शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

बुधवार, 27 जनवरी 2010

अंजुरी में भर कर

एक फूल ब्रह्मकमल का
अचानक मिलगया मुझे
हाथेली के बीच
अंजुरी में भरकर
जिसकी पंखुरियों पर
लिखा था तुम्हारा नाम
मेरे नाम के साथ
एक फूल ब्रह्मकमल का
कर गया
मेरे यादों के उपवन को
फिर हरा भरा
एक फूल ब्रह्मकमल का
महका गया ,
मेरे मन को मेरे तन को
इनमहकती पखुरियों से
यादआई तेरी बातों की
तेरी महकती बातों की
यादों से एक फूल
ब्रह्मकमल का
अच्छा लगता था
रोज भोर से पहले तुम्हारा
मुझे देना ब्रह्मकमल
ब्रह्मकमल के अर्पण के बहाने
मेरी अंजुरी को छूना
वे ओस से भीगे लम्हे ही
लाते थे सोगातें प्यार की
तुम आते थे साथलाते थे
एक फूल ब्रह्म कमल का --------हाँ एक फूल
ब्रह्मकमल का




































कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें