झूठ की बुनियाद
डॉ. स्वाति तिवारी
महानगर कीतेज रफ्तार वाली आपाधापी-भरी जिन्दगी में तो चारों तरफ शोर ही शोर है । शोर भी इतना कि लोगों के कान या तो कम सुनने लगे हैं या कहें ,ऊंचा सुनने के अभ्यस्त हो गए हैं । इसी ध्वनि प्रदूषण,वायु प्रदूषण से बचने के लिए हमने घर शहर से बाहर बनवाया था,पर शहर का विस्तार दावानल की तरह फैलता हुआ अब हमारे घर के आस-पास भी पहुंच चुका है। पहले थोडी दूरी पर एक बड़ा कोचिंग इंस्टीट्यूट खुल गया, फिर एसटीडी, पीसीओ, फोटो कॉपी सेंटर, कैंटीन, मेस, ऑटोस्टैंड को आकार लेते क्या देर लगती है। फिर घर तेजी से बनते गए, फिर मंदिर, बाजार सब आते गए और हम एक वेल डेवलप्ड कॉलोनी में रहेते हैं!
डेवलपमेंट शहर का हो, कॉलोनी का हो, तो खुद का भी होना चाहिए।बस पासवाला प्लॉट ले, घर से जुड़ता हुआ एक गल्स होस्टल बनवा डाला और वह भी चल निकला। पचास सीट का होस्टल मेरी उपलब्धि है। रामनवमी पर कॉलोनी वालों ने सामनेवाले मंदिर में रामायण का पाठ रखा तो सबसे ज्यादाचंदा मैंने ही दिया। रामजी की कृपा से होस्टल अच्छा चल रहा है, यही सोचकर। पर मुझे क्या पता था कि यह सिरदर्द का कारण बनेगा। रामायण शुरू होने से पहले और बाद में वहां जोर-जोर से लाउडस्पीकर पर फिल्मी गाने बजते जो मेरे साथ-साथ परीक्षा की तैयारी कर रही मेरी छात्राओं के लिए भी परेशानी का सबब थे। सभी लड़कियाँ झल्लाती रहतीं, पर वह एक लड़की चुपचाप पढ़ती रहती जैसे शोर उसे सुनाई ही नहीं देता हो। बस पढ़ना या सोना, दो ही काम थे। बहुतकम बोलती थी वह। पिछले एक साल से वह लड़की यहां मेरे होस्टल में रह रही है। सामने वाली कोचिंग इंस्टीट्यूट मं वह पीएमटी की तैयारी कर रही है,ड्रापर है। उसकी तन्मयता देखकर मुझे लगता है, वह इस अटेंप्ट में निकल जाएगी। बडा प्यारा सा चेहरा है। सांवला-सलोना रंग,तीखे नाक-नक्श और बड़ी-बड़ी हिरणी जैसी आँखें। हल्की सी उदास मुस्कान के साथ चुपचाप अपनी पढ़ाई में लगी रहती है। एक उसकी सहेली खुशबू है,उसी की रूममेट-चटपटी चंचल लड़की। बात -बात पर खिलखिलाना औरे हमेशा चिल्लाना,ऊधम,मस्ती से भरी हुई। विपरीत स्वभाव के बावजूद दोनों बड़े प्यार से रहतीं।
सभी लड़कियों के घर से फोन आते हैं। माता-पिता,भाई-बहन मिलने भी आते, पर मैने गौर किया कि उसके लिए फोन कम ही आता। आता भी तो मामा या कभी-कभी माँ का फोने आता। उसकी फीस या खर्चा-पानी देने भी मामा ही आते थे। लड़कियाँ अक्सर खाने की टेबल पर अचार-मसाले,स्वाद या किसी नई डिश के वक्त अपने-अपने घर की तारीफ और तौर तरीकों की चर्चा करतीं। कभी खाने के स्वाद को लेकर तो कभी धर की सजावट,पापा-मम्मी के झगड़े,भाई-बहनों के किस्से सब एक दूसरे से बढ़ा-चढ़ाकर बखाने जाते और मैं देखती कि बात कोई भी हो घूम-फिरकर अपने-अपने पापा-मम्मी की पसंद या स्वभाव पर केन्द्रित हो खत्म हो जाती। पर मैने देखा, वह उन सब बातों में कम ही बोलती। हाँ, सबकी बातें सुनती अवश्य रहती ।
लड़कियों की चर्चा में मुझे मजा आता था और मैं अपने खोए हुए छात्र-जीवन में पहुंच जाती। मुझे अपने वे दिन याद आ जाते जब मैं भी इंदौर के जीडीसी होस्टल में रहती थी। मैं, आभा और शिखा हम तीनों ही रूममेट थे। इन लड़कियों में मुझे अपना बचपन याद आता। किशोरावस्था से थोड़ी ऊपर यह उम्र सबसे सुन्दर होती है और तमाम उम्र यही याद आती है, इसीलिए मैं इन लड़कियों को उनके हिस्से की
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ऊधम-मस्ती करने देती। अनुशासन यदि आटे में नमक जितना टूट भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है । अरे वार्डन हू कोई जेलर तो नहीं। बस मेरे इसी स्वभाव से लड़कियाँ मेरी अच्छी दोस्त बन जाती। मुझे भी लगता, क्या रखा है जीवन में, ये खुशहाल क्षण हैं जो देखते ही ओझल हो जाएंगें और ये सब भी फंस जाएंगी दुनियादारी के जंजाल में-वही घर-गृहस्थी,ससुराल के कायदे-कानून,बच्चों की रेलमपेल,पढ़ाई-लिखाई । तब होस्टल की यही यादें हमेशा सुकून देंगी तो फिर क्यूं ना इन्हें इनकी खुशियों के साथ जीने दिया जाए। ये तो लड़कियां हैं और लड़कियां पहले ही होम सिकनेस का शिकार होती हैं। ज्यादा कठोरता या बंधन उन्हें सुधारने की बजाय विद्रोही बना देता है और फिर क्या करेंगी, ज्यादा से ज्यादा एक आध बार फिल्म देखने की जिद्द। इतना मैं स्वयं साथ जाकर करवा देती हू। बस बच्चे भी खुश और होस्टल का अनुशासन स्वयवेम ही बना रहता।
सारी लड़कियां इस वक्त मेहनत कर रही होती हैं। अगले महीने उनकी परीक्षा होनी है। इम्तिहान के समय होस्टल का माहौल ही अलग हो जाता था।
गर्मियों की हल्की सी शुरूआत। मार्च-अप्रैल का महीना। इन दिनों मैं बच्चों की डाइट पर पूरे वर्ष से कुछ ज्यादा ही खर्च करती हू। यूं तो एक्जाम्स फोबिया की शिकार हो लड़कियां खाना पीना कम कर देती हैं फिर प्रॉपर डाइट न मिलने से वीकनेस आ जाती है जो पढ़ने नहीं देती। यही सोचकर खाने में दूध -दही का एक आइटम बढ़ा देती हूँ। तीन बजे की चाय के साथ गरम नाश्ता या फल बंटवा देती हूं। कुछ बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता बजट पर,उन्हीं का पैसा है थोडा सा खर्च बढ़ाकर होस्टल बजट कम भी हो जाए तो कौन सा मेरे एकाउन्ट में कमी आ जानी है। होस्टल है,बच्चों के पैसों से ही चलता है। उनका पैसा उन्हीं पर खर्च होने से होस्टल की प्रतिष्ठा बनी है। प्रदेश का बेहतरीन होस्टल माना जाता है। तभी तो हमारे यहां दूर दराज तक से लडकिया आती। मुम्बई से लेकर हरिद्वार,मसूरी,नैनीताल और सिक्किम तक की लड़कियाँ यहाँ हैं। दरअसल एक तो शहर में पीएमटी,पीईटी की बेहतरीन कोचिंग है,दूसरे यहां की होम साइंस फैकल्टी और एमएचएससी की डिग्री दुनियाभर में विशेष मान्यता रखती है। उसी क्रम में नेहा भी नैनीताल से यहाँ इतनी दूर आई हुई है। उसकी चुप्पी मुझे बडी रहस्यमय लगती है। उसकी जिंदगी में जरूर कुछ ऐसा है जो सामान्य नहीं है।
परीक्षा की तैयारी के लिए लगने वाली पीएल में बहुत सी लड़कियां यहीं रूकी रहती हैं। घरों में या तो जगह की कमी होती है या फिर पढ़ाई का वैसा एटमॉसफियर नहीं बन पाता, जैसा होस्टलों में रहता है। नेहा भी नहीं गई। उसकी परीक्षा तो मई में होनी थी। उसने सेन्टर भी यहीं लिया था। परीक्षा देकर वह चली गई अपने मामा के घर। इस बीच अप्रेल में एक बार उसको बुखार था और तभी उसके मामा का फोन आया था। मेरे यह बताने पर कि उसे तेज बुखार है अगले दिन उसकी मम्मी मामा के साथ आई थी दो दिन वे रूकी थीं होस्टल के गेस्ट हाउस में। हमारे होस्टल से थोड़ी दूर कैंपस में ही चार कमरों में होस्टल के गेस्ट हाउस की सुविधा भी है, और दो दिन तक अभिभावक संस्था के गेस्ट होते हैं। उन्हें लंच व डिनर होस्टल मेस से भेजा जाता है। इस दौरान दो-तीन बार उसने मेरी मुलाकात हुई, वही चेहरा बिल्कुल नेहा जैसा,बस समय और प्रौढ़-उम्र के निशान समेटता हुआ। देखते ही अंदाज हो जाता कि वे अपनी युवावस्था में बिल्कुल नेहा सी लगती होंगी। अब भी वे युवा ही हैं,लगभग पैंतीस-छत्तीस वर्ष की।
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समय को जाते कहां देर लगती है। नेहा के बाद यहाँ पांच बैच और निकल गए और जाने कितनी लड़कियाँ आई भी ओर चली भी गई पर नेहा की चुप्पी कभी कभी मन में खटकती रहती।
इस बार मई-जून मं एक वर्कशॉप में मुझे नैनीताल जाना था। बार बार याद करती रही पर याद नहीं आया कि कौन सी लड़की नैनीताल की थी। पहले सोचा, रजिस्टर में ढूंढ लू फिर लगा इतने सालों में तो लडकी घर बार वाली हो गई होगी। कौन इतनी माथा पच्ची करें। बात आई गई हो गई ।
नैनीताल में राष्ट्रीय स्तर पर एक वर्कशॉप रखी गई थी, सभी प्रोफेसर कम वार्डन्स की। वर्कशॉप में अपने अपने अनुभव बताने थे वार्डनशिप के और छात्रावास सुविधाओं को बेहतरीन बनाने पर विचार विमर्श भी था। मैं सपरिवार गई इस वर्कशाप में, क्योंकि इस बहाने गर्मी में हिल स्टेशन की यात्रा का मोह भी था। हिल स्टेशन चाहे मसूरी हो,शिमला हो या नैनीताल सुबह व शाम बेहद खूबसूरत लगती है। सुबह कोहरे का धुंधलका और कंपकंपी थी। वही जल्दी उतर आई अंधियारी शाम और जगमगाते लट्टुओं की रोशनी। लगता है, सारा पहाड़ दीपावली की दीपमालाएं संजोए हुए है। बस, ऐसी ही एक शाम उतर रही थी। नैनीताल के उस तिब्बती मार्केट पर मैं भी शॉल और ऊनी कपड़ों की खरीदारी में लगी थी। एक आसमानी-सा शॉल मुझे बहुत देर से लुभा रहा था। मैने ज्यों ही उसे देखने-परखने के इरादे से हाथ बढ़ाकर उठाना चाहा, तभी एक हाथ और उसे उठाने को बढ़ा था। सहज था--एक साथ दो लोग एक वस्तु उठाएं तो वे एक-दूसरे पर भी नजर डालेंगे ही। मैंने उस नाजुक से हाथ वाली स्त्री को देखा तो नजरें एकदम पहचान गई। अरे नेहा की म्ममी...
मैं लगभग चीख उठी, जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई हो, पर वे इस अप्रत्याशित आक्रमण से सकपका उठीं। उन्होंने बात संभालते हुए कहा, ‘‘नेहा की मम्मी नहीं, नेहा की बुआ ! ’’ अब मेरी बारी थी सकपकाने की। मुझे अच्छी तरह याद है, वे नेहा की मम्मी के रूप में ही मिली थीं। मुझे होस्टल में।
मैंने स्वयं को सहज बनाते हुए कहा, ‘‘ ओह, सॉरी।’’
‘‘नहीं, नहीं, कोई बात नहीं। दरअसल हम बुआ-भतीजी के चेहरे-मोहरे इतने मिलते हैं कि कन्फ्यूज होना स्वाभाविक है पर आपने मुझे कैसे पहचाना ?’’ वे बनावटी अंदाज में बोली।
‘‘जी ! पहले मैं समझी नेहा है, पर फिर आपके लंबे बाल देखकर लगा आप उसकी मम्मी होंगी। पर मम्मी न सही, बुआ सही, कुछ तो लगती हैं आप नेहा की और मैं ज्यादा गलत नहीं थी एमआई राइट? ’’ अब बात संभलने की बारी मेरी थी।
वे सकुचाते हुए प्रश्न करती हैं, ‘‘ पर आप... आपसे मेरा परिचय कभी हुआ नहीं?’’
‘‘जी हां, आप सच कह रही हैं, पर नेहा मेरी स्टूडेंट रही है और उसका वह सांवला रूप मैं भूल नहीं पाई ।’’
‘‘अच्छा...अच्छा...’’
‘‘कैसी है नेहा?’’ मैंने जिज्ञासा जताई। दरअसल यह मेरे स्वभाव में शामिल है।
वे पहले खामोश रही फिर, धीरे से बोली, नेहा नहीं रही।’’
‘‘कब ? कैसे?
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। अपने पर्स से अपना विजिटिंग कार्ड निकालकर पकड़ा दिया और जाते हुए बोली ‘‘कल दोपहर में आप लंच हमारे घर पर लीजिए। ’’
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‘‘नहीं, नहीं... ऐसे ही समय मिला तो आऊंगी।’’
‘‘अगर आप आएंगी तो नेहा की आत्मा को अच्छा लगेगा... आप उसकी इतनी प्यारी टीचर हैं, क्या इतना भी हक नहीं बनता मेरा।’’
‘‘जी अच्छा, तब तो जरूर आऊंगी।’’
वे हाथ पकड़े उस आसमानी शॉल को आगे बढ़ाते हुए बोलीं, ‘‘ अगर आप बुरा न माने तो यह शॉल मैं खरीद लूं ।’’
मैं नेहा की खबरके बाद यूं भी खरीददारी के मूड में नहीं थी। मैंने हां-हां कर दी।
अगले दिन हमारे होटल में उनका फोन आया, ‘‘ आप आ रही हैं न ?
मैने ‘ हॉ ’ कर दी।
ठीक बारह बजे उनकी गांड़ी मुझे लेने आ गई। मैं उनके बंगले के बाहर ‘नेह गृह ’ की नेमप्लेट पर अटक गई। बड़ा भारी आलीशान बंगला था। लंबा-चौड़ा लॉन गार्डन, जहां अलसेशियन की भौं-भौं ने स्वागत किया।
वे दरवाजे पर ही मेरा इंतजार कर रही थीं--‘‘आइए।’’
मैंने घर में प्रवेश किया। उनके पति दफ्तर जाने की तैयारी कर रहे थे। वहीं खेलती छोटी-सी बच्ची, चेहरा वही नेहा-सा ! वे मेरी नजरों का प्रश्न पढ़ चुकी थीं।
‘‘ये मेरी छोटी स्नेहा।’’
उनके पति ने दफ्तर की फाईलें उठाते हुए उन्हें टोका, ‘‘ छोटी नहीं, हमारी इकलौती बेटी स्नेहा।’’
उन्होंने बात संभाली, ‘‘अभी तो छोटी ही है।’’
श्री सिंह (उनके पति) मुझसे क्षमा मांगते हुए दफ्तर चले गए। मैने महसूस किया कि पति के जाने के बाद ही वे सहज हो पाई। उसके पहले एक आवरण-सा उनके व्यक्तित्व पर चढ़ा हुआ था। अब घर में हम दोनों ही थे। उन्होंने डाइनिंग टेबल पर खाना लगाते हुए धीमे-से स्वर में कहा, ‘‘ मुझे माफ करिएगा मैडम।’’
मैंने चौकते हुए कहा, ‘‘किसलिए ?
‘‘जी ! मैं नेहा की बुआ नहीं, मां हूँ। पर मेरे पति नहीं जानते यह राज और इसलिए कल मैं आपसे इस तरह... ’’
‘‘ कोई बात नहीं, मैं समझ गई थी कि कोई वजह होगी, वरना..’’
‘‘क्या हुआ था नेहा को ? मैं उत्सुक थी उस व्यथा को जानने के लिए। दरअसल छात्रावास अधीक्षिका के रोल ने मेरे मातृत्व को विस्तृत कर दिया था। मुझे लगता था कि मैं एक मां की तरह हर छात्रा के सुख-दुःख समझने लगी थी। अपने बच्चों को उच्च शिक्षा लेते, अच्छे पदों पर पदस्थ होते या अच्छा घर-वर मिल जाने पर जो खुशी एक मां को होती है वही खुशी मुझे अपनी छात्राओं की जानकारी के बाद मिलती थी। हल्का-पतला घर-वर की बात तो कई लड़कियों की पता लगती थी। किसी-किसी के माता-पिता की मृत्यु,बीमारी वगेरह की खबरें यहां-वहां से मिलती रहती थीं। कुछ देर मैं दुखी भी होती उस खबर से, पर इस बार छात्रा की ही मृत्यु के समाचार से अवगत हुई थी, मेरे लिए यह बेहद पीड़ा-भरी खबर थी।
‘‘नेहा ने मेडिकल कॉलेज के फोर्थ ईयर में पहुंचकर अचनाक आत्महत्या कर ली।’
भारी कंठ से रुलाई रोकते हुए मैं सिर्फ ‘क्यों’ बोल पाई।
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दरअसल यह एक लंबी कहानी है। नेहा और हिमांशु मेरे पति की संतान हैं। उनका एक एक्सीडेंट में निधन हो गया था, तब हम यूएस में थे। नेहा तब पांच साल की थी और हिमांशु गोद में ही था।
मैं सब प्रॉपर्टी बेचकर भैया के पास आ गई थी, भैया दिल्ली में हैं। उन्होंने कहा, पैसा फिक्स में रख दो और तुम दूसरी शादी कर लो।’’ तब मेरी उम्र भी मात्र 25 साल थी। भैया ने अखबारों में विज्ञापन देखना शुरू किया । भाभी की संतान नहीं थी, इसलिए हिमांशु को उन्होंने गोद ले लिया, पर नेहा लड़की थी, रह गई और एक दिन भैया ने उसे भी दिल्ली के बोर्डिंग में डाल दिया। दरअसल उन्होंने एक विधुर का विज्ञापन पढ़ा था। दो बेटों का पिता, उम्र बत्तीस वर्ष थी, करोड़ों का बिजनेस था, पर शर्त थी निःसंतान, विधवा या परित्यक्ता ही चाहिए थी। भैया ने समझाया,चुपचाप शादी कर लो, तुम्हारा सारा पैसा सुरक्षित है। नेहा का भविष्य बन ही जाएगा। आगे उसे मेडिकल में डाल देंगे। डॉक्टर लड़की का शादी-ब्याह भी किसी डाक्टर से हो जाएगा। तब मैंने सोचा था भैया की बात मान लूं, बाद में पति को समझा दूंगी और बेटी को पास बुला लूंगी,पर पति का रुतबा देख हिम्मत ही नहीं हुई थी। नेहा पिता के प्यार के किए तरसती थी और मां खुलकर प्यार नहीं करती थी। उपेक्षा की शिकार नेहा घुट-घुटकर निराशा के दौर में उलझ अंततः आत्महत्या कर बैठी। यह छोटी बिटिया... इसका तभी एक माह पहले जन्म हुआ था। मैने चुपचाप इसकी फोटो उसे भेजी थी। उसने मेरे पास आकर रहने और अपनी बहन से मिलने की इच्छा बार-बार जाहिर की। वह भी बच्ची ही थी। हर बच्चा चाहता है। वह कई बार फोन पर कहती थी, आपने अपने घर के लिए मुझेे बेघर कर दिया, मम्मी! क्या एक बार भी आप मुझे अपने पास नहीं रख सकतीं। पर मैंने सोचा, कुछ दिनों में पति से बात कर लूंगी, पर बहुत देर हो गई, तब तक नेहा ने मुझे सजा दे डाली...
 
‘‘ आपके पति कैसे स्वभाव के हैं?’’
‘‘ अच्छे हैं, बहुत अच्छे हैं, पर झूठ उन्हें पंसद नहीं और मेरी शादी झूठ की बुनियाद पर ही रखी गई है। क्या कहती उन्हें। वे बस इतना जानते हैं कि नेहा भैया की बेटी थी, अब नहीं रहीं।’’
मैं भारी मन लिए उठने लगी।
क्या रखा है ऐसे शादी-ब्याह के सुख में। हम किस समाज में जी रहे हैं।एक दो बच्चों का पिता अपने दूसरे विवाह में निःसंतान स्त्री चाहता है और एक स्त्री अपने दूसरे विवाह को अपराध की नजर से देखती है, क्योंकि वह झूठ की बुनियाद पर खड़ा किया गया है। पति पाने के लिए अपने बच्चे को छोड़ने पर मजबूर है। क्या यह संभव नहीं कि एक पुरूष एक स्त्री को उसके वैधव्य के साथ अपनाता है तो उसकी संतान को भी स्वीकारे, जबकि वह स्त्री उसके बच्चों की मां बन रही है!
मैं उनसे विदा लेती हूं-- ‘‘ अच्छा मैं चलूं।’’ मेरी आंखें और आवाज दोनों नम और भारी हैं।
वे वही आसमानी शॉल मेरे कंधे पर डालती हैं-- ‘‘ प्लीज यह छोटी-सी भेंट है मेरी तरफ सेे, ना मत कहिएगा। नेहा को आसमानी रंग बहुत प्रिय था।
स्वाति तिवारी
ईएन-1/9 चार इमली भोपाल
संपर्क 9424011334,9425056505

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