पुस्तक समीक्षा
स्त्री-संसार का कोलाज़ रचती कहानियां- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - बैंगनी फूलों वाला पेड़ प्रकाशक - सामयिकप्रकाशन, 3320-21,जटवाड़ा
लेखिका- स्वाति तिवारी नेताजी सुभाष मार्ग,दरियागंज नईदिल्ली-2
मूल्य - रु.200/- मात्र
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हिन्दी कथा साहित्य में स्त्री के अस्तित्व को लेकर सदा दो धाराएं सामने आई हैं। एक धारा पुरुषवादी सोच की और दूसरी स्त्रीवादी सोच की। दोनों में अकसर टकराव की स्थिति रहती है। जबकि सच यह है कि स्त्री और पुरुष परस्पर मिल कर परिवार, समाज और भावी पीढ़ी का सृजन करते हैं। फिर यह टकराव की स्थिति उत्पन्न क्यों होती हैं? इसका उत्तर स्त्री के वैवाहिक जीवन के उस पक्ष में निहित है जहंा पति 'परमेश्वर' न भी हो किन्तु परिवार का सर्वोच्च शक्ति होता है और स्त्री पौराणिक कथाओं की भांति शक्ति का पर्याय माने जाने पर भी शक्तिहीन खड़ी मिलती है। उसे परिवार संबंधी किसी भी निर्णय को अंतिम रूप से लेने का अधिकार नहीं होता है। इस बिन्दु पर आ कर परिवार में स्त्री और पुरुष की सहभागिता की धारणा टूटती दिखाई देती है। अब जहंा टूटन होगी, वहंा घुटन भी होगी। कुल मिला कर यदि स्त्री 'स्व' को भुला कर परिवार बसाती है तो उससे उसका और उसके साथ विवाह करने वाले पुरुष का भविष्य सुनिश्चित आकार लेता है वरन् पुरुष किसी भी परिस्थिति में 'स्व' को भूलने को तैयार नहीं होता है। इन कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि ये स्त्री की दीन-हीन दशा पर प्रलाप नहीं करती हैं वरन स्त्री के दृढ़ स्वभाव का वह चित्र प्रस्तुत करती हैं जिसमें स्त्री अपने सारे दुखों, तमाम घुटन के बीच भी ताज़ा हवा की एक सांस या सूरज की एक किरण ढूंढ ही लेती है। यही तथ्य स्वाति तिवारी के नवीन कथा संग्रह 'बैंगनी फूलोंवाला पेड़' में बखूबी उभर कर सामने आया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो 'बैंगनी फूलोवाला पेड़' में स्त्री-संसार का कोलाज़ रचती कहानियां हैं।
संग्रह में कुल इक्कीस कहानियां हैं। ये सभी अलग-अलग कथानकों में पिरोयी गई हैं। इन कहानियों में कथ्य का वैविध्य लेखिका की गहन अंतर्दृष्टि को व्यक्त करता है। इन कहानियांे की स्त्रियां घरेलू हैं, कामकाजी हैं, युवा हैं, प्रौढ़ हैं और व़ृद्धा भी हैं। लगभग सभी आयु वर्ग की स्त्रियों के जीवन के विविध पक्षों के विविध पन्ने अंाखों के सामने खुलते दिखाई पड़ते हैं। संग्रह की पहली कहानी है-'बैंगनी फूलोंवाला पेड़'। यह प्रेम के शाश्वत प्रवाह की कथा है। मनुष्य की प्रत्येक पीढ़ी प्रेम के अनुभव से गुज़रती है फिर भी उसे अपनी बाद वाली यानी युवा पीढ़ी में प्रेम की उष्मा सदा नए रूप में प्रतीत होती है। एक स्त्री जो आयु की उठान के साथ-साथ प्रेम की युवा अनुभूति को लगभग खो चुकी थी, एक युवा प्रेमी जोड़े में अपने अतीत के बिम्ब को टटोलते हुए अपनी खोई हुई अनुभूति को पुनः ढूंढ लेती है।
'झूठ की बुनियाद' एक अन्य दृश्य दृष्टगत होता है। समाज ने जो अधिकार पुरुषों को दिए हैं, स्त्रियों को नहीं दिए। पुरुष अपने विवाह से पूर्व और विवाहेत्तर संबंधों के संदभर्ों के साथ गर्व से सिर उठा कर जी सकता है, वहीं स्त्री को संबंधों के एक खूंटे से बंध कर रहने को उसकी नियति बना दिया गया है। लेखिका ने इस कहानी में सदियों से चली आ रही विसंगति पर बखूबी कटाक्ष किया है-'क्या रखा है ऐसे शादी-ब्याह के सुख में। हम किस समाज में जी रहे हैं? एक-दो बच्चों का पिता अपने दूसरे विवाह में निःसंतान स्त्री चाहता है और एक स्त्री अपने दूसरे विवाह को अपराध की नज़र से देखती है, क्योंकि वह झूठ की बुनियाद पर खड़ा किया गया है। पति पाने के लिए अपने बच्चे को छोड़ने के लिए मज़बूर है।' (पृ.21)
स्त्री और मातृत्व का पारस्परिक संबंध प्रकृति प्रदत्त है। 'लौट जा पुत्तर अपने घर' कहानी में मातृत्व के प्रति स्त्री के मनोविज्ञान को समझा जा सकता है। एक युवा स्त्री जो विवाह करती है किन्तु मातृत्व धारण करने के मामले में उसके मन में तनिक भी उत्साह नहीं है। वह स्वयं को जी लेना चाहती है। विवाह के कुछ वर्ष बाद तक मातृत्व धारण न कर पाने के कारण वैवाहिक जीवन को निस्तेज होते देख कर वह मंा बनने को उत्सुक हो उठती है। फिर एक दिन अचानक जब उसे पता चलता है कि वह मंा बनने वाली है तो उसकी अंाखों के आगे उसके वैवाहिक जीवन का महल भरभरा कर गिरता हुआ लगता है। तब उसे अपनी उस मां की याद आती है जो अब इस दुनिया में नहीं है। यदि वह होती तो उसे उचित सलाह दे कर उसके वैवाहिक जीवन को एक बार फिर संवार देती। एक मातृत्व दूसरे मातृत्व में सहारा ढूढता है। यह कहानी संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी बन पड़ी है।
परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने पर केन्द्रित कहानी है 'फैसला'। एक सुन्दर युवती जो स्वाभिमान की रोटी जुटाना चाहती हो, उसे वासना लोलुप पुरुष पग-पग पर हताशा और निराशा ही देते हैं। फिर भी वह झुकती नहीं है और तमाम विषम परिस्थितियों को अपने पक्ष में कर के दम लेती है। 'निष्कासन' स्त्री के उस त्रासदी की कथा है जो प्रायः हर उस कामकाजी स्त्री को भुगती ही पड़ती है जो अपने पति से बड़े पद पर काम कर रही होती है। कोई भी पति अपनी पत्नी को अपने से बड़े पद अथवा अधिक अधिकारों के साथ देखना पसंद नहीं करता है। कतिपय स्वार्थवश यदि वह इस अवस्था को झेल भी ले तो भी वह अपनी पत्नी को हर पल यह जताने से नहीं चुकता है कि तुम चाहे आसमान छू लो लेकिन रहोगी तो मुझसे गौण ही क्योंकि तुम मेरी पत्नी हो और पत्नी तो पांव की जूती होती है। कहानी में ड्राईवर अपनी महिला अधिकारी से कहता है,' मैडम आज आपने पुरुषों के थाली फेंकने का बदला फाईल फेंक कर ले ही लिया।' (पृ.40)
किन्तु क्या यह बदला एक स्त्री लेना चाहती है? नहीं, वह अपने सुखी वैवाहिक जीवन को देखना चाहती है। यदि यह संभव न हो सके तो उसे अपने अस्तित्व को तो बचाना ही होगा न। यह कहानी एक ऐसा मार्ग प्रशस्त करती है जो स्त्री को उसके मान-सम्मान के साथ जीने का अवसर देता है।
'अपने ही कटघरे में' पारिवारिक दायित्वों और कामकाजी परिवेश के बीच संघर्षरत स्त्री की कहानी है। 'स्वयं से किया गया वादा' सास बनने जा रही स्त्री के अंतर्द्वन्द्व की कथा है। एक स्त्री जिसने बहू बनने पर स्वयं को अपनी सास के अनुरूप ढाला, उसे एक बार फिर स्वयं को बदलने की विवशता आ खड़ी होती है जब वह सास बनती है और उसे बहू के अनुरूप स्वयं को ढालना होता है। स्त्री परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने में निपूण होती है, यह उसका प्रकृति प्रदत्त गुण है। किन्तु क्या हर बार यह सहज संभव है? इस प्रश्न का उत्तर इस कहानी में भारतीय परिवारों में सास-बहू के संवेदनशील रिश्ते के आलन के साथ बड़े ही व्यावहारिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
'आजकल' के द्वारा लेखिका ने भारतीय समाज के उस एकतरफा व्यवहार को रेखांकित किया है जिसमें 'सिंगल मदर' की धारणा को सामाजिक स्वाकृति मिलना कितना कठिन है, यह बताया गया है। ऐसी ही अतिसंवेदनशील कहानी है 'अस्तित्व के लिए' इस कहानी में कन्या भ्रण हत्या के मसले को बड़े ही मार्मिक शैली में उकेरा गया है। वहीं 'मुट़ठी में बंद चाकलेट' इस बात की तसदीक करती है कि यदि स्त्री-पुरुष दोनों में पारस्परिक समझदारी हो तो वे अपने विवाहपूर्व संबंध का निर्वाह विवाह के बाद भी गरिमापूर्ण ढंग से कर सकते हैं, बशर्ते उनका प्रेम मात्र दैहिक नहीं अपितु आत्मिक हो।
'फूटी कोठी' एक अलग तरह की कहानी है। यह स्त्री के उस रूप को सामने रखती है जिसमें वह एक प्रेयसी के रूप में अपने प्रेमी द्वारा दिए गए प्रेम के नवांकुर को अपने गर्भ में धारण कर के अपने प्रेमी के विदेश से लौटने की प्रतीक्षा करती है फिर एक दिन सच्चाई के धरातल पर खड़ी हो कर एक ठोस निर्णय लेती है जो उसके अस्तित्व को सही अर्थों में पूर्णता प्रदान कर सकता है।
स्वाति तिवारी की कहानियों में समाज और स्त्री के समीकरण का प्रत्येक कोण बखूबी उभर कर सामने आता है। उनकी ये कहानियां स्त्री विमर्श से अधिक स्त्री के समाज विमर्श पर केन्द्रित हैं क्यों कि इन कहानियों में समाज में स्त्री को उचित स्थान दिलाने का दृढ़ आग्रह है। जैसा कि संग्रह के फ्लैप में दिया गया है-'इक्कीस कहानियों के इस गुलदस्ते में ज़िन्दगी के कई राग-रंग खिल-खिल उठे हैं। यहंा संघर्ष भी है और उम्मींद भी, सपने भी हैं और प्रायश्चित भी, समय का दिखावटी चेहरा भी है और उसे बेनकाब करने की कोशिश भी।'
स्वाति की शैली में वह प्रवाह है जो पाठक को बंाधे रखने में सक्षम है। इन खूबियों के साथ स्वाति तिवारी का कहानी संग्रह 'बैंगनी फूलों वाला पेड़' मन-मस्तिष्क पर छाप छोड़ने वाला पठनीय संग्रह है।
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- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
ः एम-एक सौ ग्यारह, शांतिविहार, रजाखेड़ी,
सागर (मध्यप्रदेश)-470004

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