शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

मंगलवार, 1 जून 2010

आज का विचार


क्या आप अपने बच्चों को रेस के घोड़ों की तरह सिर्फ भागने की प्रेक्टिस तो नहीं करवा रहे हैं ? जीवन की सुन्दरता जीवनको सहजता से जीने में हे यह भी समझाना जरुरी हे .एक ही जीवन में आप अगर भागते ही रहे तो जीवन के अनमोलपल कब हाथ से निकल गए ये पता ही नहीं चलेगा .क्या हम इस बारे अपने बच्चे से कभी बात करते हैं?

2 टिप्‍पणियां:

  1. sahi kaha competetion ke jamane me bachpan kahin chhoot gaya to bhavishya khatre me pad jaayega

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  2. बिलकुल सही फरमाया अपने , पर लोग तो बस मशीन बन गए है

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