शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

शनिवार, 6 अक्तूबर 2012

हिन्दी
में विश्व भाषा बनने की तमाम संभावनाएं मौजूद

जोहान्सबर्ग - विश्व हिंदी सम्मेलन से लौटकर डॉ. स्वाति तिवारी

हिन्दी को विश्व भाषा बनाने का सपना लिए 1975 में नागपुर से शुरू हुई संकल्प यात्रा दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में अपने नवें पायदान पर पहुंची। दक्षिण अफ्रीका की राजधानी और महात्मा गांधी के सत्याग्रह की कर्मस्थली ऐतिहासिक नगर जोहान्सबर्ग के भव्य सैंडटन कन्वेशन सेंटर गत 22, 23 और 24 सितंबर तीन दिनों के लिए ग्लोबल गांधीग्राम में बदल गया था जहां विश्वभर से आए हजारों हिन्दी प्रेमियों, हिन्दी सेवी प्रतिनिधियों के समक्ष 9वां विश्व हिन्दी सम्मेलन अपनी सार्थकता सिद्ध करते हुये सम्पन्न हुआ।

समारोह विभिन्न सत्रों में संचालित हुआ। भिन्न-भिन्न विषयों पर केन्द्रित समानान्तर शैक्षणिक सत्रों में ना केवल शोधपत्रों का वाचन हुआ बल्कि विचार-विमर्श एवं खुली चर्चाओं के माध्यम से विषयों का मंथन हुआ, जिनके आधार पर यह तथ्य निकलकर आया कि स्वतंत्रता के बाद से अब तक हिन्दी का चरित्र अधिक समावेशी, लोकतांत्रिक एवं उदार हुआ है। हिन्दी केवल एक भाषा नहीं है वह भारत की सामासिक संस्कृति की प्रतिनिधि भी है। जनभाषा के उपयोग से ही लोकतंत्र में प्रगति संभव है। वैश्वीकरण के दौर में दुनियाभर में विस्तार पाती अर्थव्यवस्थाओं और बढ़ते व्यापार-व्यवसाय के रूप में उभरते हुए भारत ने भी हिन्दी के माध्यम से संभावनाओं के अनंत द्वार खोले हैं। भारत में जब भाषाई संक्रमण हुये लोकतांत्रिक मूल्य नष्ट हुए तब हिन्दी की चेतना उसके विरोध में खड़ी हुई। हमें यह याद रखना चाहिए कि हिन्दी हमारी वजह से नहीं है हम हिन्दी की वजह से है।

इस अवसर पर सम्मेलनों में दोहराए गए अनेक महत्वपूर्ण गंतव्यों को पूर्ण करने के प्रयासों का भी विश्लेषण किया गया। यह बात एकमत से स्वीकार की गई कि किसी भी भाषा की वैश्विक स्वीकृति के लिए आवश्यक है कि उसमें ज्ञान-विज्ञान के लेखन के लिये जरूरी शब्दावलियां हो। हिन्दी केवल साहित्य की भाषा मात्र रहे वह वैज्ञानिक तकनीकी शिक्षा का आधार भी बने।

सम्मेलन में मध्यप्रदेश की भागीदारी ना केवल उल्लेखनीय रही बल्कि वह अत्यन्त महत्वपूर्ण भी रही। मध्यप्रदेश के प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार के हिंदी के प्रति संकल्पित भावना और सकारात्मक दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश में स्थापित अटलबिहारी हिंदी विश्वविद्यालय, दुनिया की ऐसी पहली संस्था जहां सभी विषयों में हिंदी माध्यम से पढ़ाई होगी। इस संदर्भ में अपनी बात रखते हुये विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मोहनलाल छीपा ने अपना महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने भी हिन्दी के विकास के लिये एक व्यवस्थित योजना और लक्ष्य तय करने की बात रखी। मध्यप्रदेश के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी श्री जे.एन. कंसोटिया, कथाकार डॉ. स्वाति तिवारी ने भी हिन्दी माध्यम की शिक्षा प्रणाली को रोजगारोन्मुखी बनाने की बात की। प्रदेश के चर्चित लेखक ख्यात आलोचक श्री विजय बहादुर सिंह ने विस्तार से गांधीजी की भाषा दृष्टि पर प्रकाश डालते हुये कहा कि गांधीजी की चेतना डोर समाज से जुड़ी हुई थी। गांधीजी इस देश की आत्मा के पर्याय थे। वे राष्ट्रभाषा के लिए चिंतन करते थे। इंदौर से कथाकार सूर्यकान्त नागर, भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार रविन्द्र जैन, इटारसी की कमलेश बक्शी इत्यादि ने भी अपने विचार रखें।

सम्मेलन के समापन सत्र में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अपनी महती भूमिका निभाने वाले देश-विदेश के 38 विद्वानों को सम्मानित किया जिनमें मध्यप्रदेश के श्री बालकवि बैरागी, श्री कैलाशचन्द्र पन्त, श्री ज्ञान चतुर्वेदी एवं इंदौर विश्वविद्यालय में लम्बे समय हिन्दी की प्राध्यापक रही प्रो. वी. वाय ललिताम्बा शामिल थीं।

सम्मेलन के अंतिम सत्र में हुये कवि सम्मेलन में भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी श्री पवन जैन की कविताओं ने ना केवल मंच लूट लिया बल्कि सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधियों को अपनी कविता के दर्द से रुला दिया। उनकी कविताओं में पुलिस कर्मचारी की जो पीड़ा उभरकर आती है वह बेहद मार्मिक थी।

सम्मेलन में भाषा की अस्मिता और हिन्दी का वैश्विक संदर्भ कई प्रकार के विषय प्रवर्तनों के साथ विश्लेषित हुआ जिसमें यह तथ्य निकलकर आया कि भाषा राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान है। हिन्दी सदैव उदार और धर्मनिरपेक्ष रही है। हिन्दी के प्रसार के लिये अनुवाद बेहद जरूरी है जो हिन्दी से अन्य भाषाओं और अन्य भाषाओं से हिन्दी में किये जाने चाहिए। लोकतंत्र और मीडिया की भाषा के रूप में हिन्दी विषय पर एकमत से यह स्वीकारा गया कि मीडिया के लोकतंत्रीकरण में हिन्दी की भूमिका बढ़ी है। मीडिया का भाषा के साथ आत्मीय संबंध होता है। इस लिहाज से हिन्दी में वह सारी क्षमता है जिससे एक मजबूत लोकतंत्र की स्थापना हो। पिछले कुछ वर्षों में भारत की वैश्विक स्थिति को रेखांकित करते हुये यह बात सामने आयी कि भारत का मध्यमवर्ग यूरोप की कुल आबादी से भी बड़ा है जो शहरी ग्रामीण दोनों जगह फैला है। विश्व की अर्थव्यवस्था भारत में अपने विस्तार के लिये भारतीय सम्प्रेषण की भाषा हिन्दी का इस्तेमाल कर रही है।

इस आयोजन में श्रीमती पुनीत कौर विदेश राज्यमंत्री, भारत सरकार, दक्षिण अफ्रीका के वित्त मंत्री प्रवीण गोरधन, मॉरीशस के कला एवं संस्कृति मंत्री मुकेश्वर चुनी, मारीशस में भारत के उच्चायुक्त वीरेन्द्र गुप्ता, दक्षिण अफ्रीका के अध्यक्ष हिन्दी शिक्षा संघ मालथाई रामबली, विदेश सचिव एम. गणपति, सुप्रसिद्ध समाजसेवी इला गांधी एवं सासंद सत्यव्रत चतुर्वेदी, हिन्दी के पुरोधा श्री रत्नाकर पांडेय, चित्रा मुदगल, रविन्द्र कालिया, ममता कालिया इत्यादि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।

सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका में हिन्दी का अलख जगाने वाले पंडित नरदेव नरोत्तम वेदालंकार की प्रतिमा का अनावरण किया एवं सत्य मण्डप महात्मागांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के सहयोग से लगायी गई पुस्तक प्रदर्शनी भी महत्वपूर्ण रही, जहां हिन्दी साहित्य दर्शन, विज्ञान सूचना प्रौद्योगिकी इत्यादि की पुस्तकें प्रर्दशित की गई। स्मारिका गगनांचल का विमोचन भी किया गया।

और शामें सांस्कृतिक संध्या के रूप में लम्बे समय तक याद रहेंगी जहां पहले दिन कलाकार, लेखक, निर्देशक शेखर सेन ने ‘‘मन ना रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा ..... सन्त कबीर के जीवन पर आधारित एकल नाट्य प्रस्तुती दी। दूसरे दिन लोकनृत्य एवं भारतीय शास्त्रीय नृत्य एवं समापन की शाम कवि सम्मेलन के रूप में आयोजित की गई।

इस तरह सम्मेलन इस बात पर आश्वस्त करता है कि भारतीय अस्मिता को धारण करने वाली हिंदी भाषा ज्ञान, तकनीकी और रोजगार की क्षमता से सम्पन्न है एवं हिन्दी में विश्व भाषा बनने की तमाम संभावनाएं मौजूद हैं।

डॉ. स्वाति तिवारी

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार है,

जिन्होंने इस सम्मेलन में मध्यप्रदेश शासन के प्रतिनिधि के रूप में शिरकत की।

संपर्क - 9424011

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