शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

शनिवार, 25 सितंबर 2010

डर




सुहाग पड़वा का व्रत था। सुबह पूजा करके परिवार के बुजुर्ग नाते-रिश्तेदारों के यहाँ चरणस्पर्श करने की परम्परा है। मैं उसी परम्परा का निर्वाह करते हुए आशीर्वादलेने अपने पिताजी के अभिन्न मित्र के घर पहॅुंची। दरअसल इस शहर में वे मेरे मायके की भूमिका निभाते हैं। मैं उन्हें काका-काकी कहती हॅूं। वे पिताजी की ही उम्र के हैं-यॅूं भरापूरा परिवार है पर बेटे नौकरयों पर ओर बेटियाँ अपने घर। बस बंगलेनुमा उस पुश्तैनी मकान में वे पति-पत्नी अकेले छूट गए हैं। इतने साल साथ रहते हुए पत्नी के प्रति एक नीरसता पसर जाती है। पत्नी के मन में अबभी उनके प्रति अपने कर्तव्यों का लगाव बरकरार है। या हो सकता है वह उन सबकी आदी हो गई हैं। पति के प्रति वे गजब की सजग हैं। रोटी-पानी, पूजा-पाठ, दवा-सेवा, कपड़े-लत्ते सब जरूरत वे ही पूरी करतीं और बिल्कुल वैसे ही जैसे हमेशा करती रहती थीं। शायद उनके चेहरे पर बढ़ापे की रेखाऍं इसीलिए कम दिखती हों क्योंकि उनके ऊपर दायित्व है।

घर जमींदारी के वक्त का है। भरा हुआ हे। रजवाड़े के जमाने का भारी भरकम फर्नीचर है, ढेर सारा सामान ऐसा है जो अब उपयोग में नहीं आता पर कबाड़े में बेचा भी नहीं जाता। बच्चों ने नए जमाने के हिसाब से उन्हें बहुत-सा सामान नया ओर दिलवा रखा है और इन सबके चलते उनकी स्थिति इनके उपयोग से ज्यादा इनकी पहरेदारी की हो गई है। जब भी बहुऍं आतीं वे काकी से कहतीं कि अनावश्यक सामान की छॅटनी कर देते हैं और कबाड़ी को दे देते हैं पर छाँटते वक्त कभी किसी सामान को काका रोक लेते, ''अरे, इतनी मजबूत लकड़ी का बना पलंग है, शीशम पर नक्काशी का पलंग आज बनवाने जाओ भाव पता चल जाएगा।'' कभी किसी सामान को काकी रोक लेतीं, ''यह बड़ा सन्दूक मेरी सास के हाथ है कितने साल इसमें मेरी शादी का जोड़ा रखा था।'' सन्दूक फिर जगह पर जम जाता। ''कैरम बोर्ड'' वह भी पुराना भारी भरकम, गर्मियांे में बच्चे आ जाऍं तो कुछ तो चाहिए। और ऐसी जाने कितनी यादें, जरूरतें, मूल्य, महत्व, भविष्य की योजनाऍं सामने दिखतीं और सारा सामान अपनी जगह फिर बना लेता सिवाय अखबार की रद्दी और तेल घी के खाली कनस्तरों के। और काका-काकी उस घर मालिक कम चौकीदार की तरह हो गए हैं।

छोड़िए उनके घर और मूल्यावान वस्तुओं के चक्कर में कहीं मैं उनके बारे में बतना ही न भूल जाऊँ। तो सुहाग पड़वा के चरण स्पर्श के बाद देखा हमेशा चाँदी की तश्तरी में आने वाला नाश्ता अबकी बार चीनी मिट्टी के प्लेट में आया था। थोड़ा आश्चर्य हुआ फिर काकी के गले पर नजर गई तो वहाँ सोने की मोहनमाला की जगह केवल काली पोत का मंगलसूत्र झूल रहा था। ध्यान चला ही गया सो पूछे बिना नहीं रह पाई, ''काकी तुम्हारे गले की माला ?''

वे कान में खुसर-पुसर करती आवाज में बोली, ''तेरे काका सठिया गए हैं। कहते हैं इत्ता सोना लाद कर घूमेगी तो लूटपाट में मारी जाओगी। सब अन्दर लॉकर में रखवा दिया है। अब इस उमर में ये नया डर ?'' हाँ...आजकल जमाना बहुत खराब है।'' मैंने भी हाँ मं हाँ मिलाते हुए कहा। पर सामने बैठे काका ने चुप रहने का इशारा करते हुए मुझे अपने पास बुूला लिया। काकी चाय बनाने चली गई तो उन्होंने धीरे से पलंग की गद्दी के नीचे रखे अखबार को निकाला, मुख पृष्ठ पर शहर में हुई लूट और हत्या की खबर थी। 'वृद्ध दम्पत्ति की हत्या'' शीर्षक से छपी यह खबर मैंने भी पढ़ी थी। अखबार चार दिन पुराना था। डर जाएगी। रात भर बैठी रहेगी। जब इसे मैंने पढ़ा तो मैं अन्दर तक दहल गयी। बुढ़ापे में भी सुरक्षा नहीं है। घर में कामवाली बाई आती है-पता नहीं बाहर जाकर किसी को क्या बता दे। कब किसकी नीयत बदल जाए।''

काकी चाय के कप लेकर लौटीं तब तक अखबार गायब। पूछने लगीं, 'क्यार बता रहे थे तेते काका ?' मैंने बात बदलते हुए पूछा, ''आप दोनों भैया-भाभी के पास क्यों नहींं चले जाते ?''

मेरी बात उकने अन्तरमन को चोट कर गई। अचानक मुझे लगा उनके चेहरे पर झुर्रियाँ इन दिनों कुछ ज्यादा ही बए़ गई हैं। वे भरभराती आवाज में बोले, ''पप्ू का फोन रोज ही आता है और नन्दू का रविार को। पर दोनों हालचाल पूछ लेते हैं। ज्यादा हुआ तो कहेंगे आप यहाँ आ जाइए। डॉक्टर को दिखा दॅूंगा। आई को थोड़ी राहत मिल जाएगी।''

''तो चले जाइए ना आप दोनोंं।'' मैंने आग्रह किया।

वे एकाएक उठकर खड़े हो गए। फिर दरवाजे से बाहर देखते हुए बोले- आ जाइए कहता वह पर आकर ले नहीं जाता कि बाबा आपको और आई को लेने आया हॅूं। आपको चलना ही पड़ेगा। आग्रह और मान-सम्मान भी तो कोई चीज है। इसका क्या ? इसको तो बहू साल में दो नई साड़ी भेजती है- बस हो जाती है निहाल बेटे-बहू पर। अगर वह सचमुच चाहता है मॉ-बाप को और हमारी इत्ती चिन्ता है तो यहाँ चौकीदारी के लिए क्यों पटक रखा है।

घर को यॅूं पटक कर खँडहर तो नहीं होने दे सकते न। परदादा के हाथ के पूजे देवी-देवता बैठे हैं देवल में-अब उनका दिया-बाती भी तो करना जरूरी है। बच्चे नौकरी करें कि इनकी जिद पर यहीं बैठे रहें। काकी बात सँभालती है। शहर आजकल बिगड़ता जा रहा है तू भी अकेली मत आया-जाया कर। काकी ने मेरे अकेले घूमने पर चिन्ता जाहिर की। वे उठकर सब्जी छौंकने लगी। तो मैंने फिर पूछा, ''आजकल राघव नहीं आता क्या ?'' तेवर चढ़ाते हुए काकी बोलने लगी, ''तेरे काका को मेरा फुर्सत से रहना रास नहीं आता न तो भगा दिया उसको भी।''

''क्यों ?''

-उन्हीं से पूछ। कहते हैं उसके खाने से पेट में जलन होती है। और रोज ही कुछ न कुछ माँगता, ये बक्सा खाली पउ़ा है दे दो। कभी कहेगा पत्नी रोटी बनाने में टाइम लगाती है तो आपके पास दो गैस कनेक्शन हैं एक दे दो। बस वह सारा समय यह देखता है कि हमारे पास क्या चीजें डबल-डबल हैं या फालतू हैं। उसकी नीयत हमेशा सामान बटोरने में लगी रहती। नहीं दो तो पटका-पटकी, चिड़चिड़ाता रहता। दो फुलके इनके, दो मेरे यॅूं ही डाल सकती है ये। बैठी-बैठी क्या करती हैं सारा दिन। काका कुर्ता उतर कमीज पहनने लगे फिर तैयार होकर छड़ी हाथ में ले बोले, ''तू बैठी है तब तक मैं जरा नक्कड़ तक हो आता हॅूं बैंक से पेंशन लेनी है।''

पर वे पाँच मिनट में ही लौट आए। मैंने आश्चर्य से पूछा, ''काका वापस क्यों लौट आए ? कुछ भूल गए क्या ?''

''नहीं रे । पेंशन लेकर आटो से आना खतरनाक है। कया पता आटो वाला ध्यान रखे कि बैंक से लौट रहा हॅूं।''

''चलो मेरी गाड़ी से मैं चलती हॅूं साथ। '' मैंने उनकी मदद करनी चाही।

''नहीं, फिर यहाँ यह अकेली रह जाएगी। कल जब कौशल्या आएगी बर्तन मॉजने, तब पास वाले बब्बू के स्कूटर पर जाकर ले आऊँगा।''

मैं स्तब्ध थी। तो क्या काका-काकी भावनात्मक तनाव के शिकर हो रहे हैं। उनमें असुरक्षा की भावना इस हद तक बढ़ रही ंहै कि वे भरी दोपहर में चौराहे की बैंक तक जाने और महज आधा घण्टा पत्नी को घर में अकेला छोड़ने में डरने लगे। ये वहीं काका हैं जो टूर पर जाते थे तो हफ्ता पूरा करके लौटते थे। काकी सँभालती रहती थी घर। मुझे लगा काकी के प्रति उनकी नीरसता दिखावा है दरअसल वे काकी से बेहद प्यार करते हैं । और उन्हें भय मुक्त रखना चाहते हैं। शायद अकेले इतने बड़े शहर से निपटने से वे कतराने लगे हैं। सम्भवतः वृद्धावस्था में उनका अचेतन मन, चेतन मन की तुलना में अधिक क्रियाशील हो गया है। और उन्हें अन्दर ही अन्दर दुर्बलता और भय घेरने लगा है।

पास वाले बंगले में मिस्टर पाण्डे रहते रहे हैं पर वे अब खुद के घर में शिफ्ट करने वाले हैं। अब काका को चिन्ता यह है कि पता नहीं पड़ोस में कौन आएगा ?

एक हफ्ते बाद फिर चली गई काका के घर। काका ने अब अपनी आराम कुर्सी बरामदे में इस एंगल से लगा ली कि पउ़ोस का बंगला उनहें दिखता रहे- ''काका आज आप यहाँ बैठे हैं।''

''हाँ रे-खाली पड़ा मकान भुतहा होता है कब कोई घुस जाए घर में और रात-बिरात छत से इधर आ जाए तो। अच्छा बता कोई सिक्योरिटी गार्उ है तेरी नजर में ?''

''क्यों ?''

''रात के लिए लगवा लेता हॅूं जब तक पड़ोस भी खाली है। फिर देखेंे अगर अच्छा पड़ोसी आ गया तो भगा देंगे ।''

''मैं देखती हॅूं'' कहकर काकी के पास उनके कमरे में चली गई। मुझे देख वे मुस्कुराने लगीं। ''हाँ तेरी आवाज आ गई थी मुझे।''

''हाँ काका से बात कर रही थी। '' मैं भी काकी के सााि मेािी तोड़ने लगी।

''आजकल तेरे काका की नौकरी लग गई ।'' वे बच्चों की तरह भोलेपन से बोलीं।

''क्या ?''

''देखा नहीं चौकीदारी कर रहे हैं पड़ोसी की प्रापर्टी की। वहीं बैठे रहते हैं ऊँघते हुए।''...घर लौटते सारे रास्ते मन खिन्न था। काका असुरक्षा के भाव से इस तरह घिरने लगे हैं शायद वे मनोविक्षेप की ओर बढ़़ रहे हैं। मनोविक्षेप तीन प्रकार के रोगों के कारण होता है और चिन्ता, अनावश्यक चिन्ता यह एक रोग में बदल जाती है, वे चिन्ता के चलते संवेगात्मक द्वन्द्व और तनाव की दशा से गुजर रहे हैं, यही है अकेलेपन की आहट...



डा0 स्वाति तिवारी

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