शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

गांधी : विश्व समाज के निर्माता
डा. स्वाति तिवारी
तुम रक्तहीन तुम माँसहीन
है ! अस्थिशेष तुम अस्थिहीन
तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल
हे ! चिरपुराण .....हे चिरववीन ।
उक्त पंक्तियां महात्मा गांधी के लिए कही गयी थीं, क्योंकि वे कल भी प्रासंगिक थे और आज भी प्रासंगिक हैं। आधुनिक युग के एक महान पुरुष एवं युग निर्माता जिनके बगैर आधुनिक भारत की एवं यहाँ के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वे एक ऐसे भारतीय व्यक्तित्व थे जिन्होंने हमारे प्राचीन दर्शन एवं संस्.ति से प्रेरणा प्राप्त की, समकालीन विश्व ज्ञान एवं तकनीक को समझा एवं भावी विश्व-बंधुत्व वाले विश्व की कल्पना की। भारतीय इतिहास इस महान आत्मा का सदैव ऋणी रहेगा। वे इतिहास में सत्यनिष्ठ, समाज सुधारक, विचारक तथा मुक्त मनुष्य के रूप में स्थापित हुए। वे अपने आदर्शों एवं धार्मिक चिन्तन के कारण महात्मा कहलाए। उन्होंने राजनीति में नैतिकता का समावेश करके विश्व के सामने एक अद्भुत आदर्श प्रस्तुत किया। उनकी राजनीति सत्य और अहिंसा पर आधारित थी। सत्य और अहिंसा पर आधारित उनका जीवन दर्शन ''गांधीवाद'' कहा जाता है, जिसे आम बोल-चाल एवं आज की भाषा में गाँधीगिरी भी कहा जाने लगा है। उन्होंने एक ऐसे विश्व-समाज की परिकल्पना को जो 'रामराज्य' के समान लोक हितकारी राज्य पर आधारित थी। स्वराज के लिए उनकी मान्यता थी कि जब जनता इतनी शिक्षित हो जाए कि वह सत्ता का सदुपयोग, संतुलन एवं नियंत्रण कर सके, तब स्वराज आएगा।
गुजराज के काठियावाड़ जिले में पोरबन्दर नामक स्थान पर दो अक्टूबर 1869 ईस्वी को जन्मे मोहनदास करमचन्द गाँधी ने धर्म और राजनीति का समन्वय किया। वे धर्म (आचरण) और व्यवहार को एक साथ देखते थे। गाँधीजी का 'सर्वोदय' सिद्धांत समूची मानव जाति के कल्याण की भावना पर आधारित है। उनका सर्वोदय सिद्धान्त प्रजातंत्र की लीक से हटकर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित है जिसकी स्वभावगत प्र.ति आध्यात्मिक रही। महात्मा गाँधी के अनुसार सर्वोदय आधारित समाज में सभी व्यक्ति आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों से संचालित होते हैं। इसीलिए उनके सर्वोदय में समाज के सबसे निचले वर्ग के उत्थान एवं कल्याण की भावना में भी आध्यात्म दिखाई देता है। सर्वोदय से उनका तात्पर्य सर्व उत्थान से ही था। उनके अनुसार यदि सर्वोदय सिद्धान्त का पालन प्रत्येक व्यक्ति करे तो रामराज्य स्वतः स्थापित हो जाएगा। इसीलिए वे सत्ता का विकेन्द्रीकरण चाहते थे जिसका रूप ग्राम स्वराज्य ही था। आदर्श समाज के लिए शासन के क्षेत्र में ग्राम पंचायत व्यवस्था तथा आर्थिक क्षेत्र में कुटीर-उद्योग उन्हें मान्य थे। चरखा उनकी विकेन्द्री.त आर्थिक व्यवस्था का प्रतीक है। वे शोषण समाप्त करने के लिए आस्तेय एवं ट्रस्टीशिप के सिद्धान्तों की आवश्यकता पर बल देते थे।
उनकी मान्यता थी कि सच्ची सभ्यता जानबूझकर आवश्यकताओं को बढ़ाने में नहीं हैं, आवश्यताओं को घटाने में हैं। उनका मानना था कि जीवन का निर्माण और जगत की रचना शुभ और अशुभ, जड़ और चेतन को लेकर हुई है। इस रचना का प्रयोजन यह है कि असत्य पर सत्य की और अशुभ पर शुभ की विजय हो।
महात्मा गाँधी का दर्शन एक प्रकार से जीवन, मानव समाज और जगत का नैतिक भाष्य है। इसीसे उनकी अहिंसा का प्रादुर्भाव हुआ। गाँधीजी मानते थे कि संसार में जो कुछ अनैतिक है वह सब हिंसा है। उनकी इसी चिन्तनधारा से असहयोग और सत्यागृह का जन्म हुआ। उनकी .ष्टि में अहिंसा अमोघ शक्ति है जिसका पराभव कभी हो नहीं सकता। सशस्त्र विद्रोह से कहीं अधिक शक्ति अहिंसक विद्रोह में हैं। सत्य है और विजय हमेशा सत्य की होती हैं। इस तरह महात्मा गाँधी ने विश्व के सामने सत्य और अहिंसा के रूप में उज्जवल महान नैतिक पथ निर्मित किया, जिसने मनुष्य समाज और जगत को गतिशील होने की प्रेरणा प्रदान की।
महात्मा गाँधी साध्य से अधिक साधन पर ध्यान देना आवश्यक मानते थे। उनका कहना था कि यदि साध्य पवित्र और मानवीय है तो साधन भी वैसा ही शुद्ध और पवित्र होना चाहिए। इस तरह राष्ट्रपिता के विचार शुद्ध-बुद्ध आत्मा के दर्शन कराते हैं तथा जीवन में आध्यात्मिकता एवं नैतिकता को प्रमुख स्थान देते हैं। गाँधीवाद सदा प्रासंगिक है क्योंकि वह आज के समाज के साथ ही भविष्य के समाज का भी जीवन दर्शन है। वह प्रत्येक क्षेत्र में हृदय परिवर्तन द्वारा स्थायी विकास का मार्ग दिखाता है। गाँधीवादी सिद्धांतों एवं आदर्शों में ही विश्व-कल्याण निहित है। उनमें भगवान राम की मर्यादा, श्री.ष्ण की अनासक्ति, बुद्ध की करुणा, ईसा का प्रेम, एक साथ समाविष्ट दिखाई देता है।
गाँधीजी के लिए इस सदी के महत्वपूर्ण इतिहासकार अरनॉल्ड टायनबी ने लिखा है कि . ''हमने जिस पीढ़ी में जन्म लिया है, वह न केवल पश्चिम में हिटलर और रूस में स्टालिन की पीढ़ी है, वरन् वह भारत में महात्मा गाँधीजी की भी पीढ़ी है। और यह भविष्यवाणी बड़े विश्वास के साथ की जा सकती है कि मानव इतिहास पर गाँधी का प्रभाव स्टालिन या हिटलर से कहीं ज्यादा और स्थायी होगा।'' आज यह बात अक्षरतः सत्य सिद्ध हो रही है । आज गाँधीजी के सिद्धान्तों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है।
''घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध'', भारत में यह कहावत है। भारत में गाँधी दर्शन को स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद उपेक्षा के भाव से देखा गया, वरना आज जो हिंसा, जो साम्प्रदायिक वातावरण, जो आतंकवाद, जो भ्रष्टाचार पनप रहा है वह इस हद तक नहीं होता क्योंकि गाँधीवाद हमें जीवन के कुछ मूल्य ही नहीं देता है बल्कि व्यावहारिक जीवन में तर्कपूर्ण एवं न्यायसंगत रास्ता भी बनाता है। संजय दत्त की फिल्म ''लगे रहो मुन्ना भाई'' में कुछ हल्के-फुल्के अन्दाज में 'गाँधीगिरी' के सिद्धान्तों को दिखाया गया । बड़ी संख्या में लोगों ने फिल्म को पसंद किया। दफ्तरों में भ्रष्टाचार के विरूद्ध पेंशन के लिए गाँधीगिरी का रास्ता सहज-सरल था पर दिलों को नम कर गया। यह इस बात का प्रमाण है कि 'गांधी दर्शन' आज भी लोगों को प्रभावित करता है, वह आज भी प्रासंगिक है। उनकी अहिंसा नैतिकता पर आश्रित है, अतः सत्य है और सत्य ही सदा विजयी होता है। उन्होंने जो नैतिक पथ दिया वह मनुष्य समाज और जगत को गतिशीलता देता है। वे उन समस्त मान्यताओं के धारणाओं और .ष्टियों के प्रतिवाद हैंै जिनका आधार भौतिकवाद है। गाँधीगिरी आज भी हमें विनम्रता सिखाती है। विनम्रता व्यक्तित्व का गहना है। विनम्रता सारी खुशियों की बुनियाद है, जो आपको दूसरों से अलग दर्शाती है। पर गाँधीजी के अनुसार विनम्र होने का अर्थ अन्याय सहना नहीं है। गाँधी का दर्शन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मानवीय मूल्यों के आधार पर हमारी समस्याओं का समाधान भी देता है। अगर इन्हें पुनः प्रचलित किया जाए तो विश्व कल्याण के स्वप्न .ष्टा का स्वप्न साकार होना असम्भव भी नहीं।
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डा. स्वाति तिवारी

ईएन - 1/9 चार इमली भोपाल
मोबा. - 9424011334

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