मा गाँधी साध्य से अधिक साधन पर ध्यान देना आवश्यक मानते थे। उनका कहना था कि यदि साध्य पवित्र और मानवीय है तो साधन भी वैसा ही शुद्ध और पवित्र होना चाहिए। इस तरह राष्ट्रपिता के विचार शुद्ध-बुद्ध आत्मा के दर्शन कराते हैं तथा जीवन में आध्यात्मिकता एवं नैतिकता को प्रमुख स्थान देते हैं। गाँधीवाद सदा प्रासंगिक है क्योंकि वह आज के समाज के साथ ही भविष्य के समाज का भी जीवन दर्शन है। वह प्रत्येक क्षेत्र में हृदय परिवर्तन द्वारा स्थायी विकास का मार्ग दिखाता है। गाँधीवादी सिद्धांतों एवं आदर्शों में ही विश्व-कल्याण निहित है। उनमें भगवान राम की मर्यादा, श्री.ष्ण की अनासक्ति, बुद्ध की करुणा, ईसा का प्रेम, एक साथ समाविष्ट दिखाई देता है।
गाँधीजी के लिए इस सदी के महत्वपूर्ण इतिहासकार अरनॉल्ड टायनबी ने लिखा है कि . ''हमने जिस पीढ़ी में जन्म लिया है, वह न केवल पश्चिम में हिटलर और रूस में स्टालिन की पीढ़ी है, वरन् वह भारत में महात्मा गाँधीजी की भी पीढ़ी है। और यह भविष्यवाणी बड़े विश्वास के साथ की जा सकती है कि मानव इतिहास पर गाँधी का प्रभाव स्टालिन या हिटलर से कहीं ज्यादा और स्थायी होगा।'' आज यह बात अक्षरतः सत्य सिद्ध हो रही है । आज गाँधीजी के सिद्धान्तों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है।
''घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध'', भारत में यह कहावत है। भारत में गाँधी दर्शन को स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद उपेक्षा के भाव से देखा गया, वरना आज जो हिंसा, जो साम्प्रदायिक वातावरण, जो आतंकवाद, जो भ्रष्टाचार पनप रहा है वह इस हद तक नहीं होता क्योंकि गाँधीवाद हमें जीवन के कुछ मूल्य ही नहीं देता है बल्कि व्यावहारिक जीवन में तर्कपूर्ण एवं न्यायसंगत रास्ता भी बनाता है। संजय दत्त की फिल्म ''लगे रहो मुन्ना भाई'' में कुछ हल्के-फुल्के अन्दाज में 'गाँधीगिरी' के सिद्धान्तों को दिखाया गया । बड़ी संख्या में लोगों ने फिल्म को पसंद किया। दफ्तरों में भ्रष्टाचार के विरूद्ध पेंशन के लिए गाँधीगिरी का रास्ता सहज-सरल था पर दिलों को नम कर गया। यह इस बात का प्रमाण है कि 'गांधी दर्शन' आज भी लोगों को प्रभावित करता है, वह आज भी प्रासंगिक है। उनकी अहिंसा नैतिकता पर आश्रित है, अतः सत्य है और सत्य ही सदा विजयी होता है। उन्होंने जो नैतिक पथ दिया वह मनुष्य समाज और जगत को गतिशीलता देता है। वे उन समस्त मान्यताओं के धारणाओं और .ष्टियों के प्रतिवाद हैंै जिनका आधार भौतिकवाद है। गाँधीगिरी आज भी हमें विनम्रता सिखाती है। विनम्रता व्यक्तित्व का गहना है। विनम्रता सारी खुशियों की बुनियाद है, जो आपको दूसरों से अलग दर्शाती है। पर गाँधीजी के अनुसार विनम्र होने का अर्थ अन्याय सहना नहीं है। गाँधी का दर्शन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मानवीय मूल्यों के आधार पर हमारी समस्याओं का समाधान भी देता है। अगर इन्हें पुनः प्रचलित किया जाए तो विश्व कल्याण के स्वप्न .ष्टा का स्वप्न साकार होना असम्भव भी नहीं।
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डा. स्वाति तिवारी

ईएन - 1/9 चार इमली भोपाल
मोबा. - 9424011334

अकेले होते लोग’’

              आधुनिक सभ्य समाज में मनुष्य अपनी ही जड़ों से दूर होता जा रहा है और उसके आसपास अकेलेपन का रहस्यात्मक सन्नाटा छा रहा है। पीढ़ियों में अंतर और अन्तराल तो सदियों से रहे हैं - पर परिवार में कटते रिश्तों के जंगलों का उजाड़पन भय और पीड़ा दे रहा है। ‘‘अकेले होते लोग’’ कृति में युवा कथा लेखिका डॉ. स्वाति तिवारी ने इसी मर्म की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करने की कोशिश की है।
‘‘अकेले होते लोग’’ आज के आस्थाहीन समाज में सत्य और अकेलेपन के संकट को और जीवन मूल्यों में आई डगमगाहट को एक संदेशात्मक लहजे में पूरी रोचकता और पढ़ने की जिज्ञासा के साथ परिभाषित करती है। यह पुस्तक समग्र स्वरूप में अकेलेपन से बचाने और बचने पर केन्द्रित है जिसे दो खण्डों में प्रस्तुत किया गया है। दोनों ही खण्ड एकदम अलग शैली में हैं । एक विश्लेषणात्मक है तो दूसरा कथा-व्यथा किन्तु पाठक को इससे कोई व्यवधान नहीं होता अपितु वह इसमें रमता जाता है। यह एक तरह का नवीन प्रयोग है जो आध्यात्मिक चिन्तन को नए स्वरूप में प्रस्तुत करने के साथ ही जाने अनजाने समाज द्वारा समाज के ही केन्द्रीय पात्रों को जीवन का यर्थात कहकर जीवन के हाशिए पर पटक दिए जाने का एक साझा, कालगत और परिवेशगत विश्लेषण है। यह उन लोगों की कहानी है जिनकी अपनी पीड़ा है, अपने दर्द हैं, अपने तर्क हैं, अपने तरीके हैं जिनका सरोकार सम्पूर्ण मानव जाति से है। यह पुस्तक वृद्धावस्था में पसरती असुरक्षा और बेचैनी को सही परिप्रेक्ष्य में रेखांकित करती है जिस प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है। दुनिया केवल युवा पीढ़ी की ताजगी-स्फूर्ति पर ही नहीं टिकी हुई है- वहाँ उम्र की झुरियाँ के अनुभव भी संबल बनते आए हैं। यह पुस्तक हमें अपने अन्तरतम तक झाँकने की दृष्टि प्रदान करती है और लगता है हम शब्दों के साथ एक यात्रा कर रहे हैं।