शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

मंगलवार, 18 मई 2010


जीवन की तीन
बचपन की मेरी महत्वाकांक्षाएं
बगुले के पंखों सी उज्जवल ,
सुबह की कच्ची धूप सी रुपहली
और,
मासूम कलि सी कोमल थी
जो,
सागर सी गहरी
आकाश सी अनंत
धरा सी धेर्यवान
और ,पंछी सी नादाँ थी
योवन की मेरी महत्वाकांक्षाएं
जो, दोपहर की धूप सी ज्वलंत हें
आकाश सी बिना छोरवाली
शितिज सी सुन्दर पर
मृगमरीचिका सी मिथ्या है
समाज के राक्षसी पंजों में फंसी
मुरझाई जीवन मूल्यों से संघर्ष करती
कली की तरह है ,और
आगे मेरी वृद्धा होती महत्वाकांक्षाएं
जो
होगीं सांज की ढलती कलासयी
धूप सी निस्तेज
सागर की गहराई से निकल
आकाश में उड़ी और ,
धरा पर गिरने वाली
पानी की नन्ही बूंदों सी
जो स्पर्श पाते ही
बिखर जाती है

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