शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

jiwan ke kuch mayane ese bhi


26 अगस्त को मदर टेरेसा का शताब्दी वर्ष था .वे १०० साल की होती अगर हमारे बीचहोती तो . दुनिया की एक महान  माँ   हजारों बच्चों की माँ होने के बावजूद .सच्चे मन से कितनो ने उन्हें याद किया ?मानवता  की सेवा में जीवन अर्पण करने वाली इस    माँ को मेरी श्रधान्जली .कल भूल गई थी आज एक दिया उनके नाम का प्रज्वलित किया .

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

प्रशासन को सख्त रवैया अपनाते हुए एस्मा लागु करदेना चाहिए
.जूनियर डोक्टर जब अभी ग्रामीण इलाके में नहीं जाना चाहते तो बाद में क्या जायेंगे .?डोक्टर की डीग्री में पहली शपत मानवता की सेवा होती हे .वो  ग्रामीण या शहरी नहीं होती .कल वो कहेंगे की उन्हें केवल महानगर में ही नोकरी करनी हे .राज्य शासन को चाहिए वो अत्यावश्यक सेवा प्रतिरक्षण अधिनियम  एस्मा लागु करे समाज और मानवता के लिए यह जरुरी हे .  डोक्टर का दायित्व  सेवा से हट कर कमाना होता जा रहा हे जो उनकीअसंवेदन शीलता दर्शाता हे

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बुधवार, 18 अगस्त 2010

जनसंख्या स्थिरीकरण पर केन्द्रित


हमारा विकास और जनसंख्या नियंत्रण

 डा. स्वाति तिवारी

सामाजिक सरोकारों में मेरे सूचनातंत्र का सबसे प्रबल खबरची मेरी कामवाली बाई, माली और चौकीदार हैं। कल फिर कमलाबाई ने मेरे चिन्तन को नई दिशा दी। हुआ कुछ यूँ कि कमलाबाई कल अपने साथ एक और बाई लेकर आयी यह कहते हुए कि आपके बंगले में सर्वेंट क्वाटर खाली है आप इसको दे दो। कमरे के बदले यह झाडूफटका कर देगी। मैंने पहला ही सवाल किया कि परिवार में कितने लोग हैं?

कमला ने ही जवाब दिया ‘‘पाँच बच्चे, पति पत्नी और सास बस।’’

‘‘बस मतलब? और होने में क्या?’’ कमला मेरे रूख को पहचान गई फट से उसने बात संभाली पाँचों बच्चे साथ नहीं रहते बड़े वाले दोनों बच्चे गाँव में इसकी माँ के साथ रहते हैं, आते जाते है कभी - कभी।

मैंने अपना गणित ठीक करते हुए गिना पाँच दो सात और एक आठ ?

कमरा दस बाय दस का? एक कमरा मात्र? नहीं मुझे कमरा नहीं देना। कमरा बहुत छोटा है तुम्हारे परिवार के लिए। फिर आठ आदमी मतलब आठ बाल्टी पानी नहाने का और आठ बाल्टी अन्य काम के लिए। फिर बिजली, फिर घर की आबोहवा? बाई चली गयी। पर प्रश्न और चिन्तन छोड़ गई मैंने अपने घर में जगह देने से इनकार कर दिया पर अबोली घरती और निशब्द आसमान अपनी जगह अपनी हवापानी के बंटवारे के लिए कैसे मना करें? और प्राकृतिक विपदा के शब्दों में करते भी हैं तो क्या आदमी समझ पा रहा है? समझ जाता तो क्या बढ़ती जनसंख्या के लिए हमें राष्ट्रीय चिन्तन करना पड़ता? मैं एक परिवार से बात कर चिन्तित हूँ। पूरे प्रदेश की जनसंख्या के आँकडे चौंकाने वाले हैं यह मुख्यमंत्री जी के लिए चिन्ता का विषय होना स्वाभाविक है।

भोपाल के लाल परेड मैदान पर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश की बढ़ती आबादी पर चिन्ता प्रकट करते हुए कहा कि आमजन के जीवन स्तर में तेजी से सुधार तथा सभी को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के लिए जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण करना आवश्यक है। केन्द्र ने भी लोकसभा में माना कि मौजूदा जनसंख्या नीति से आबादी के स्थिरीकरण के लिए 2070 तक इंतजार करना होगा इसलिए इस बारे में एक नयी नीति बनाने की जरूरत है। लोकसभा में जनसंख्या स्थिरीकरण विषय पर प्रस्ताव पेश करते हुए केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री गुलामनबी आज़ाद ने कहा कि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान सहित मध्य भारत के कुछ राज्यों में प्रजनन दर लक्षित दर से दो गुनी है।

प्रदेश के समग्र विकास हेतु जनसंख्या स्थिरीकरण एक अनिवार्य आवश्यकता है। राज्य में 43.5 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है। कम उम्र में विवाह उच्च प्रजनन दर का एक मुख्य कारण होने के साथ-साथ उच्च शिशु मृत्युदर तथा उच्च मातृ मृत्युदर के लिए भी जिम्मेदार है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक राष्ट्रीय संस्था के अनुसार प्रदेश की कुल प्रजनन दर 3.1 है जो भारत की प्रजनन दर 2.6 की तुलना में काफी अधिक है। विगत वर्षों में लिए गये प्रयासों के बावजूद प्रजनन दर में वांछित कमी नहीं आना ही चिन्ता का विषय है।

इन सभी चिन्ताओं के मद्देनजर मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान वर्ष 2010-11 को परिवार कल्याण वर्ष घोषित किया है। आँकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमारा प्रदेश जनसंख्या-वृद्धि से ही नहीं बल्कि जनसंख्या - विस्फोट से ग्रस्त है। जिसके कारण हमारा जीवन स्तर, हमारा आर्थिक विकास, हमारे भावनात्मक एवं सामाजिक संबंध सब कुछ विकटताओं से भरा है।

हम जी तोड़ कोशिश करके अपनी विकास की दर को आगे बढ़ाते हैं उतनी ही तेजी से जनसंख्या की वृद्धि-दर हमारे विकास-वृद्धि के आंकड़े को पीछे कर देती है। जनसंख्या विस्फोट एक सापेक्ष शब्द है, देश में उत्पादित खाद्यान्नों और संसाधनों की अपेक्षा यदि जनसंख्या अधिक है वो वह अति जनसंख्या कहलाती है। अतिजनसंख्या खाद्यान्नों एवं संसाधनों की तुलना में दोगुनी हो जाती है तो वह जनसंख्या विस्फोट कहलाते लगती है। इस विस्फोटक स्थिति से बचने के लिए आवश्यकता है जनसंख्या स्थिरीकरण पर पूरजोर प्रयासों की। जिसके हमें शिशु मृत्युदर, मातृ मृत्युदर और कुल प्रजनन दर में कमी लाने के साथ ही कुछ अन्य व्यावहारिक सूत्रों को भी पकड़ना होगा। केवल वर्ष मनाने या नीति भर बनाने से इस समस्या से छूटकारा मिलना सम्भव नहीं है। जनसंख्या नीति की सफलता में भी प्राथमिक शर्त है सफल जनभागीदारी।

हमारे प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण को परिवार कल्याण कार्यक्रम में रखा गया है। जिसमें परिवार नियोजन और प्रजनन व बाल स्वास्थ्य गतिविधियां शामिल हैं, जो जनसंख्या को नियंत्रित व स्थिर करने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। राज्य में जनसंख्या वृद्धि की गति का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1951 से 1980 के बीच 30 वर्षों में आबादी दो गुनी यानि 2 करोड़ 60 लाख से बढ़कर 1981 से 5 करोड़ 20 लाख लोग 2015 तक दस करोड़ 40 लाख हो जायेंगे।

यदि भारत सरकार के योजना आयोग द्वारा गठित जनसंख्या प्रक्षेपणों पर तकनीकी दल के निष्कर्ष पर गौर करें तो उनके वर्ष 2060 के बाद मध्यप्रदेश प्रतिस्थापन प्रजनन दर 2.1 के स्तर तक पहुंच पाएगा जो जनसंख्या को स्थिर करने की प्रक्रिया की मूलभूत आवश्यकता है। यदि ऐसा हुआ तो वर्ष 2061 की जनगणना में प्रदेश की जनसंख्या 19 करोड़ हो जायगी। इतने विशाल जनसंख्या आधार का लोगों के जीवन की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में सहज ही अनुमान लगाने पर यह मात्र मुख्यमंत्री या सरकार के चिन्तन का विषय नहीं है यह आम नागरिक की चिन्ता का विषय भी है। यह हमारे विकास को बुरी तरह प्रभावित भी कर रहा है।

राज्य की कुल जनसंख्या में 39 प्रतिशत लोग 15 वर्ष से कम आयु के है तथा स्त्रियों की संख्या 48 प्रतिशत है। इस आयु संरचना के कारण जनसंख्या वृद्धि की अपार सम्भावनाओं को देखते हुए भारत शासन द्वारा गठित जनसंख्या स्थिरता कोष, योजना का उद्देश्य प्रदेश में आर्थिक विकास, सामाजिक विकास एवं पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप स्तर पर सन 2045 तक जनसंख्या स्थिर करना है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा वर्ष 2010-11 को परिवार कल्याण वर्ष घोषित करने का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या स्थिरीकरण एवं प्रदेश के चौमुखी विकास को गति देना है।

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शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

लाल फीता शाही सेमुक्ति

लाल फिताशाहों काम करो वरना भुगतो खामियाजा
स्वाति तिवारी
हमारे देश में सरकारी दफ्तरों में कर्मचारियों से लेकर अफसरों को जनता का माई बाप समझना इस देश की एक बहुत बड़ी त्रासदी है। लोगों का काम अटकाना,उसमें अडंगे लगाना और उन्हें छोटे-छोटे से काम तक के लिए चक्कर लगवाना इनकी फितरत बन गयी है। यह किसी खास राज्य, क्षेत्र अथवा विभाग की नहीं बल्कि पूरे देश की समस्या है । ऐसा करने में उनके निहित स्वार्थ तो जुड़े ही होते हैं, उनकी परपीड़क मानसिकता और खुद को जनता से ''बड़ा'' जताने की प्रवृति भी काम करती है । हालत इतने बद्तर हो गये है कि बुजुर्ग तो यह तक कहते सुने जाते हैं कि ''इससे तो अंग्रेजों का राज अच्छा था'' । आजाद भारत में इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है ।
बड़ी तकलीफ होती है जब घरेलू महरी आकर कहती है मेडमजी कूपन नहीं बन रहा- कल फिर जाऊंगी राशनकार्ड बनवाने । बच्चे का स्कूल रिक्शेवाला दो दिन नहीं आया- पूछने पर कहता है लड़के के एडमीशन के लिए जाति प्रमाण-पत्र दे ही नहीं रहे है - कहते है अगले हफ्ते आना - दो दिन की मजदूरी गई और बात वहीं की वहीं है । पर तुम तो पिछले हफ्ते भी गए थे ना - पूछने पर वह कहता है - हाँ - अभी अगले हफ्ते फिर बुलाया है ...ये .श्य किसी एक शहर, गाँव, कस्वे, जिले या संभाग या प्रदेश का नहीं, यह आम .श्य है तो किसी के भी घर की महरी या माली, रिक्शेवाले या हमारा आपका हो सकता है और होता है- यह एक राष्ट्रीय समस्या की तरह फैलती चली जाने वाली एक अ.श्य गाजर घास है जो चारों तरफ तेजी से फैलती चली गई है और लालफीताशाही की इस गाजर घास ने कोई दफ्तर या कार्यालय नहीं छोड़ा है - शिकायत कौन करे और किससे करें । कुछ संक्रमण इतनी तेजी से और इस तरह फैलते है कि रोकने और बचने की गुंजाइश ही नहीं देते । यह हमारे देश का दुर्भाग्यपूर्ण संक्रमण है । ईमानदारी से मेहनत की रोटी खाने वाले भारतीय समाज को इसने अपने शिकंजे में ले लिया है । कितना फर्क पड़ता है जब ,एक गरीब आदमी समय पर अपने बच्चे का एडमिशन नहीं करवा पाता, तारीख निकल जाती है- घर का चूल्हा नहीं जलता केरोसीन के खत्म हो जाने से सरकारी हो या गैर सरकारी, अधिकारी हो या कर्मचारी.....उसकी मानसिकता ही कुछ ऐसी हो गई है कि अपनी कुर्सी तोड़ो और तनखा लो ।
सरकारी अमले की इस बढ़ती दुष्प्रवृत्ति का एक कारण दोषी कर्मचारियों के लिए समुचित दंड की व्यवस्था न होना भी है । कोई जनता का काम करें या न करें, समय पर करें ,उसके काम को कितना भी लटकाये,उसे यह पता होता है कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।
पूर्व में सिटीजन चार्टर व्यवस्था कई सालों से लागू थी । हर दफ्तर के बाहर एक बोर्ड लगा दिख जाता था कि कौन सा काम कितने दिन में किया जाएगा । लेकिन यह बोर्ड महज मजाक बनकर रह गया था, क्योंकि काम समय सीमा में न होने पर दंड का प्रावधान नहीं था । बिन भय प्रीत नहीं होती । लेकिन लोक सेवा गारंटी में दंड का प्रावधान है और प्रशासन में दंड का महत्व सुविदित है । हम पूरा विश्वास कर सकते हैं कि अब मध्यप्रदेश के लोग अपने कार्यो के लिए सरकारी अमले की ''मेहरवानी''पर निर्भर न रहेंगे । अब उन्हें यह कार्य कराने का पूरा अधिकार होगा । यह भी समय सीमा में ........वरना ...........दंड ।
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने हमेशा कोशिश की है कि वह एक ओर जहाँ लोक कल्याणकारी कामों पर ध्यान दें, वहीं यह भी देखे कि लोक आचरण में शुचिता कैसे कायम रखी जाए । इसके तहत उन्होंने जन-प्रतिनिधियों और आईएएस अधिकारियों सहित प्रदेश के अधिकारियों, कर्मचारियों से संपत्ति की घोषणा करवाई । यह दर्शाता है कि इस सरकार की कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं है । साथ ही यह भी कि वे ऊपर से नीचे तक पारदर्शिता और समान जिम्मेदारी का भाव रखना चाहते हैं । इसी सोच के चलते पिछले हफ्ते ही सरकार ने विधानसभा में एक विधेयक न केवल प्रस्तुत किया बल्कि उसे पारित भी करवाया, जिसमें यह व्यवस्था है कि काम न करने वाले शासकीय व्यक्ति को अर्थदंड भुगतना पड़ेगा । इस दंड से प्राप्त रकम उस व्यक्ति को मिलेगी जिसका नुकसान इस मायने में हुआ कि संबंधित अधिकारी ने उसके आवेदन पर गौर नहीं किया जिसके कारण उसे बार-बार वहाँ आकर समय और पैसा खर्च करना पड़ा । मध्यप्रदेश देश का ऐसा करने वाला पहला राज्य बन गया है । यह क्रांतिकारी विधेयक भविष्य में देश को नई दिशा,नई सोच और शासकीय तंत्र में जिम्मेदारी की नई भावना पैदा कर सकता है ।
मध्यप्रदेश लोक सेवा गारण्टी विधयेक अभी कुछ विभागों में प्रयोगात्मक रूप से लागू किया जाएगा, जिसे परीक्षण -निरीक्षण के बाद व्यापक रूप से लागू कर दिया जायगा । नया कानून 15 दिन में लागू होगा । इसके लागू होने के साथ ही संबंधित महकमे के पास आवेदन आने के एक निश्चित समय के भीतर उसका जवाब देना होगा । यदि वैसा नहीं कर पाए तो 250 रूपए प्रतिदिन के हिसाब से अधिकतम 5000 रूपये तक जुर्माना संबंधित अधिकारी पर किया जाएगा । यह रकम उस व्यक्ति को दे दी जाएगी जिसके समय और जानकारी में विलम्ब का नुकसान हुआ है । बड़ी बात यह भी है कि आवेदन आने के साथ ही आवेदक को यह भी बताना पड़ेगा कि उसके आवेदन पर कितने समय में फैसला हो जाएगा । यदि आवेदन मंजूरी योग्य नहीं है तो वह भी तत्काल बता दिया जाएगा । इतना ही नहीं,शासकीय अधिकारी पर विलम्ब के लिए अर्थदंड के साथ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जाएगी । याने पूरे मामले को बेहद व्यवहारिक ढंग से बनाया गया है । इसे सिर्फ रस्मी नहीं रखा गया कि अधिकारी ने कर दिया तो ठीक और नहीं भी किया तो ठीक । अब उसे यह समझ लेना होगा कि वह टाल मटोल करता है तो उसे इसका खामियाजा भुगतना होगा ।
फिलहाल इसके दायरे में जन्म प्रमाण-पत्र, मूल निवासी प्रमाण-पत्र,खसरा-खतौनी की नकल,नल कनेक्शन जैसी लोक सेवाएं ली गई है । संभावना यह है कि इस प्रयोग के नतीजों की समीक्षा कर इसका दायरा बढ़ाया जाएगा ।
इस विधेयक को विधानसभा में प्रस्तुत करते वक्त मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जहां इसके ईमानदार क्रियान्वयन का भरोसा दिलाया वहीं यह भी संभावना जताई कि संभवतः पूरी दुनिया में इस तरह का कोई कानून नहीं है । याने मध्यप्रदेश शासन ने विश्व कीर्तिमान लायक काम किया है । इस कानूनी की सफलता के बाद ताज्जुब नहीं यदि देश भर में इसे लागू करने की होड़ मच जाए । आखिरकार मौजूदा दौर में लोक सेवकों के गैर जवाबदारीपूर्ण आचरण के मद्देनजर इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि उन पर इस तरह का कोई अंकुश तो हो ही जो उन्हें जवाबदार बनाए और लोगों में इस बात का भरोसा भी पैदा करें कि उनकी लगातार उपेक्षा नहीं की जा सकती ।
उम्मीद यह भी रही है कि इस कानून के प्रभावी हो जाने के बाद सरकारी तंत्र में लालफीताशाही पर नियंत्रण लगेगा और व्यवस्था कायम रखने के प्रति भावना भी बढ़ेगी । जैसे कि मुख्यमंत्री ने घोषणा भी की है कि 15 दिन के भीतर इस पर अमल शुरू हो जाएगा तो हम यह अपेक्षा कर ही सकते है कि यह महज एक सरकारी घोषणा बनकर नहीं रह जाएगी । साथ ही शासकीय मशीनरी में यह संदेश भी जाएगा कि उस पर अब किसी की पैनी नजर भी है । इसमें मुख्यमंत्री ने इस बात का यकीन भी दिलाया है कि जल्द ही इसके दायरे में मुख्यमंत्री और मंत्रियों को भी लाया जाएगा । हम यह कह सकते है कि मध्यप्रदेश इस वक्त एक के बाद एक नवोन्मेषी कार्यक्रमों को अंजाम देने लगा है । इन कोशिशों का निश्चित ही सुखद परिणाम मिलने की आशा की जा सकती है ।

रविवार, 1 अगस्त 2010

क्या जबान फिसल गई थी ?

वाह विभूति नारायण जी वाह क्या भाषा हे एक कुलपतिजी की ?जिस विश्वविध्यालय में आचार्यजी इतनी सुसंस्कृत शब्दावली में नारी का सम्बोदन करते हों वंहा की हिंदी दुनियाभर में नाम रोशन करेगी .महात्मा गाँधी हिंदी वि वि के कुलपति ने नया ज्ञानोदय मे लेखिकाओं के लिए जिस अपशब्द का उपयोग
किया हे उसपर पहली प्रतिक्रिया उनकी लेखिका पत्नी ने देनी चाहिए थी .किसी एक लेखिका की आत्म कथा को सभी लेखिकाओं के सन्दर्भ मे केसे रखा जा सकता हे । हिंदी संस्कृति के विरुध उनकी बयानबाज़ी उनकी हलकी ,निम्न मानसिकता का परिचय देती हे .हर हाल मे किसी लेखक की रचना का सम्मान होना चाहिए
.पढ़ा लिखा कुलपति भी जब अपनी जिव्हा को लगाम देकर नहीं रखेगा तोआम लोगों से क्या उम्मीद किजा सकती हे .दर असल देश की विभूतियों को भी महिला रचना करों के सम्मान का ख्याल रखना चाहिए .उनके वि वि के तमामविद्यार्थी .शिक्षक इस बात पर नाराजगी जताएं । ये लेखिका नहीं नारी अवमानना की बात हे
नाम विभूति होने से व्यक्ति विभूति नहीं हो जाता हे । उसके कर्म उसे विभूति बनाते हे विभुतिजी । अपशब्द आप की पत्नी ने आपके लिए कभी बोले हे क्या ?आप से ऐसी कमसे कम ऐसी भाषा की कल्पना साहित्य जगत तो नहीं करता .