शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

बेहतर दुनिया के लिए के लिए बेहतर शब्द चाहिए .शब्द पंखों की तरह हलके ,मुलायम, सुनहरे ,उर्जावान हों जो हमें दुनियाकी सैर करादें.जो नीले गगन से लेकर खुरदुरी जमीं पे भी लायें तो खुरदुरे पन का एहसास न हो .क्या हम गढ़ सकते हैं एसे शब्द?

4 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल जी..गढ़ते चलिये. अनेक शुभकामनाएँ.

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  2. सादर वन्दे!
    शब्द ऐसे हों जो निशब्द ना लगें, बाकी गढ़ने से तो भगवान गढ़ जाते हैं, फिर शब्द तो उसका दूसरा रूप ही होता है.
    रत्नेश त्रिपाठी

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  3. swati ji ki anya kahaniya padhi thee. aaj achar.. padhkar unke shabd shilapankan se aur adhik prabhawit hua. swati ji aapko hardik badhai.niymit read karunga. ashok manwani,bhopal

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