शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

हमें भी फक्र है


आह़ाजिन्दगी ,में उस्ताद अमजद अली खां ने बड़े फक्र के साथं लिखा है किअनेक राजनीतिकपार्टियों ने मध्यप्रदेश में शासन किया ,लेकिन किसी ने भी महानसंगीतज्ञ तानसेन के नाम पर संगीत अकादमी या संगीत संस्थान बनाने पर विचार नहीं किया .संभव है कि आज कि युवा पीढ़ी तानसेन के बारे में ज्यादा नहीं जानती हो , तानसेनसम्राट अकबर के नो रत्नों मेसे एक थे ,जिनका जन्म ग्वालियर में सन १६०६ में हुआ था .ग्वालियर ने देश को बेहतरीन संगीतज्ञ दिए .इस शहर कि तुलना ओस्ट्रिया ,जर्मनी या रूस जैसे देशों से क़ी जाती है.मित्रों अमजद जी ने फक्र यूँही नहीं किया है ,इस प्रदेश मे कला का गढ़ रहा है प्यारेखाँसाहेब , रहमत अलीखां,शंकर राव पंडित ,कृष्णन राव पंडित ,पर्वत सिंग ,माधव सिंग ,आमिर खां साहेब ,कुमार गंधर्व ,लता मंगेशकर ,किशोर कुमार ,उस्ताद अमजद अली खां ,कवि प्रदीप जैसे कलाकार दिए .पर विडंबना ही कहेंगे कि हम विरासतों को सहेजने में कमजोर पड़ते जा रहे है अपने प्रदेश से गहरा लगाव सभी को होता है मुझे भी है .मध्य प्रदेश कि कला और संस्कृति बहुत उर्वरा है जरुरत है सरकार के साथ साथ जनता के प्रयासों कीभी ,हम अपने प्रदेश को समझे ,पहचाने ,सहेजे ,संभाले ,और संवारे ,कला और कलाकार फक्र करने कि ही बात है अमजद जी हमें भी फक्र है तानसेन भी यहीं के थे आप भी यंही के है .ये श्रंखला
आगे भी जुडती रहे.
फक्र

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