शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

पुत्रीवती भवः का आशीर्वाद दीजिए







 डा. स्वाति तिवारी

क्या आप चाहते हैं कि आपका वंशज कुंवारा रह जाए? आपकी वंशबेल बगैर फले ही सुख जाए? आपकी देहरी पर दिया धरने वाला कोई ना हो? आपका नाम लेवा भी ना बचे? चौंकिए मत ऐसा ही कुछ भविष्य में होने वाला है अगर समय रहते नहीं सम्भले तो? 29 अक्टूबर 2007 को हैदराबाद में आयोजित एशिया-पेसिफिक कान्फ्रेंस में ऐसी ही कुछ भविष्य की चुनौतियाँ सामने आयी हैं। लिंग चयन के कारण भारत में सन 2050 तक 2 करोड़ 80 लाख पुरूषों की शादियाँ नहीं हो पाएंगी।

इन चुनौतियों और चेतावनी के लिए हमारी सामाजिक व्यवस्था का ‘‘पुत्र-प्रेम’’ जिम्मेदार माना जा सकता क्योंकि हर किसी को सन्तान के रूप में बेटे की चाहत है। हमारे बुजुर्ग अगर ‘‘पुत्रवती भवः’’ और दुधों नहाओ पुतों फलो का आशीर्वाद देते रहे तो। यह दिन दूर नहीं है। सोचने और समझने का वक्त आ गया है आज यदि हम अपने हित और स्वार्थ पर ऐसा कोई निण्रय लेते हैं तो वह आगे जाकर हमारे ही परिवार और समाज के लिए घातक और चिन्ताजनक मोड़ ला सकता है। आपकी तरह और लोग भी पुत्र मोह में फंसे हैं - तो जब सबके घर पुत्र ही जन्म लेने लगेंगे तो पुत्र-वधु कहाँ से लाएंगे? आज जिन बेटियों के जन्म के विषय में ‘दहेज’ की चिन्ता सता रही है कल को वह उल्टी पड़ सकती क्योंकि तब भी दहेज देना पड़ सकता है लड़का ब्याहने के लिए? क्या सोच रहे हैं अब? ये मजाक नहीं एक सच्चाई है। एक ऐसी सच्चाई जो सामने दिखायी दे रही है और समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक इस पर चिन्तन करने लगे हैं। चिन्तन करने से काम नहीं चलेगा जुटना होगा हम सबको ‘बेटी बचाओ’ के मिशन में। बचानी होगी हमें बेटियाँ। बेटियाँ भी सोन-चिरैया ना बन जाए वरना वे भी विलुप्ती के कगार पर पहुंच जायंगी और तब भविष्य कभी हमें माफ नहीं कर पायगा। कन्या भ्रुण हत्या के हमारे अनैतिक - अमानवीय निर्णयों के लिए। परिवार नियोजन की दुहाई देकर अगर आप लिंग चयन का मार्ग अपनाते हैं तो आप जनसंख्या वृद्धि रोकने का पुण्य नहीं कर रहे हैं। बल्कि आप जनसंख्या अनुपात बिगाड़ने का पाप कर रहे हैं। बचना होगा इस पाप महापाप के श्राप से। परिवार नियोजन जनसंख्या के लिए है, लिंग चयन के लिए नहीं। यह समझना होगा यह सिर्फ आपके परिवार का निजी मसला नहीं है। यह सामाजिक सरोकार का मामला है यह वैयक्ति नहीं सार्वभौमिक है। अतः आगे आएं कन्या पूजन, कन्या भोज से पहले कन्या जन्म पर खुशियाँ मनाएँ। केवल पुत्र रत्न नहीं कन्या रत्न पर भी बधाइयाँ पाएं।

मत बनाइए और दिखाइए ‘मत आना इस देश लाड़ो’ बल्कि कहिए - राह देखता तेरी बेटी, जल्दी से तू आना किलकारी से घर भर देना, सदा ही तू मुस्काना। ना चाहूँ मैं धन और वैभव, बस चाहूँ मैं तुझको तू ही लक्ष्मी, तू ही शारदा, मिल जाएगी मुझको सारी दुनिया है एक गुलशन, तू इसको महकाय।

पर ऐसा कहने वालों की कमी है क्योंकि हमारा समाज स्त्री-निरपेक्ष ही नहीं, बल्कि स्त्री विरोधी है। सामाजिकरण की इस स्त्री विरोधी या कमतर या दोहम व्यवस्था को बदलने की जरूरत है। यह बदलाव जरूरी है, घर-घर हाँ हर घर के लिए जरूरी है - क्योंकि इससे जुड़ी समस्याएं हमारे सामने हैं।

यह निर्विवाद है कि विश्व स्तर पर जनसंख्या की अधिकता एक समस्या बन गयी है पर उससे भी बड़ा चिन्ताजनक संकट स्त्री-पुरूष अनुपात में गिरावट का सामने दिखायी दे रहा है। यूनिसेफ की ‘राष्ट्रों की प्रगति’ नामक रिपोर्ट में उल्लेख है कि अतीत में 7 करोड़ भ्रुण सिर्फ इस कारण मार डाले गए क्योंकि वे कन्या के रूप में जन्म लेने का अपराध करने वाले थे। नोबल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन ने 1990 के जनसंखा अनुमान की अपेक्षा 10 करोड़ कम स्त्रियों के मौजूद रहने की बात कही, उनका कहना है कि भारत की 9 अरब आबादी के साथ 2.5 करोड़ स्त्री आबादी लापता हैं। इसी तरह यूनिसेफ ने 1995 ई. की ‘भारतीय राज्यों की प्रगति’ में अलर्ट करते हुए कहा था कि 4-5 करोड़ स्त्री आबादी विलुप्त होती जा रही हैं। झकझोर देने वाली यह नग्न सच्चाई 2011 की जनगणना में हमारी आँखे खोलने के लिए खतरनाक स्थिति में सामने आयी है। जिसके अनुसार भारत में शिशु लिंग अनुपात अब तक सबसे नीचे के स्तर पर पहुँचकर 914 हो गया है। 27 राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में शिशु लिंग अनुपात में गिरावट दर्ज की गई है तथा देश के 50 प्रतिशत जिलों में शिशु लिंग अनुपात में राष्ट्रीय औसत की तुलना में अधिक गिरावट आई है। पिछले दशक में 10 राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में शिशु लिंग अनुपात में 22 से 82 बिन्दुओं की गिरावट दर्ज की गई है।

मध्यप्रदेश के शिशु लिंग अनुपात के 2001 से 2011 पर अगर गौर करते हैं तो हम गिरावट को समझ सकते हैं वर्ष 2001 में यह अनुपात 932 था जो वर्ष 2011 में 912 रह गया है। यू.एन.एफ.पी.ए. भारत 2010 रिपोर्ट भारत एवं राज्यों में लिंग चयन के कारण 2001 के मध्य अनुमानित ‘लापता बेटियाँ’ की गणना अनुसार लिंग चयन के कारण प्रतिवर्ष जन्म नहीं ले पाने वाली बेटियों की अनुमानित संख्या 6,01,468 अर्थात 4.8 प्रतिशत में से मध्यप्रदेश की स्थिति 17,261 अर्थात 1.9 प्रतिशत है। देश और प्रदेश की यह स्थिति एक चेतावनी है कि आने वाला समाज अपने वंश को आगे कैसे बढ़ा पायगा?

मध्यप्रदेश में भी लगातार लिंग अनुपात का गिरता ग्राफ देखकर सरकार भी निरन्तर चिंता जता रही है। सन 1991 में प्रदेश में 941, 2001 में 932 और वर्ष 2011 में 912 रह गया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान का कहना है कि स्त्री-पुरूष अनुपात में गिरावट अत्यन्त चिन्ताजनक है। पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या में कमी अनेक सामाजिक समस्याओं का कारण होती हैं, इसीलिए यह जरूरी है कि समय रहते इस सामाजिक सरोकार पर जनमानस को विकसित किया जाए। लाड़ली लक्ष्मी योजना से आगे एक कड़ी और समाज में जुड़नी चाहिए, लाड़ली लक्ष्मी तभी बनेगी जब वह जन्म लेगी। अतः बालिका बचाओ अभियान के द्वारा जनजागृति लानी होगी। ‘बेटी बचाओ अभियान’ का प्रारम्भ मुख्यमंत्री अपने शासकीय निवास पर नवदुर्गा उत्सव के दौरान कन्या पूजन से करने वाले हैं। इस जनजागृति के माध्यम से वे चाहते हैं कि लोगों को यह समझ आ जाए कि महत्त सन्तान की है बेटा-बेटी में भेद करना छोड़ दें। स्त्री को उसके स्वाभिमान के साथ समाज में जगह दी जानी चाहिए। हो सकता है आज जो पराई अमानत है, लेकिन क्या पता कल पूरी दुनिया के सामने आप फर्ख से कहें ये मेरी बेटी है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें