शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

बुधवार, 5 मई 2010


जीवन उत्सव
ऐसे भी पल आये जीवन में
अखिंयाँ रह गयी ठगी ठगी
मन अचरज से भर आया
तन लहराया गंध -सुगंध सा
जीवन उत्सव कहलाया
ऐसे भी पल आये जीवन में
मन उपवन -सा महकाया
दीप्त शिखा का उज्जवल
एक स्वप्न -सा उभर आया
मुक्त का सीपी से हो बंधन
ऐसा ही बंधन बंध आया

ऐसे भी पल आये जीवन में
हाथ जोड़ साथं माँगा था तुमने
पल दो पल का और हम?
हम जीवन ही अर्पित कर आये
अपनी एक ख्वाबों की दुनिया
दो गज जमीं में दफना आये
ऐसे भी पल आये जीवन में
आँगन गुंजन युक्त हुआ
हिंडोले अम्बुआ की डाली
सुर्ख चम्पई सांजशरमाई
हाथों में मेहँदी रच आई
ऐसे भी पल आये जीवन में
जीवन उत्सव कहलाया

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