शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

स्मृतियाँ

जैये नीले समंदर पर
उठती-गिरती उज्जवल लहरें
जैसे सुख के चमकीलें दिन
और दुख की स्याह रातें

कितना अजीब है प्रकृति का क्रम
एक रंग में से उभरता दूसरा रंग
जीवन भी रंग बदलता है, हर पल,हर कदम
पर तुम अकेले कहाँ, जीवनसाथी है तुम्हारे संग,

मज़ा है तब जब हो आपसी विश्वास
और प्यार की मिठास
किए जाओं कर्म,मन रखना साफ

ईश्वर भी तलाशता है सुन्दर घरौंदे
जहाँ दें वह आशीष की सौगात
दुरियाँ हो चाहे कितनी ही
महसूस होते हो आसपास

क्योंकि मन में बसी है प्यारी याद।

समय
बंद मुठ्ठी ये फिसल जाता है समय
और हम सोचते रहते हैं
कि वक्त हमारे साथ है
पर, जब खोलते हैं मुठ्ठी तो लगता है
कि समय हमारे पास बहुत कम है
लेकिन तभी पता चलता है कि
समय हमारी मुठ्ठी ये
रेत की तरह फिसल गया
और हम देखते ही रह गए।
हम सोच रहे थे
कि सफलता के शिखर पर पहुँच जाएंगे
परंतु, फिर समय की कमी के कारण
हम पीछे ही रह गए
और जमाना देखता ही रह गया।
हम सोच रहे थे, कि
सफलता कैसे प्राप्त की जाए?
फिर सोचा,
क्यों न समय को सहेजकर रखा जाए
परंतु, तभी याद आया,
क्या समय हमारे पास है
जब यह सोचा, तो याद आया
कि सचमुच समय हमारी मुठ्ठी से
रेत की तरह फिसल गया
और हम पीछे ही रह गए।
पर, जब आँख खुली तो मैंने पाया,
कि वह एक स्वप्न है,
समय मेरे साथ है
और मैं समय के साथ हूँ
और सफलता मुझे
समय की सीढ़ियों पर बुला रही है
अब मैंने पाया
कि समय मेरी मुठ्ठी में है।
-- रूचि बागड़देव --

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