कहानी
रिश्तों के कई रंग
September Give Away
अब कोई वर्जना नहीं
यह मेरे प्रेम की शुरूआत थी, पर उसकी बेवफाई का चरम था। वह आयी थी अपनी ज़रूरतों के हिसाब से, पर रहते-रहते वह मेरी ज़रूरतों का हिस्सा बन गयी थी। उसका आना एक सहज घटना थी, जो मेरे द्वारा एक लड़की की मदद थी, पर आज की घटना एक अप्रत्याशित मोड़ था, जो चलते-चलते अचानक आ गया था। वह सफलता की मरीचिका में भटक रही है। एक ऐसी मरीचिका, जिसमें भटकते-भटकते जीवन और सफलता दोनों चूक जाते हैं और मंजिल तो दूर रास्ते भी दिखाई नहीं देते, उसे उसी मरीचिका का रास्ता दिख रहा था तभी तो वह बाय-बाय बोल कर दरवाजा भड़ीक कर चली गयी हमेशा के लिए....मैं बन्द होते-खुलते दरवाजे को टकटकी लगाए देख रहा हूँ। जानता हूँ अब वह कभी नहीं आयेगी....आना होता तो वह जाती ही क्यूँ? पर एक चाह सी थी मन में कि वह पलट कर आए....मेरे हाथ जोड़ कर अपनी गलती के लिए माफी माँगे और मैं उसे धक्के मार कर निकाल दूँ। मेरे अन्दर का पौरूष उसके यूँ जाने से आहत हुआ था। लगा वह मेरे वजूद पर लात मार कर चली गयी है। एक लड़की के द्वारा यूँ नकार देने पर मेरा 'मेल इगो हर्ट हुआ था। जानता था, वह बिल्कुल इमोशनल नहीं है, परफेक्ट प्रेक्टिकल वूमन है। पूरी तरह लीव इन पार्टनर जो यूज एण्ड थ्रो में विश्वास करती है। उसके लिए डेटिंग एक फिजिकल डिमांड थी, अपनी बायलोजिकल नीड्स को पूरा करने की। मैं भी तो कहाँ स्थायी प्रतिबद्धता रखना चाहता था, पर यूँ तीन साल साथ रहते एक आदत सी हो गयी है उसकी और आदतों से उबरने में मुझे समय लगता है। जब आयी थी वह...हाँ इसी दरवाजे से तब भी मुझे अपना फ्लैट एक वर्किंग लड़की के साथ अपने बेड सहित शेयर करने में भी आदत डालने में समय लगा था। मुझे पलंग पर पसर कर टाँगे फैला कर सोने की आदत थी, पर फिर उसकी आदत हो गयी थी। दरवाजे पर किसी की आहट से मैं चौंककर उठता हूँ।
दूध ब्रेड वाला है, वह पूछता है-''मेमसाब को अण्डे तो नहीं चाहिए।''
''नहीं, तुम जाओ।'' भाड़ में गई तुम्हारी मेम साब, वो अब ना अण्डे दे सकती है, ना अण्डे ले सकती है।
वह चेहरा देखता है मेरा और लिफ्ट का बटन दबा देता है, मैं पलटता हूँ। दरवाजा बंद करके टीवी ऑन करता हूँ....बिपाशा अपनी लम्बी चिकनी खुली टाँगें दिखाते हुए जादू है नशा है, गा रही है। गुस्सा आता बिपाशा पर साल्ली-ऽऽऽ--! सारी दुनिया की लड़कियां बिपाशा बनती जा रही हैं। गुस्से में चैनल बदलता हूँ, मल्लिका शेरावत को देखते ही फिर निक्की याद आ जाती है। मल्लिका के शरीर का भूगोल बिल्कुल निक्की की तरह गोल है।
शायद मैं भी इसी में उलझ कर उसको सहर्ष लिव इन पार्टनर बना बैठा था। वरना बाहर सब चलता था,पर फ्लैट पर लड़की लाना पसंद नहीं था। मैं एक बार फिर पसर जाता हूँ अपने बिस्तर पर। छत के सफेद प्लास्टर के शून्य में कुछ खोजता हूँ।
कॉल सेन्टर से बाहर निकलते हुए उससे मेरी मुलाकात हुई थी, शायद कुछ परेशान थी किसी से बात करना चाहती थी, पर बात नहीं हो पायी थी। निराश और उद्विग्न थी। व्यक्तित्व में उग्रता और बेपरवाह। बार-बार नम्बर डायल करती रही....और मुझे अपनी ओर देखता, चली आयी थी मेरे पास ''क्या मेरी मदद करोगे?'' कोई कमरा या फ्लैट चाहिए है। ग्राफिक्स कम्पनी में काम करने के साथ वह पार्ट टाइम मॉडलिंग भी करती है। सीधे-सीधे सपाट शब्दों में वह कहती है कि उसे किसी लिव इन पार्टनर की तलाश है। अभी वह एक एंग्लोइंडियन एजेड लेडी के यहाँ पेइंग गेस्ट है। पर पिछले दस दिनों में बुढ़िया रोज तंग कर रही है ''कमरा खाली माँगता।'' जान खा रही है मेरी जब तक कोई व्यवस्था नहीं हो जाती यूँ ही रोज शाम खराब कर देती है मेड वूमन।
''वर्किंग गर्ल्स होस्टल क्यूँ नहीं चली जाती।'' मैंने सलाह दी थी।
''देट शीट प्रिजन, वेयर यू आर लॉक्ड इन आफ्टर 7 ओ क्लॉक, देट्स जस्ट लाइक ए पोल्टरी फार्म वेयर आल चिकन्स आर पुट अप।'' और हम दोनों ही ताली मार कर हँसे थे। यार पोल्ट्री फार्म से तो मेड वूमन बेहतर है।
चलो कल मिलते हैं, कह कर हमने एक दूसरे के नम्बर ले लिए थे। अगले दिन दफ्तर से ही उसने फोन मिलाया था। वह शाम हमारी एक तरह से ब्लाइंड डेट थी। वह वहीं से मेरे साथ फ्लैट पर आ गई थी। सारी वर्जनाएँ तोड़ते हुए उसने पहल की थी यह कहते हुए कि दस दिनों के तनावों से रिलेक्स होना चाहती है और यह भी कि हम जब तक साथ रहेंगे एक दूसरे के प्रति वफादार रहेंगे पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं रहेगी कि हम किसी दूसरे से संबंध नहीं रख सकते।
एक पल को लगा था क्या यह इंडियन लड़की है? ज़रूर माता-पिता में से कोई एक...ऽऽऽ। पूरी तरह पश्चिमी जीवन मूल्यों से प्रभावित। अपने मतलब के लिए वह अपनी वर्जनाएँ तोड़ देती यह कहना भी गलत होगा। वर्जनाएँ तो उसके साथ है ही नहीं। रात में सफेद वाईन में बर्फ के टुकड़े डालने के बाद उसकी दुनिया ही बदल जाती है। कहती है रोमांस एक पागलपन है इसके लिए उसे समय नहीं गँवाना, सेक्स उसके लिए शरीर की ज़रूरत है। पैसा वह भरपूर कमाती है उसने अपने पिता की बेवफाई के बाद अपनी माँ को पागल होते देखा है। जीवन भर का ढकोसला शादी उसे पसंद नहीं। पर जब भी अंतरंग होती एकदम किसी अलग मूड में लगती। उसकी नसों में रेंगती उतावलेपन की कँपकँपी के साथ ही वह मेरी सम्पूर्ण देह को अपनी बाँहों में लपेट लेती और बोलने नहीं देती। कभी भीतर तक तन्मय होती तो आई लव यू कह कर लिपट जाती वरना देह के आदान-प्रदान से ज्यादा उसके लिए मेरा कोई वजूद नहीं था। शायद वह अपनी माँ की दबी-कुचली पति द्वारा उपेक्षित सेक्सुअलिटी से इतनी ज्यादा भयाक्रांत रही होगी कि उसके लिए सब कुछ वहीं तक सिमट कर रह गया है। शोहरत और सम्पन्नता के आसमान को अपने वश में करने की ख्वाहिश उसके मन में विस्तार की सारी हदों के पार तक फैली थी। ''वेलेन्टाइन डे'' पर रेड रोज की एक सो एक कलियाँ दी तो मुस्कुराई थी फिर गले में झूम गई। अपना सारा भार मुझ पर डालते हुए कहा था तुम लड़के ना वेलेन्टाइन की बात को कुछ ज्यादा ही रोमान्टिसाइज करते हो।
तीन साल साथ रहते-रहते मैं उसे शायद प्यार करने लगा था और वो जब भी मेरे पास होती मैं अपने दृष्टिकोण और आत्मा के सुप्त आदर्शों को अनगढ़ रूप देता। किसी धुंधली अधूरी तस्वीर की तरह हमारे रिश्ते के कई रंगों के बीच छूटी हुई जगह साफ नजर आने लगती। मैं भरना चाहता था इस रिक्त जगह को। उसके साथ अपने रिश्ते को।
उससे कहता उसके पहले ही अचानक डिस्को में उसे किसी ओर के साथ मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया... यह जानते हुए कि हम स्वतंत्र है। हमारे पास घर-परिवार जैसे शब्द नहीं। बटन दबा कर या क्रेडिट कार्ड स्वैप करके पैसा निकालने और डालने वाली तेज रफ्तार जिंदगी है। हम आदम और हव्वा तो हो सकते हैं पर सोनी महिवाल या लैला मजनू नहीं, फिर भी मैं लगभग खिंचते हुए उसे अपने साथ ले आया था। फ्लैट पर आते ही मैंने उससे माफी माँगी थी। ''निक्की, मैं घर बसाना चाहता हूँ तुम्हें निकिता बुलाना चाहता हूँ।''
''डू यू नो वाट आर यू सेइंग।''
तुमने आज जो किया उसके बाद भी तुम मुझसे....ऽऽऽ? जानते हो वो मेरा नया प्रोड्यूसर था मॉडलिंग की दुनिया में अभी तो मेरी दूसरी एड फिल्म बनने वाली है। शादी करके मैं अपना सारा केरियर.....उसने मुझे पाँच फिल्मों में साईन किया है। जानते हो नया फ्लैट देने वाला है, ये सब छोड़कर शादी? और फिर फ्लैट मिलते ही चली गयी। आज पूरे तीन साल दो दिन हुए हैं हाँ, एक हजार सतान्वे दिन। इस दहलीज में आने को। मैं अन्दर से अब भी आदिम पुरूष हूँ। स्त्री को वश में रखने की चाह रखने वाला पर वह अब आदिम स्त्री नहीं है वह ''आइ जनरेशन'' की ''एपल गर्ल'' है। मैं इस दहलीज को ही स्त्री की सारी वर्जना समझ बैठा पर उसके लिए अब कोई वर्जना नहीं है। छोटी सी दहलीज पर मेरा इतना बड़ा अटकाव कि वह अब इसमें कैद रहेगी मेरी बन कर। क्यों? जानता हूँ वह कोई मेहंदी रचे रोली के छापे देते गृहलक्ष्मी के पैर लेकर इस दहलीज में नहीं आयी थी। याद है मुझे उसकी खुली टाँगों वाली स्कर्ट और पैंसिल हिल वाली सैंडिल।

डॉ. स्वाति तिवारी
ई एन1/9, चार इमली,
भोपाल-462016

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