शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

बुधवार, 9 जून 2010

आज का विचार

आज इनके बारे सोच कर देखें .क्या हम इनके साथ न्याय करते है
.धरती पर सभी जीवों का अधिकार हे .पर आदमी अपनी हद बदता ही जा रहा हे .जो काम थोड़ी सी जगह में हो सकता .उसके लिए गगन चुम्भी इमारतें बन रही है .सीमेंट कंक्रीट के जंगल मत बनाइये जीवन को जमीं की जरूरत हे .धरती की पानी सोखने की शमताबनी रहने दें ये सुन्दर प्राणी मिटटी में खेलना चाहते हे .कुछ देर खेलने दीजिये



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