शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

पुस्तक समीक्षा



>स्त्री के इर्द गिर्द>- हिंदी कहानी संसार में जिन महिला कथाकारों ने इधर लगातार कथा सृजन किया है और जिनकी कहानियाँ सहज रूप में पाठकों को उस दुनिया में ले जाती हैं जिनके वे सक्रिय पात्र हैं, उनमें स्वाति तिवारी का नाम उल्लेखनीय है। जीवन को एक नई दृष्टि से देखती इनकी कहानियाँ उस अदृश्य तार को पकड़ने की कोशिश करती दिखती हैं जो इस उत्तर आधुनिकता की ओर भागते समाज को आज भी उम्मीदों और आस्थाओं से जोड़े हुए है।
'बैंगनी फूलों वाला पेड' स्वाति तिवारी का नवीनतम कथा संग्रह है। इससे पहले उनके छः कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 'बैंगनी फूलों वाला पेड़' में कुल 21 कहानियाँ संग्रहित हैं। संग्रह की पहली कहानी जो संग्रह का शीर्षक भी है एक प्रेम कथा है। प्रेम एक शाश्वत सत्य है। वह सृष्टि के आरंभ से आज तक प्रकृति के कण कण में तो व्याप्त है ही, रचनाकारों की कलम से हर विधा में अपनी जगह भी बनाता चला गया है। शायद यह एक ऐसा तत्व या भाव हैं जिसमें अतिव्याप्ति शब्द की कोई जगह नहीं। वह अपनी परिणति पर पहुँचे या न पहुँचे, स्मृतियों में तो रहता ही है। कहानी के पात्र तनु और विनय विस्मृत होते पन्ने की धूल झाड़ते हैं, वह भी दूसरों के बहाने। पाठक ठीक विनय और तनु की तरह खुद को वहाँ खोजने लगता है और विनय का कथन कि ''कहानी वही होती है। किस्से वहीं होते हैं। पेड़ कभी गुलमोहर का होता है या बैंगनी फूलों वाला, क्या फर्क पड़ता है'' उसे नॉस्टेल्जिक बना देता है।
ये यथार्थ घटनाएँ हैं जो आम आदमी के जीवन में घटित होती हैं और कथारूप में बदल जाती हैं। बकौल राजेंद्र यादव कि ''कहानी मूलतः यथार्थ का ट्रीटमेंट है, इस यथार्थ को हम कैसे प्रस्तुत करते हैं- एक अनुभव का यथार्थ है, एक वास्तविकता होती है यानी एक जो होता है फैक्चुअल घटना है, जिस तरह से मैं व्यक्तिगत रूप से किसी चीज को देखता हूँ वो मेरा यथार्थ है और उस यथार्थ को हम कई तरह से कह सकते हैं।''
स्वाति तिवारी की कहानियाँ शहरी मध्यवर्ग के इर्द गिर्द बुनी गई हैं खासकर मध्यवर्गीय स्त्री के इर्द गिर्द। तेजी से बदल रहे समाज में वह स्थितियों से संघर्ष करती स्त्री को विशेष रूप से चित्रित करती हैं। स्त्री का द्वंद स्वाति तिवारी की तमाम कहानियों में दिखता है। इसी संग्रह की कहानी 'लौट जा पुत्तर' की माला आधुनिकता और पारिवारिकता के उहापोह में फँसी दिखती है जबकि 'फैसला' कहानी की सुभद्रा परिस्थितियों से लड़ते लड़ते अंततः अपनी उम्र से बड़े पुरुष जो उसका बॉस भी है, से विवाह कर लेती हैं, वहीं 'निष्कासन' की निरुपमा जो उच्चाधिकारी है वह पारिवारिक बंधनों में अपने आपको व्यवस्थित और सहज नहीं कर पाती और अंततः तलाक की पहल करती है। इन तीनों कहानियों की नायिकाएँ स्त्री स्वातंत्र्य की पक्षधर तो दिखती हैं लेकिन वे स्त्री स्वातंत्र्य की अतिवादी दृष्टि के कारण प्रतिक्रियावादी हो गई हैं।
स्वाति तिवारी की कहानी के स्त्री चरित्र स्वयं निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं लेकिन बावजूद इसके वे स्त्रियाँ अपने अंतर्द्वंद में भी उलझी हुई हैं। 'अपने ही कटघरे में' की नायिका आशिमा अपने कैरियर के लिये घर छोड़कर दूसरे शहर जाती है पर उसे बार बार घर गृहस्थी से दूर जाना कचोटता है। स्वाति तिवारी की अधिकतर नायिकाएँ शहरी मध्यवर्ग से आती हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद पारिवारिक संस्कारों से मुक्त नहीं है। विद्रोह का स्वर मुखरित करने के बाद भी वे बार बार पारिवारिकता की तलाश में भटकती हैं। उन्हें अपनी ओर से पहल या समझौते करने में कठिनाई का अहसास होता है पर वे समझौता करने को आतुर भी दिखती हैं। शायद आज की मध्यवर्गीय स्त्री इस दोधारी स्थितियों में जीने के लिये विवश हैं। दरअसल मात्र आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाना भर ही स्त्री के लिए पर्याप्त नहीं है। पुरुष सत्ता के सामने आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री भी उसे हर पल जैसे खुश रखने को अभिशापित है। यह उसकी नियति है और यही उसकी परिणति भी।
इस संग्रह की अन्य कहानियाँ भी ध्यान खींचती हैं। 'ऋतुचक्र' कहानी की नायिका वसुधा अपने विदेश गए पति की प्रतीक्षा मंे सारे भारतीय संस्कारों का पालन अपनी सास के आदेशानुसार करती जाती है। उसका पति भास्कर अनचाहे विवाह में उससे बंध चुका है और बरसों बाद जब वह लौट कर आता है तो प्रतीक्षातुर वसुधा पाती है कि वह अकेला नहीं है बल्कि उसके साथ एक अन्य स्त्री भी है जिसे उसकी सास आशीर्वाद दे रही हैं। स्त्री का स्त्री के प्रति यह दृष्टिकोण आम भारतीय समाज की तस्वीर प्रस्तुत करता है।
विदेश गए एक अन्य युवक की कहानी है 'एलिस के देश में।' यह कहानी विदेश में रहने वाले भारतीयों के संत्रास को बयान करती ऐसी कहानी है जो पैसे के लालच में विदेशों में छोटी मोटी नौकरी करते हैं और अनेक अनचाहे समझौते करते हैं। यह कहानी मानव तस्करी के घिनौने खेल को चिन्हित करने का प्रयास भी करती है।
स्वाति तिवारी की दृष्टि पूरे मध्यवर्गीय समाज के सुखदुख को समेटती है। यथार्थ की भावभूमि पर खड़ी उनकी कहानियाँ उन सारी संेवदनाओं के निकट हैं जिनमें मध्यवर्गीय समाज डूबता उतरता है। वह एक ओर आधुनिकता के मोहपाश में बद्ध होता जा रहा है दूसरी ओर उसकी टँागे परंपरा के बंधन से मुक्त नहीं हो पा रही हैं। 'प्रायश्चित, आजकल और कोई नहीं' ऐसी ही कहानियाँ हैं जो उत्तर आधुनिक होते समाज को चित्रित करती हैं। वहीं 'अस्तित्व के लिये' की नायिका अपनी तीसरी संतान को भ्रूण परीक्षण के बाद यह कहकर कि बेटा होने वाला है उसे जन्म देती है पर फिर से मृत बच्ची का जन्म होता है। कहानी का यह संवाद कि 'बेटे की चाह में जाने अनजाने ही एक हत्यारे समाज को जन्म दे रहे ये लोग' एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। आज का समाज बेटे बेटी में विभेद करते हुए उसी पोंगेपन को बढ़ावा दे रहा है जिसके कारण कितनी ही बच्चियाँ जन्म लेने से पूर्व ही काल कवलित कर दी जाती हैं। आज भी हम एक निर्मम समाज में जीने के लिये विवश हैं।
इसी संग्रह की 'उत्तराधिकारी' कहानी उच्च वर्गीय शोषण की ओर संकेत करती है पर उसका अंत सकारात्मक सेवा है। एक ऐसा अप्रत्याशित जो अविश्वसनीय सा लगता है। कहानी को यही अप्रत्याशित विशिष्ट बना देता है।
संग्रह की एक अन्य प्रेमकथा है 'मुट्ठी में बंद चाकलेट'। मनुष्य कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए उसके संवेग और स्मृतियाँ उसे ऊष्मा देते हैं लेकिन इस ऊष्मा के लिये अपनों से भी झूठ बोलना पड़ता है। शायद संसार के अधिकतर व्यक्तियों की यही स्थिति है। 'फूटी कोठी' इस संग्रह की अंतिम कथा है जिसमें प्रेम का सारा संसार एक झटके से तोड़कर कथा की मुख्य पात्र माता पिता द्वारा निश्चित किये संबंध से विवाह करने को तैयार हो जाती है। एक और वह खुद को छल रही है दूसरी ओर उसे जिससे वह विवाह करने जा रही हैं। दरअसल यह उचित अनुचित और झूठ सच का ऐसा संसार है जहाँ सब कुछ स्वीकार्य हो चला है। मनुष्य अपने लिये जी रहा ह,ै सोच रहा है और अपनी सुविधानुसार ही सब कुछ पाना चाहता है।
स्वाति तिवारी का यह संग्रह 'बैंगनी फूलों वाला पेड़' वास्तव में स्त्री केंद्रित दुनिया के इर्द गिर्द घूमता है जिसमें पुरुष की उपस्थिति तो है लेकिन अधिकतर एक शोषक के रूप में। स्त्री होने के नाते स्त्री मन की गुत्थियों को स्वाति जी ने बहुत निकटता से रूपायित किया है। निश्चय ही उनकी कहानियाँ स्त्री विमर्श के धरातल पर उल्लेखनीय और चर्चा के योग्य हैं।



(आनंद वर्धन)
एफ-5ध्64 चार इमली
भोपाल
२६ मई १० इंडिया टुडे में प्रकाशित

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