शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

जीवन एक मुखर प्रश्न

मन के केनवास पर उभरते प्रश्न
कभी उत्तरित नहीं होते
और
कभी अनुत्तरित भी नहीं रहते
इन उत्तरों अनुत्तरों के मध्य
प्रश्नकर्ता का प्रश्न
उत्तरदाता का मोन
या
कुछ कह्जाने की अद्य्म लालसा ,
पूछने बताने की अभिलाषा , स्पन्दित होती है
तब
लगजाते है कई प्रश्न चिन्ह
दे जाती है उत्तर मोन खामोशियाँ
ढल जाते है अकोश बिखर जाती दर्द की पखुरियां
भाव बह जाते हेनयन जल में
जिन्दगी खुद बन जाती है एक प्रश्नचिन्ह
ओर जीवन
एक मुखर प्रश्न ?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें