शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

बुधवार, 27 जनवरी 2010

ब्रह्म कमल एक प्रेम katha

हिमालय की चोटियों पर
भोर होते से सांझ ढले तक
जब मन्दिरों से घंटे और शंखों की
आवाजें आती है
चट्टानों के बीच
अचानक कई ब्रह्मकमल खिल ऊठते है
प्रकृति के ये प्रस्फुटन होते है
कितने पवित्र ?
इतने पवित्र की
आस्था और विश्वास के साथ
श्रद्धा के फूल बन जाते है ---------------ब्रहमकमल .
स्वाति तिवारी { उपन्यास से ---------ली पंग्तियाँ }

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