शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

बुधवार, 29 सितंबर 2010

एक मिसाल देनी होगी हमें,



आने वाला कल हम पर गर्व कर सके

 डा. स्वाति तिवारी

आनेवाला कल आप पर गर्व कर सकता है कि इतने सालों से चला हा रहा विवाद इतनी त्रासद स्थितियों का साक्षी वह मुद्दा जो हिन्दू और मुसलमान के बीच दरार नहीं खाई खोदता रहा उसका फैसला जब आया तो उस दौर की जनता ने जिस धैर्य और सौहार्द्र का परिचय दिया था, देश की अमन और शान्ति का जो पाठ पढ़ा वो विश्वभर के लिए अचम्भे का कारण बना। ---- और हम अब धर्म की खाईयों को लाँघने की क्षमता अपने आम में विकसित कर चुके हमारे विवेक, हमारी धर्म निरपेक्षता को कोई भी विवाद, मुद्दे और फैसले विवेकशून्य नहीं बना सकते हमें इसका परिचय देना ही होगा। यह परीक्षा की घड़ी हैं ----- फैसले जीवन से, जीवनमूल्यों से ही तो निकलते हैं तो क्यों हम उन्हीं जीवनमूल्यों के विपरीत चल पड़ते हैं ---- जीवन, मानवता, विकास और राष्ट्र हमारे हर फैसले से ज्यादा महत्वपूर्ण है ---- उसके खातिर हमें अपनी ही असहनशीलता के विरूद्ध लड़ना होगा क्योंकि हम असहनशील ----- होकर अपनी ही सहनशीलता का गला घोंटते आए हैं --- पर अब नहीं --- अब और तो बिलकुल नहीं क्यों, क्योंकि जनता समझ गयी हैं कि दंगे और फसाद हमें ही कमजोर करते हैं - किसी एक दंगे से हम सौ साल पीछे चले जाते हैं -----। नहीं, हमारे बच्चों को नहीं चाहिए ऐसे दंगे और फसाद। इस बार प्रशासन की मुस्तैदी और धर्मगुरूओं की एकमत राय है कि हम एक हैं - मुख्यमंत्री की चाक चौबन्द निगाहें और जनता का एक मत से फैसले पर विवाद को नकारना सब इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमें आगे और नहीं लड़ना है। यह एक अच्छी शुरूआत है। मध्यप्रदेश की सात करोड़ जनता के बीच प्रदेश के मुखिया का पैगाम अच्छी तरह न केवल पहुँच गया है कि हम - शांति और सद्भाव चाहते हैं, इसका प्रभाव दिखाई भी देने लगा है। लोग खुद सतर्क हैं अपने-अपने घरों में। वे मुश्किलों में फंसना नहीं चाहते और प्रशासन की मुश्किल बढ़ाना नहीं चाहते।

जनता को एक ऐसे ही सख्त प्रशासन की जरूरत होती है। एक माहौल बनना चाहिए अनुशासन का जो बनता दिखाई दे रहा है। कल अपने एक मुस्लिम सहकर्मी से चर्चा में पता चला हमारे यहाँ नमाज के वक्त कहा जा रहा है कि हर हाल में हमें शान्ति बनाए रखनी है। हमें लड़ना नहीं है। सद्भावना और सौहार्द्र बनाए रखना है सभी समुदायों के धर्मगुरू यह संदेश दे रहे हैं। कोई बता रहा है कि शान्ति की अपील के पर्चे भी बांटे जा रहे हैं।

विशेष पूजा और अर्चना हो रही है। सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ बिलकुल नहीं है। एक मित्र ने बताया यह अमन चैन कायम रखने की दृढ़ राजनैतिक इच्छा शक्ति का परिणाम है कि जनता खुद सतर्क हो रही है। इस वक्त प्रदेश के मुख्यमंत्री का एक ही मिशन है। वे जिस तरह से प्रदेश में अमनों-अमान कायम रखने की चौतरफा कोशिशें कर रहे हैं। उन्होंने न केवल अपनी कानून-व्यवस्था की मशीनरी को मुस्तैदी से कसा है बल्कि उन्हें जिम्मेदारी भी दे दी है। अपने प्रदेश के जनप्रतिनिधियों को भी प्रदेश में सौहार्द्र बनाए रखने की व्यवस्था में लगा दिया है। विधायक हों, सांसद हों या मंत्रिपरिषद के सदस्य, धर्मगुरू हो, चाहे मीडिया और साहित्यकार, उन्होंने सभी से कहा है कि वे अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में सभी वर्गों से संवाद बनाकर प्रदेश में अमन-चैन के लिए कार्य करें। शान्ति समितियों की बैठकें भी जनता में विश्वास पैदा कर रही हैं कि राज्य सरकार सतर्क और सक्षम है। वह अपनी जनता को शान्ति और सुरक्षा देना चाहती है। मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने कहा कि अदालत के फैसले को जाति और धर्म या भाजपा और कांग्रेस के नजरिये नहीं से देख रहे हैं। उन्होंने राजनैतिक भेदभाव और पक्ष-विपक्ष से ऊपर उठकर सभी से बात की है।

कल टी.वी. पर एक स्टोरी अयोध्या से लाइव आ रही थी कि भगवान राम के लिए जो वस्त्र-वेशभूषा प्रतिदिन जाती है वह एक मुस्लिम परिवार सिलता है। राजा राम के कपड़े, कभी लाल, कभी पीले रंग-बिरंगे गोटा किनारी लगे हुए ताकि भगवान का दिव्य रूप, उनका ‘‘आभा-मण्डल’’ रोज़ नया और चमत्कारी बना रहे। मूर्त्ति का श्रृंगार है वस्त्र और वे फूलों की मालाएं जो अयोध्या के मुसलमान पिरोते हैं। जब भगवान को ऐतराज नहीं तो भक्तों को क्यों हो? अयोध्या की जनता खुद त्रस्त हो चुकी है इस झगड़े से। वो कहती है हम सब मिल-जुलकर रहते आए हैं, आगे भी रहना चाहते हैं।

दरअसल समाज की जरूरतें बदल गई हैं लोग लड़ने के बजाए विकास चाहते हैं। उनकी माँग है शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार। तब मन्दिर के कलश और मस्जिद के गुंबद अलग कहाँ दिखते हैं - एक नया समाज एक नया धर्म जन्म लेता है जो ना हिन्दू है ना मुसलमान वह दोनों का आदर करता है।

30 सितम्बर के फैसले की आखरी घड़ी है। हमें याद रखना होगा कि जब भी कोई आक्रोश किसी प्रदेश-देश की शान्ति और सद्भावना भाईचारे और मित्रवत् रिश्तों को ध्वस्त करता है तब हमारी सबसे पवित्र चीज भी ध्वस्त होती है, वह चीज है गणतंत्र की धर्मनिरपेक्ष आत्मा। यह देश की आत्मा को क्षति पहुँचाना है। कानून है उसकी हिफाजत उसका सम्मान और उसका पालन सभी का दायित्व है। अगर हम फैसले से संतुष्ट नहीं हैं तो हमें कानून हाथ में लेने की जरूरत नहीं है, कानून की शरण में जाना चाहिए।

लोगों से बात करने पर अच्छी बात यह दिखाई देती है कि जनमानस में एक पक्षीय भावनात्मक उफान नहीं है। दोनों ही सम्प्रदाय के कार्यकर्ता संयम बरतने को कह रहे हैं --- अफवाह पर ध्यान न दें और कृपया अफवाह ना फैलाएं। जनता को खबरों के लिए अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। हमारे घरों में खबरों के चैनल हैं। अफवाहें भय फैलाती हैं, उनसे सावधान रहने का यही वक्त है। असामाजिक तत्व कोई हरकत करें -- पर अगर प्रशासन के साथ जनता भी सतर्क, चौकस और चाक-चौबंद है तो मज़ाल है कि कोई असामाजिक तत्व सक्रिय हो पाय? वक्त की माँग है आपकी विवेकशीलता और धैर्य की। ---- वक्त की माँग को सुनना और पूरा करना हम सबके हित में है।

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डा. स्वाति तिवारी

ईएन - 1/9 चार इमली भोपाल

मोबा. - 9424011334

1 टिप्पणी:

  1. सही समय में सही पोस्ट, सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे!

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