शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

शुक्रवार, 4 जून 2010

अचार (कहानी)
स्वाति तिवारी
मई की तेज धूप को देखकर याद आया कि चने की दल को धूप दिखाना है । ऑगन की धूप में पुरानी चादर बिछाकर स्टोर रूप में चले की दाल की कोठी निकालने गयी तो अचार का मर्तबान (बरनी) दिखाई दे गयी । दाल को धूप में फैलाकर पलटी तो अचार का ख्याल आया, लगे हाथ अचार को भी देख लूं । बर्नी पर कुछ नमक छिटक आया था उजाले में लाकर देखा तो यह दो साल पुराना अचार था । अम्मा कहती है - ‘पुराना अचार अचार नहीं औषधि हो जाता है - जब जी मचलाए, भूख ना लगे, स्वाद उतर जाए तो थोड़ा सा पुराना अचार चाट लो और चीर को चुस लो, सारा अजीर्ण खत्म ।‘ बात-बात में आजकल मुझे अम्मा के फंडे याद आ जाते हैं । शायद आजकल मैं बिलकुल अम्मा जैसी होती जा रही हूँ । उम्र का एक दौर ऐसा भी आता है जब हम ‘हम‘ नहीं रहते अपने माता या पिता की तरह लगने लगते हैं, वैसा ही सोचने लगते हैं । छोटी थी तो मैं हमेशा कहती थी ‘अम्मा मैं तुम्हारी तरह नहीं बनूँगी । सारा दिन बेवजह के कामों में खटती रहती हो ।‘ पर चने की दाल पर हाथ फेरते हुए मुझे अपने ही ख्याल पर हंसी आ गयी । अचार को भी परात में फैलाकर धूप में रख आयी । सोचा, इस बार अचार नहीं डालूंगी । घर में दो ही तो प्राणी बचे हैं, पति और मैं । जब तक बच्चे थे तो घर में हर तरह के अचार-मुरब्बे उठ जाते थे, पर बच्चे बाहर चले गए और हम दोनों को ही हाई ब्लड प्रेशर है । रही कसर डॉक्टर ने इनके सामने बोल कर पूरी कर दी है कि ‘भाभीजी जरा अचार-पापड़ भी कम ही खाना आपका ब्लड प्रेशर भाई साहब से ज्यादा है ।‘ बस तभी से हमारे ये लकीर के फकीर थाली में तो दूर, टेबल पर भी अचार नहीं निकालने देते । कहते हैं ‘टेबल पर रखा कि तुम थोड़ा सा के चक्कर में ले ही लोगी ।‘ और बस अब घर में अचार-पापड़ की खपत ही समझो बन्द हो गयी है । गाहे-बगाहे मेहमानों को सर्व करने या ट्रेन के टिफिन में अचार की वेल्यू बनी हुई है । हॉ हमारा माली जरुर एक दो दिन में अचार की फरमाईश कर लेता है, दे देती हूँ पता नहीं सुबह से आता है साग-सब्जी हो ना हो सोचकर ।धूप में सूखते अचार को देखकर पति महोदय ने टोका ‘अब अगर अचार भी कपड़ों की तरह धूप में सुखाना पड़ता है तो मेडम डालना ही क्यों‘ ? ‘अरे दो साल पुराना अचार है दवाई की तरह हो गया है । फिर आपको जो बोर-भाजी (सूखे बेह और सूखी मैथी की भाजी) की दाल पसन्द है ना, उसमें उबलती दाल में सूखा आम का अचार डालती हूँ तभी तो बोर-भाजी का स्वाद उठकर आता है ।‘खोने की थाली में भरवाँ करेले थे । भरवाँ करेला इनकी खास पसन्द है ।‘वाह ! क्या करेला बना है ? फाईव स्टार वाला पाँच हजार रुपये में भी ऐसे करेले की सब्जी सर्व नहीं कर सकता ।‘ इन्होंने एक करेला और थाली में डाला । कूटी तिल्ली खोपरे के सूखे मसाले में अचार का तेल डालकर करेले भरे हैं, तभी तो कड़वाहट कम हो गयी है ।‘ मैंने उत्साही होकर बताया ।‘तो आजकल अचार यूँ नहीं तो यूँ जा रहा है पेट में क्यों ? तभी तो तुम्हारा बी.पी. घटता नही । ‘एक चम्मच तेल यूँ भी डलता ही करेले में ।‘ मैंने सफाई दी ।खाने से निपट कर मैंने अचार की दूसरी बरनी देखी । एकदम ताजा जैसा का वैसा ही था, सो थोड़ा सा हिलाकर वापस रख दिया, इस बार अचार नहीं डालूंगी सोचकर ।पन्द्रह दिनों के बाद ही एक बारिश हो गयी थी । एक दिन सब्जी मण्डी गयी तो पूरे मार्केट में सब्जी से ज्यादा अचार की केरी दिखाई दी । मैं लूँ न लूं की पेशोपेश में पड़ी और फिर बगैर लिए ही घर आ गई । उस रात सपने में मुझे पिताजी दिखे । मकड़ी का जाला झाडू में लपेट कर निकालते हुए । याद आया ऐसे ही एक बार एक बड़ा सा जाला छत पर पँखे के पास लटक रहा था और मकड़ी लगातार अपने हाथ-पैर चला रही थी । पिताजी ने मकड़ी दिखाते हुए कहा था ‘तुम्हारी माँ भी मकड़ी जैसी है सारा दिन इस गृहस्थी के जाल में हाथ-पैर चलाती उलझी रहती है ।‘ मेरी नींद खुल गयी थी । मैं खुश थी आज बरसों बाद बाबूजी यूँ दिखे, वरना हम सब चाहते थे कि वे दिखें पर कभी किसी को सपने में भी नहीं दिखे थे । मैं उठकर बैठ गयी । बाबूजी के जाने के बाद पाँच सालों से घर यूँ ही बन्द पड़ा है । माँ छोटी बहन के पास है । एक पल को लगा कि बाबूजी की आत्मा शायद अपनी गृहस्थी की उपेक्षा की तरफ हमारा ध्यानाकर्षण कर रही है कि देखो यहाँ कभी बगिया में फूल खिलते थे, मंदिर में दिया जलता था, तरह-तरह के पकवान बनते थे, अचार और मुरब्बे डलते थे । धूप में सुखते-
कूटते मसालों की सुगन्ध होती थी और तुम्हारी माँ मकड़ी की तरह इन महीन जालों में उलझी रहती थी । धूप में तप कर अन्दर आती तो चेहरा लाल हो जाता था । प्याज काटती तो आँखें धुली-धुली स्वच्छ लगती थी । मसाले कूटते उसके हाथों की नसें जैसे तानपूरे के तार की तरह झंकृत होती दिखती थी । इन सब से उसे दूर कर तुमने उसके चेहरे के रंग, उसके हावभाव, उसकी आँखों का पानी सब सुखा दिया है । मकड़ी को उसके जाले में ही हाथ-पैर चलाना आता है यह कहते हुए । मुझे याद आया बाबूजी जाला बनाती मकड़ी को कभी नहीं मारते थे । कहते थे ‘जाला जब सूखा हो जाए, मकड़ी निकल जाए तब हटाना चाहिए । तब समझ में नहीं आता था कि इसका क्या अर्थ है, पर आज स्वतः समझ में आ गया । घर संसार सबका स्वप्न है, लक्ष्य होता है जीने का, उसे पूरा करने देना चाहिए या तो पहले ही सफाई रखो कि जाले बने ही ना, नहीं तो पूरा होने के बाद सूखने दो तब हटाना । जाने क्यूँ लगा कि पिताजी चाहते हैं हम माँ की इच्छा अनुसार कुछ दिन बन्द घर को फिर चालू करें, माँ में प्राणों का संचार करने के लिए । मैंने और छोटी ने आठ दस दिन का प्रोग्राम बनाया माँ के साथ घर जाने का । पिताजी की बात (सपनो वाली) किसी से नहीं की । इस बात को सबने अपने-अपने ढंग से सोचा किसी ने कहा पता नहीं एकदम क्या सूझी । ‘प्रापर्टी का मामला होगा बँटवारे के लिए माँ को यहाँ लायी हैं । कुछ हाथ लग जाए शायद इसीलिए घर खोला होगा वगैरह-वगैरह‘ .......................पाँच सालों में घर ‘घर‘ बचा ही नहीं था । एक बन्द मकान था, जिसमें मकड़ी के अलावा चूहे, छछून्दर, सबने घर बना लिए थे । सब कुछ वैसा ही जमा था, अपने बेजान शरीर के साथ, बेरौनक सा ।छोटी तो जैसे रोने ही लगी थी ‘क्या ये हमारा ही घर है ।‘ तो कहाँ गए वे दिन ----?‘ मैं बोलने की स्थिति में ही नहीं थी और माँ को तो काका के घर ही छोड़ आयी थी जानबूझ कर कि पहले जाले हटाकर अन्दर प्रवेश की जगह तो बना दूँ । पता नहीं माँ अपनी उजड़ी गृहस्थी को देख जीवन से जुड़ेगी या टूटेगी ?यह हमारा ही घर था, कभी एक मंजिला, बाहर लॉन, चारों तरफ फूलों के पौधे, पीछे किचन गार्डन, बरामदे में एक बड़ा सा झूला पालकी वाला, दरवाजे पर बंधनवार बनाती लटकती चमेली । दरख्तों के बीच यह इमारत एक छोटी हवेली लगती थी । ‘आदमी ना रहने की वजह से एकदम विरान लगती है नई जगह मेडम‘ ड्रायवर अनवर की बात से मेरी तन्द्रा भंग हुई । मैंने कहा लो अब विराना दूर करते हैं ।
मैंने दरवाजे पर लगी कालवेल दबाई थोड़ा जाम हो रहा था स्वीच । एक बार फिर दबाई ‘घण्टी ने एक नन्हे पंछी जैसी आवाज निकाली टिन टिन टिन .......... मैंने एक बार फिर दबाई, एक बार फिर ‘शाँट सर्किट हो जायगा मेडम‘ अनवर ने टोका । ‘जानते हो अनवर जब तक बाबूजी दरवाजा नहीं खोलते थे मैं लगातार बजाती थी बेल ।‘ यादों के बादल बेमौसम, घुमड़ आते हैं और मन को गीला कर जाते हैं । अनवर ने हमारी मदद की मैं, छोटी, काकी की महरी, चौकीदार और एक लेबर हम सब ने पाँच साल से बन्द घर को पाँच घण्टे में इस लायक तो कर लिया कि अन्दर बैठा जा सके । बिजली और पानी का शुल्क माँ एक साथ चौकीदार को भेज रही थी सो मुश्किल नहीं हुई दोनों ने थोड़ी सी जाम मशीनरी को चालू करते ही हमारे लिए हथियार का काम किया । वाशिंग मशीन, फ्रीज सब के तार अनवर ने बदल दिए, फ्यूज बल्ब बदले गए, बिस्तर की पेटी से नए परदे, नया कार्पेट, नयी चादरें सब निकल आए । छोटी ने धोबी का गठ्ठर बाँधा, कल देंगे सब । गैस कनेक्शन लगाया, आश्चर्य हुआ पाँच साल से बन्द घर की टंकी भरी हुई थी । काकी ने घर से दूध लाकर उफना दिया, फिर बनी चाय और तब शाम को अनवर माँ को गाड़ी में बिठा लाया, शाम का दिया बत्ती हुआ । बन्द घर की सीलनवाली गन्ध को धूपबत्ती ने कुछ कम किया । फिर हम लाईट जलती छोड़, पँखे चलाकर, घर की खिड़कियाँ खोल, रात के खाने और सोने के लिए काका के घर आ गए । अगले दिन लंच के बाद घर मिशन फिर चालू हुआ । पिताजी की डायरी से किरानेवाले, दूधवाले, प्रेसवाले सबके नम्बर मिले । मोबाइल था ही सो घर बैठे सब आ गया । शाम का खाना हमने यहीं बनाया । अनवर कहीं गया था, लौटा तो उसके लिए सब्जी कम थी । माँ ने कहा ‘रुक कुछ बना देती हूँ ।‘‘नहीं-नहीं आप तो अचार दे दो ।‘‘अचार ..............।‘माँ पलट आयीं । मैं समझ गयी थी ‘अचार‘ माँ की यादों का अनमोल रत्न है वे
जरुर दुखी हो गयी हैं । छोटी ने आकर बताया माँ लकड़ी की अलमारी खोलकर अचार की खाली बर्नियाँ देख रही हैं । सामनेवाली जैन की दुकान से चौकीदार ने रेडीमेड अचार ला दिया था छोटी के कहने पर ।रात हम सब अपने ही घर में सोए । बाबूजी वाले कमरे में मैं, छोटी, माँ और काकी ।
अनवर ने छत पर पलंग रख लिया । चौकीदार भी वहीं सोता है । सुबह चाय बनी, पौधों में पानी डला । माँ ने पूजा की, मरती मुरझाती तुलसी के पत्तों में भी जान आयी । काकी ने नल की टपकन के पास ही गमला रख दिया था । आज सबका खाना यहीं बनना था काका, बुआ और हम सब का । आम का रस और पूरी । माँ ने ‘कहा पूरी मैं बनाऊंगी ।‘ छोटी ने डपटा, इत्ते लोगी की है दस मिनट में तुम्हारा घुटना टें बोल जाता है आधा पौना घण्टा खड़ी रहोगी ?‘
‘करने तो दे जब तक बनेगा बनाने दे, बाद में तू उतार देना ।‘ पर यह चमत्कार था या माँ का लौटा हुआ आत्मविश्वास, ना आटा सानते माँ का हाथ कंपकंपाया ना घुटने ने टें बोली बल्कि वह चकला बेलन, छोटे बर्तन भी खड़े-खड़े धो लाई ।मुझे याद आया कल पिछवाड़े गई थी तो दो कबीट पड़े थे पेड़ के नीचे, उठा लाई थी । उनको फोड़ा तो आँगन के मचान पर लगा बाबूजी कबीट की चटनी कूच रहे हैं । मैंने ख्ररड़ और सीलबट्टा साफ किया, खूब गुड़ डाल कर कबीट के बीजों को कूचना शुरु किया तो लगा बाबूजी पास खड़े हैं बिट्टू कबीट के बीजों को पहले कूच-कूच कर फिर गुड़ के साथ सीलबट्टे पर रगड़ा लसर-लसर ऐसी खट्टी-मिठ्ठी चटनी बनती है कि खाने वाला ऊंगलियाँ चाटता रह जाए, लो चखो मेरा हाथ स्वतः ही दूसरी हथेली पर लाल चटनी रख गया और मैंने आँखें मूंद कर चटनी का स्वाद लिया । ‘बिल्कुल बाबूजी जैसी ।‘ माँ मुझे चटनी पिसते चार बार देख गई कभी ‘जरा सा जीरा डाल तेरे बाबूजी डलवाते थे‘ कह कर तो कभी काला नमक डलवा कर ओगुण नहीं करेगी कह कर । सब जैसे भूल गए थे कबीट की चटनी भी बनती है ।
अगले दिन सारे अचार के मर्तबान माँ ने महरी से धुलवाए यह कह कर तुम बहनें ले जाओ, यहाँ तो खाली पड़े हैं ।‘मैंने बाजार से कच्चे आम मँगवाए । अचार के मसाले बाबूजी की डायरी अनुसार ही आए । केरी काटने का सरोता चमकाया गया । माँ परेशान होने लगी कौन काटेगा केरी
और कौन कूटेगा मसाले ।‘ रेडीमेड मसाला ले आती बिट्टू ? कैरियाँ काटने का जिम्मा मेरा था और मसाले कूटने का छोटी का । पुरानी सूती साड़ी बिछायी गयी धोकर कच्ची कैरियाँ माँ ने छाँटी । जैसे ही पहली कैरी सरोते पर रखी, याद आया बाबूजी ने कहा था‘ कैरी हमेशा खड़ी चीरना चाहिए, फाँक अच्छी बनती है ।‘ एक फाँक काटने में हाथ दुखा फिर लगा जैसे बचपन में बाबूजी हथ्था पकड़वा कर दबवाते थे और खच्च करके कैरी कट गयी फिर तो ट्रिक हाथ लग गयी और गीले खोपरे की तरह सब केरी कट गयी । छोटी ने सारे मसाले वैसे ही कूटे, माँ आश्चर्यचकित थी एकदम वैसी ही फाँक और हर मसाला सही अनुपात में कैसे किया रे छोरियो ? वह तेल गरम कर लायी और मसाले भूनते हुए बोली ‘मैं कहाँ डालती थी अचार, सब वो ही तो डलवाते थे दरअसाल नाम मेरा होता था लोग यह ना कहें कि व्यासजी अचार डालते हैं पर सच ये है बिट्टू मसालों का सारा अनुपात उन्हीं का होता था । ‘अचार डला, मर्तबान को भी पुर्नजीवन मिला, अलमारी में खुशबू फैली ।कटोरी भर कर शाम की रसोई में सर्व हुआ पर किसी का ब्लडप्रेशर नहीं बढ़ा । छोटी के पति ट्रेनिंग पर गए थे लौटते में यहीं आने वाले थे दस दिन माँ और रह सकती थी घर पर । ‘मैं दस दिन बाद आती हूँ‘ इसी वादे के साथ अपने घर आ गयी । गाड़ी से उतरी तो हाथ में अचार की बर्नी देख पति ने टोका ‘फिर अचार डाल लायी वो भी इतना ?‘मैंने गर्व और श्रृद्धा से कहा ‘ये अचार नहीं है ये बाबूजी को श्रद्धांजलि है, ये हर साल डलेगा ।‘

डा. स्वाति तिवारी
ईएन-१/९, चार इमली
भोपाल

4 टिप्‍पणियां:

  1. rulaaya fir kuch sukh ka ehsaas bhi karaya...khud se jod diya aapne....bahut sundar....maarmik aur bhaavuk rachna

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  2. aapki kahaniyon ki bunavat nai hone ke sath manviyata ko nirantar sath rakhati hai

    ravindra swapnil

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  3. कितनी सुन्दर कहानी लिखी है आपने ...बधाई दर असल मेरी माँ का माकन भी बंद पड़ा है अब पिता भी नहीं है .....मुझे लगा मे अपने गाँव पहुँच गई ...कुछ इसी तरह की एक कविता मैंने भी लिखी है थोडा अंश लिखती हूँ
    माँ तेरे जाने के बाद
    एक दिन मैं घर गई थी
    गाँव सूना सा लगा
    सुनसान सी तेरी गली थी
    मौन तेरे द्वार पर
    वो नीम की डाली कड़ी थी
    बीच वाली मट्टी की दीवार थी जो
    बिन तेरे बीमार सी बिखरी पड़ी थी

    बंद थी सब खिड़कियाँ और द्वार भी
    देहरी पर राह तकती
    मुस्कराती तू न थी

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