शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

जब जंगल हुए लाल ,प्रकृति ने टेसू पर फैलाया गुलाल ,तब बसंत का आगमन हुआ है यह स्वमेव पता चल जाता है ऋतू परिवर्तन की यह सुचना है जो प्रकृति का अटल नियम भी जिसकी पुनरावृति एक निश्चित समयांतराल पश्चात् होती ही है यह परिवर्तन जीवन के लिए बहुत जरुरी भी है जीवनोपयोगी एन ऋतुओं के क्रम में आने वाला बसंत एक मोसम ही नहीं जीवन सम्वेदनाओं के साथ जीवन दर्शन भी है जीवन के अदभुद सौन्दर्य के दर्शन की व्याख्या
के लिए प्रकृति की बसंत शेलिअदभुद ,अनोखी ,अनुपम और अद्वितीय हैऋतू परिवर्तन के क्रम में बंधी बस्न्त्रितु आगईहै-----------
चंचल पग दीप शिखा के घर ,गृह, वन,मृगवन मे आया बसंत ,
सुलगा फागुन का सूनापन सौंदर्य शिखाओं में अनंत
अधरों की लाली से चुपके ,चुपके ,कोमल गाल लजा
आया पंखुरिओं को काले पीले धब्बों से सजा
यह बसंत अपने आप में भरपूर कशिश लिए एक खुशनुमा माहोल देता है क्या चाहते है हम?
क्या है हमारी जीवन आस ?यदि एस प्रश्न पर विचार किया जाये तो मन की धरती पर बसंती मधुमास का स्वप्न उभर आता है यही स्वपन तो सबसे सुखद ,सुन्दर होता जीवन की आस बसंती मधुमास हाँ जीवन की आस बसंत भरा उल्हास

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