संकल्प


हम भी बुन लेते हैं
संकल्पों के जाले,
ठीक उस मकड़ी की तरह
जो घर का सपना देखती
उलझ जाती है ,स्वयं के बुने जालों में

हमारे स्वप्नों के ये जाल
महीन तारों से बुने होते है ,चटक रंगों ,रेशमी तारों के वावजूद
,जकडन की चिपचिपाहट
फंस जाने की उकताहट से
मुक्त होनेकी छात्पताहत में ,
हम
एक जाले से निकलते हुए
दूसरा जला बुनने लगते है

जाल दर जाल
बुनने और निकलने की उलछन में
हम और उलझते जाते है
अपने ही बुने मकड जालों में अपने ही मकड जालों में

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

‘‘रियलिटी शो एवं सामाजिक जीवन मूल्य’’

बैंगनी फूलों वाला पेड़