शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

गुरुवार, 27 मई 2010


नव निर्माण
एक विशाल जंगल
जंगल में एक बरगद का पेड़
पेड़ पर सुन्दर सा घोंसला
घोंसले में बसा पक्षी का संसार
तेज हवा का झोंका आया
और ,
सुन्दर घोंसला हो गया तितर-बितर
पक्षी की अल्हड़ता का हुआ अंत
बिखरे घोंसले को देख कर
नन्हा पक्षी चिंतित था अब ,
नव निर्माण के लिए

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें