शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

बुधवार, 19 मई 2010


म.प्र. में तैयार होगा साहित्यिक गजेटियर
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भोपाल । गजेटियर की तर्ज पर अब प्रदेश के हर जिले का साहित्यिक इतिहास भी लिखा जाएगा। संस्कृति विभाग ने इसकी तैयारियाँ शुरू कर दी है। इसके लिए साहित्यिक रचनाओं का जिलावार संकलन कर प्रकाशित किया जाएगा। इस अनूठे कार्य की जिम्मेदारी संस्कृति विभाग साहित्य अकादमी को सौंपने जा रहा है। संस्कृति सचिव ने बताया कि हर जिले का अपना विशिष्ट साहित्यिक इतिहास है। लेकिन उसका व्यवस्थित संकलन उपलब्ध नहीं है। योजना के तहत हर जिले के स्थानीय रचनाकारों अथवा प्रवास पर आए लोगों ने वहाँ रहकर जो साहित्य रचा होगा, उसे संकलित कर प्रकाशित किया जाएगा। यह साहित्य केवल हिन्दी में ही नहीं क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में भी हो सकता है। इसमें मालवी, बुंदेली, निमाड़ी, बघेली आदि विभिन्न भाषाओं में रची गई कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास, संस्मरण आदि शामिल हो सकते हैं। केवल क्षेत्रीय संस्कृति नहीं अगर किसी जिले में कॉसमोपॉलिटन (मिली–जुली) संस्कृति है, और उस पर कुछ लिखा गया है तो वह भी इसमें शामिल किया जाएगा। योजना के संबंध में जल्द ही सूचना जारी की जाएगी, जिसमें विभिन्न जिलों से ऐसे लोगों को आमंत्रित किया जाएगा, जो संबंधित जिले का साहित्यिक इतिहास और उससे जुड़े दस्तोवज संकलित करेंगे। साहित्य का जिलावार इतिहास प्रकाशन के बाद राजधानी समेत विभिन्न जिलों में उपलब्ध होगा।

भोपाल से संतोष रंजन की रपट [सृजन गाथा से साभार ]
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