शब्दों के अक्षत
विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे .विचारों कि यह नदी जाने कितने झरनों के साथ मेरे अंतर्मन में भी प्रवाहमान है जब तक है तब तक लिखना भी रोजमर्रा में शुमार है .अभिव्यक्ति का आकाश भी अनंत है इस शीर्षक चित्र कि तरह रंग है तो उगते सूरज कि लालिमा पर शब्दों के अक्षत लगाते रहिये लगाते रहिये ---------संभावनाओं के असीम आकाश पर स्वागत है आपका

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

ब्रह्मकमल









  1. गीली माटी पर बने पदचिन्ह सूख जाते हैं, मगर हिमालय की चट्टानी सतह पर नए अंकुरों का स्वागत करती है प्रकृति नभ का विस्तार सदा वैसा ही, पर धरती का श्रृंगार सदा बदला करती है प्रकृति पावस के आते ही पर्वतों के दुर्गम स्थानों मेंे सौंदर्य का नया उल्लास फटते देखा है। जून माह तक हिम आच्छादित क्षेत्र बर्फ से ढके रहते हैं। सूर्य की तपन भी बर्फ को आंशिक ही पिघला पाती है।.................लेकिन स्नेह की पतली धार की तरह मानसून की पहली झड़ी ही शेष बर्फ को पिघलाने में सहायक होती हैं। अंकुरण के इंतजार में जमीन में दबे पड़े बीज उगने लगते हैं। ये बड़ी तेजी से अपना विस्तार करते हैं.............. इतना विस्तार की वंशवृद्धि के लिए फल-फूल धारण करते हैं। बारहों महीने हिमराशी की धवलता के सौंदर्य से सजे हिमालय की गोद में 10 से 15 हजार फीट ऊंचाई तक फैले इस नैसर्गिक सौंदर्य में हरियाली की मखमली चादर बिछ जाती है। गढ़वाल हिमालय का प्राकृतिक सौंदर्य, सुरम्य दृश्यों के साथ-साथ आलौकिक दृश्यों को चार चांद लगाता हैै। हिमालय का सबसे वेज गंध वाला पुष्प ना केवल यहां उगता है बल्कि बढ़ता है, महकता भी है................. वही तो है ब्रह्मकमल .........। ब्रह्मकमल अक्सर शास्वत हिमरेखा के करीब पत्थर व चट्टानों की आड़ में खिलता है। हिमालय का यह प्राकृतिक सृजन क्रीमरंग की पंखुड़ियों में लिपटा अपेक्षाकृत बड़े आकार का पुष्प है जिसे पहाड़ों पर बेहद पवित्र और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। इसकी पंखुड़ियों को लोग अपने घरों में शुभ शगुन और श्रीवृद्धि के लिए रखते हैं। हिमालय की घाटियों में फैले सम्पूर्ण उत्तराखंड के मंदिरों में सदियों से इसे श्रद्धा और आस्था से चढ़ाया जाता है। गढवाल में नंदा अष्टमी के दिन शिवालयों और देवालयों में अनूठा पुष्प पर्व मनाया जाता है और प्रसाद में बंटता है-ब्रह्मकमल। श्रद्धा और आस्था का जब संगम होता है तो स्नेह की पावन पतली धारा से ही प्रेम का निर्झर प्रस्फूटित प्रवाहित होता है। हां़। शायद, 'आत्म' के उत्खनन के दौरान प्रेम का पुष्प भी ऐसी ही किसी आस्था और विश्वास का प्रस्फूटन ही तो होता है। जिन्दगी में प्रेम का अहसास कब और किस मोड़ पर होगा यह कहा नहीं जा सकता पर प्रेम का सच्चा अहसास मन के खंगालने पर ही मिलता है। पर कई बार शायद हम इसमें बहुत देर कर देते हैं....... मन का ऐसा मंथन निर्मल मना कमल जैसे इस उपन्यास के पात्र ही कर सकते हैं..... प्रेम का बीज मन रूपी धरती पर सबके अन्दर दबा रहता है-जैसे ब्रह्मकमल का सुप्त बीज। और ब्रह्मकमल की तरह प्रेम का पवित्र बीज भी स्नेह की पतली धारा में भीगना चाहता है। अंकुरण की चाह में दिल की जमीन में दबा सुप्त पड़ा रहता है......... बस जरूरत है यह समझने की कि प्रेम पाने की पात्रता, प्रेम देने की क्षमता से आती है और हम पाना तो चाहते हैं देने में चूक जाते हैं........... जीवन का राम, जीवन का रंग, जीवन का प्रतीक होता है प्रेम जो प्रसाद होता है मन मंदिर का। उपन्यास यथार्थ की तमाम संभावित सतहों के आर-पार स्त्री की इच्छा को टोहता है। मानव के सामाजिक यथार्थ के परे एक प्लेटोनिक प्रेम तत्व के आसपास विस्तार पाता है। आप गौर से देखेंगे तो इस उपन्यास में कोई भी पात्र प्रेम के यथार्थ से आंख नहीं चुराता बल्कि उसे कुछ अतिरिक्त निष्ठा से निभाता ही है............. कुछ इसी तरह............... हिमालय की चोटियों पर भोर होते से सांझ ढले तक जब, मंदिरों से घंटे और शंखों की आवाज आती है चट्टानों के बीच अचानक कई ब्रह्मकमल खिल उठते हैं प्रकृति के ये प्रस्फूटन होते हैं कितने पवित्र ? इतने पवित्र की आस्था और विश्वास के साथ श्रद्धा के फूल बन जाते हैं-ब्रह्मकमल। स्वाति तिवारी[ उपन्यास से ]

सोमवार, 19 अप्रैल 2010


कहानी
एक ताजा खबर
डॉ.स्वाति तिवारी

''हम बाजार में खड़े हैं, बाजार के लिए ही काम करते हैं, हमारे घर का चूल्हा हमारी स्टोरी के बिकने पर जलता है। क्या करें... भाभी जिस समाज का समूचा ढांचा ही दोहरे मानदण्डों पर टिका है वहां अपने आदर्श नहीं चलते..... आदेश रखने पड़ते हैं ताक में.... अखबार का मालिक निकाल फेंकता है आदर्शवादी पत्रकारों को.... अब आप तो सब जानती हैं .... इसी माहौल से रोज दो चार होती हैं... भैया का देखती तो है रोज संघर्ष करते हुए... वो तो इनकी सरकारी नौकरी है वरना दाल रोटी इतनी आसान नहीं... अरे आत्मा को मारना पड़ता है....'' इतनी बड़ी-बड़ी बातें करने वाले समीर भैया ने ..... क्या सचमुच आत्मा को इस हद तक मार डाला.... या केवल दोहरे मानदण्डों के चलते वे... इतने और इस कदर दिखावटी हो गये कि अपनी पत्नी की मृत्यु और बीमारी तक को भुनाने में जुटे हैं?.... मैं तय नहीं कर पा रही थी कि ये वही समीर भैया हैं जो सुनयना भाभी की आत्मा में बसते थे?
''छोड़ो भी.... तुम भी क्यों समीर के पीछे हाथ धोकर पड़ी हो.... वो जाने और उसका काम।'' पति ने मेरी बात को खारिज सी करते हुए कहा।
नहीं अमर... मेरा मन इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है... पच्चीस साल का साथ था समीर सुनयना का... पच्चीस दिन भी नहीं लगे पत्नी के दुख से बाहर आने में....सवा महीने तो दुश्मन भी दुख पालते हैं.. पत्नी थी सुनयना... उनकी। गमले में पौधा भी सुखे तो मन दुखता है... और समीर है कि दूसरी शादी कर रहा है?
''वो तो सुनयना के मरने से पहले ही कर लेता यदि उसको समझाया ना होता..तो।''
''क्या....़.?''
''हॉ ़। मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता था, पर सच यही है वो पिछले एक साल से वहां जाने लगा था..... प्रेस यूनियन के चुनाव का वास्ता देकर रोका था उसको।''
पत्नी की बीमारी और वह भी कैंसर एक सहानुभूति थी सबकी इसके साथ .. वोट भी विश्वास के कम सहानुभूति के ही ज्यादा मिले थे... लोगों ने सोचा था दुख से बाहर आने में बेचारे को मदद मिलेगी... पर हम जानते हैं ये अपनी आदतों से बाज नहीं आने वाला। जानती हो जब किमो थेरेपी चल रही थी सुनयना की.... अस्पताल छोड़ मेरे दफ्तर में बैठा रहा- ''यार अमर.. कल सी.एम. को एयरपोर्ट से सीधे अस्पताल ले आना सुनयना को देखने....। अस्पताल और परिवार पर अच्छा रुतबा रहेगा यार। और फिर प्रेस यूनियन के चुनाव पर भी दबाव पड़ेगा। सी.एम. से सीधे संबंध होने का। एक बार प्रेस यूनियन की कुर्सी हाथ में आ जाए फिर देखना उस प्रेस की नौकरी का मिजाज ही बदल दूंगा। और सबसे पहले तो उस चूतिए सम्पादक को निपटाऊंगा साल्ला........ दो कौड़ी का......। हर स्टोरी को कांट-छांट देता है.. जहां कमाने की जरा सी गुंजाइश दिखी नहीं न्यूज एडिट कर देता है... उसकी तो....।'' पूरा दिन वो इसी जुगाड़ में लगा रहा ... कि एक बार सी.एम. उसके घर या अस्पताल चले जाएं। चेले चपाटे अलग लगा रखे थे सी.एम. की अगवानी की न्यूज और बाइट कवर करने के लिए.... नम्बर एक का नाटकबाज है.... पर क्या करें़। आप समझा उसको सकते हैं जो समझना चाहे-समीर जैसों को समझाना संभव नहीं।
हाँ मेरे पास भी फोन आया था समीर का उस दिन ''भाभी आप सुनयना के पास ही रहना...।'' बड़ा बुरा लगा था उस दिन भी मुझे..... मौत के दरवाजे पर खड़ी पत्नी के साथ उसका दर्द बांटने के बजाए समीर बीमारी को भी भुनाता रहा। पत्रकार कोटे का पैसा, मेडिकल क्लेम और दया तथा सहानुभूति के नाम पर पैसा? अरे पूछो मत चंदा उगाई से उसने इतना पैसा बनाया है कि .... बस।
''पर इलाज के खर्चे?''
''वो..... वो तो सुनयना भाग्यवान थी कि वो बड़े घर की बेटी थी..... उसका इलाज तो पिता और भाई ही करवाते रहे और उसकी नौकरी भी थी। ये तो अस्पताल भी ऐसे जाता था जैसे हम जाते हैं हाल पूछने।''
..... मेरी आंखों में उठावने का दृश्य सजीव हो उठा.... मैं सुबह से ही सुनयना की 15 साल की बेटी के साथ थी.... वो मम्मी के सदमे में डिप्रेशन में जाने लगी थी.... बुखार भी आ गया था उसको। पर समीर भाई ..उठावने की तैयारी में ऐसे जुटे थे जैसे घर में जश्न हो...... शहर का सबसे बड़ा क्लब ग्राउंड.....उस पर टेन्ट...सफेद चादरें..... रामधुन के कैसेट। सुनयना का बड़ा सुनहरी फ्रेम वाला फोटो... गुलाब के हार, गुलाब के फूलों की टोकरी, मोगरे की चंदन की अगरबत्तियाँ.... काला चश्मा ....लोगों को लगातार फोन पर याद दिलाते रहे कि आज शाम चार बजे उठावना है... फोन के अलावा..... भोपाल तक राजनीति की बीबी की मौत की.... और तो और ..... सफेद कुर्ता पाजामा चार बार बदला था नहीं जमा तो खड़े दम नया खरीदा गया......... उठावने के लिए। हद तो तब हुई जब बेटे ने विद्रोह का पहला स्वर उठाया था--''पापा आप अस्थि संचयन में चलेंेगे या कुर्ता पाजामा ही बदलते रहेंगे। '' दंग रह गई थी मैं ....... बजाय खुद गिल्टी होने के वे विपिन पर झपटे थे......'' एक लगाऊंगा साले..... मुझे आंख दिखाता है..... दिखता नहीं यहां इतने लोग आने वाले हैं--मामा के साथ चला जा और रवि चाचा और संजय मामा और विनय मौसा को हरिद्वार रवाना करवा दे-- मैं यहीं हूं। मुझे तब लगा था पत्नी की मृत्यु से टूटे हुए हैं समीर भाई....। अग्निदहन के बाद अस्थि बटोरने के लिए हिम्मत नहीं है उनमें अपनी पत्नी की राख में तब्दील देह को वे देखना नहीं चाहते शायद। कैसी रेशम सी नाजुक थी सुनयना... कितनी यादें होंगी समीर के मन में उस रेशमी देह की दिवानगी की। पर अस्थिकलश को जब विपिन
लेकर आया तो सब फूट-फूट कर रो पड़े थे पर समीर .....? उसने तो देखा तक नहीं......क्या रिश्ते इतने कमजोर होते हैं या कि संवेदना की खबरें बेचाने वाले समीर के अंदर की संवेदनाएं ही मर गई थीं....। टोका था मैंने ''समीर भाई क्या हो गया है आपको...... अखबार की न्यूज नहीं थी सुनयना जो छपने तक मायने रखती थी आपके लिए। ये आपकी जीवनसंगिनी की अस्थियां हैं ये आपका स्पर्श चाहती हैं अभी धरती पर ही हैं.... गंगाजल में विलय के बाद आपसे नाता टूटेगा... आप पत्थर हो गए हो क्या? आपके उन थोथे आदर्शों का क्या हुआ जिनमें बौद्धिकता, भावनात्मक प्रतिबद्धता, संवेदनात्मक बातें होती थीं।''
समीर मुस्कुराया था उस वक्त.... फिर मेरे कान में बुदबुदाया था भाभी सच ये है कि चार साल तक सुनयना की बीमारी से मैं फ्रस्टेट हो गया था और एक ऐसी बीमारी
जिसका आउटपुट कुछ नहीं था मैं जल्दी से जल्दी मुक्त होना चाहता हूं इस सब से।
मैं उठावने के बाद घर आ गयी थी। मानसिक तौर पर पर टूट गई थी।........
पर ये खबर तो और भी हजम नहीं हो रही थी.......। मुझे जब शाम को अमर ने
पूछा चल रही हो समीर की पार्टी में...... कोर्ट में शादी कर ली है उसने...... मैंने घूर कर अमर को देखा था...... मैं मर गई तो शायद अमर भी..... पर पूछ नहीं पायी....... क्योंकि सच कड़वा ही हो सकता था या फिर झूठा। और दोनों ही मुझे बर्दाश्त नहीं।.... अमर ने फिर पूछा था ''चलोगी.......।''
नहीं। अभी अभी तो सुनयना की तेंरहवीं में उसके मायके गौरनी जिमने गई थी मैं......... उसके नाम का सुहागन भोज जिमने के बाद इतनी जल्दी नया रिश्ता मैं नहीं जोड़ सकती...... तुम जाओ तुम्हारी मर्जी हो तो...... फिर बचपन का दोस्त है समीर।''
मुझे लगा सुनयना का क्या? सच तो यह है कि आज फैक्ट और फिक्शन में कोई फर्क नहीं रह गया है-- हम एक खबर की तरह हो गए हैं........ जहां सुनयना की मृत्यु एक बासी खबर .......... ताजा खबर ये है कि...............समीर ने जिससे शादी की वो सुनयना की ही खास......सहकर्मी जो तलाकशुदा थी और .........अक्सर सुनयना के पति के मीडिया में होने से उसकी किस्मत पर जलती थी। और हां......समाचार मीडिया में टैबलायडाइजेशन की प्रवृत्ति अब पुरानी हो गई है नयी बात यह है कि समाचार जगत में सार्वजनिक मसलों से बचकर नितान्त व्यक्तिगत जीवन, उसकी पीड़ा, संबंधों की जायजता और नाजायजता की कहानियां बनाकर बेचने वाला निहायत ही असंवेदनशील पत्रकार समीर अब अपनी नयी बीबी के दफ्तर में उसकी दादागीरी के लिए उसका स्टेट्स हो गया है।
पर मेरी संवेदना का क्या करूं मेरे अंदर पुरानी खबर से लड़ती रही समीर की नयी खबर।
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डॉ. स्वाति तिवारी

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

डर कहानी




सुहाग पड़वा का व्रत था। सुबह पूजा करके परिवार के बुजुर्ग नाते-रिश्तेदारों के यहाँ चरणस्पर्श करने की परम्परा है। मैं उसी परम्परा का निर्वाह करते हुए आशीर्वादलेने अपने पिताजी के अभिन्न मित्र के घर पहॅुंची। दरअसल इस शहर में वे मेरे मायके की भूमिका निभाते हैं। मैं उन्हें काका-काकी कहती हॅूं। वे पिताजी की ही उम्र के हैं-यॅूं भरापूरा परिवार है पर बेटे नौकरयों पर ओर बेटियाँ अपने घर। बस बंगलेनुमा उस पुश्तैनी मकान में वे पति-पत्नी अकेले छूट गए हैं। इतने साल साथ रहते हुए पत्नी के प्रति एक नीरसता पसर जाती है। पत्नी के मन में अबभी उनके प्रति अपने कर्तव्यों का लगाव बरकरार है। या हो सकता है वह उन सबकी आदी हो गई हैं। पति के प्रति वे गजब की सजग हैं। रोटी-पानी, पूजा-पाठ, दवा-सेवा, कपड़े-लत्ते सब जरूरत वे ही पूरी करतीं और बिल्कुल वैसे ही जैसे हमेशा करती रहती थीं। शायद उनके चेहरे पर बढ़ापे की रेखाऍं इसीलिए कम दिखती हों क्योंकि उनके ऊपर दायित्व है।
घर जमींदारी के वक्त का है। भरा हुआ हे। रजवाड़े के जमाने का भारी भरकम फर्नीचर है, ढेर सारा सामान ऐसा है जो अब उपयोग में नहीं आता पर कबाड़े में बेचा भी नहीं जाता। बच्चों ने नए जमाने के हिसाब से उन्हें बहुत-सा सामान नया ओर दिलवा रखा है और इन सबके चलते उनकी स्थिति इनके उपयोग से ज्यादा इनकी पहरेदारी की हो गई है। जब भी बहुऍं आतीं वे काकी से कहतीं कि अनावश्यक सामान की छॅटनी कर देते हैं और कबाड़ी को दे देते हैं पर छाँटते वक्त कभी किसी सामान को काका रोक लेते, ''अरे, इतनी मजबूत लकड़ी का बना पलंग है, शीशम पर नक्काशी का पलंग आज बनवाने जाओ भाव पता चल जाएगा।'' कभी किसी सामान को काकी रोक लेतीं, ''यह बड़ा सन्दूक मेरी सास के हाथ है कितने साल इसमें मेरी शादी का जोड़ा रखा था।'' सन्दूक फिर जगह पर जम जाता। ''कैरम बोर्ड'' वह भी पुराना भारी भरकम, गर्मियांे में बच्चे आ जाऍं तो कुछ तो चाहिए। और ऐसी जाने कितनी यादें, जरूरतें, मूल्य, महत्व, भविष्य की योजनाऍं सामने दिखतीं और सारा सामान अपनी जगह फिर बना लेता सिवाय अखबार की रद्दी और तेल घी के खाली कनस्तरों के। और काका-काकी उस घर मालिक कम चौकीदार की तरह हो गए हैं।
छोड़िए उनके घर और मूल्यावान वस्तुओं के चक्कर में कहीं मैं उनके बारे में बतना ही न भूल जाऊँ। तो सुहाग पड़वा के चरण स्पर्श के बाद देखा हमेशा चाँदी की तश्तरी में आने वाला नाश्ता अबकी बार चीनी मिट्टी के प्लेट में आया था। थोड़ा आश्चर्य हुआ फिर काकी के गले पर नजर गई तो वहाँ सोने की मोहनमाला की जगह केवल काली पोत का मंगलसूत्र झूल रहा था। ध्यान चला ही गया सो पूछे बिना नहीं रह पाई, ''काकी तुम्हारे गले की माला ?''
वे कान में खुसर-पुसर करती आवाज में बोली, ''तेरे काका सठिया गए हैं। कहते हैं इत्ता सोना लाद कर घूमेगी तो लूटपाट में मारी जाओगी। सब अन्दर लॉकर में रखवा दिया है। अब इस उमर में ये नया डर ?'' हाँ...आजकल जमाना बहुत खराब है।'' मैंने भी हाँ मं हाँ मिलाते हुए कहा। पर सामने बैठे काका ने चुप रहने का इशारा करते हुए मुझे अपने पास बुूला लिया। काकी चाय बनाने चली गई तो उन्होंने धीरे से पलंग की गद्दी के नीचे रखे अखबार को निकाला, मुख पृष्ठ पर शहर में हुई लूट और हत्या की खबर थी। 'वृद्ध दम्पत्ति की हत्या'' शीर्षक से छपी यह खबर मैंने भी पढ़ी थी। अखबार चार दिन पुराना था। डर जाएगी। रात भर बैठी रहेगी। जब इसे मैंने पढ़ा तो मैं अन्दर तक दहल गयी। बुढ़ापे में भी सुरक्षा नहीं है। घर में कामवाली बाई आती है-पता नहीं बाहर जाकर किसी को क्या बता दे। कब किसकी नीयत बदल जाए।''
काकी चाय के कप लेकर लौटीं तब तक अखबार गायब। पूछने लगीं, 'क्यार बता रहे थे तेते काका ?' मैंने बात बदलते हुए पूछा, ''आप दोनों भैया-भाभी के पास क्यों नहींं चले जाते ?''
मेरी बात उकने अन्तरमन को चोट कर गई। अचानक मुझे लगा उनके चेहरे पर झुर्रियाँ इन दिनों कुछ ज्यादा ही बए़ गई हैं। वे भरभराती आवाज में बोले, ''पप्ू का फोन रोज ही आता है और नन्दू का रविार को। पर दोनों हालचाल पूछ लेते हैं। ज्यादा हुआ तो कहेंगे आप यहाँ आ जाइए। डॉक्टर को दिखा दॅूंगा। आई को थोड़ी राहत मिल जाएगी।''
''तो चले जाइए ना आप दोनोंं।'' मैंने आग्रह किया।
वे एकाएक उठकर खड़े हो गए। फिर दरवाजे से बाहर देखते हुए बोले- आ जाइए कहता वह पर आकर ले नहीं जाता कि बाबा आपको और आई को लेने आया हॅूं। आपको चलना ही पड़ेगा। आग्रह और मान-सम्मान भी तो कोई चीज है। इसका क्या ? इसको तो बहू साल में दो नई साड़ी भेजती है- बस हो जाती है निहाल बेटे-बहू पर। अगर वह सचमुच चाहता है मॉ-बाप को और हमारी इत्ती चिन्ता है तो यहाँ चौकीदारी के लिए क्यों पटक रखा है।
घर को यॅूं पटक कर खँडहर तो नहीं होने दे सकते न। परदादा के हाथ के पूजे देवी-देवता बैठे हैं देवल में-अब उनका दिया-बाती भी तो करना जरूरी है। बच्चे नौकरी करें कि इनकी जिद पर यहीं बैठे रहें। काकी बात सँभालती है। शहर आजकल बिगड़ता जा रहा है तू भी अकेली मत आया-जाया कर। काकी ने मेरे अकेले घूमने पर चिन्ता जाहिर की। वे उठकर सब्जी छौंकने लगी। तो मैंने फिर पूछा, ''आजकल राघव नहीं आता क्या ?'' तेवर चढ़ाते हुए काकी बोलने लगी, ''तेरे काका को मेरा फुर्सत से रहना रास नहीं आता न तो भगा दिया उसको भी।''
''क्यों ?''
-उन्हीं से पूछ। कहते हैं उसके खाने से पेट में जलन होती है। और रोज ही कुछ न कुछ माँगता, ये बक्सा खाली पउ़ा है दे दो। कभी कहेगा पत्नी रोटी बनाने में टाइम लगाती है तो आपके पास दो गैस कनेक्शन हैं एक दे दो। बस वह सारा समय यह देखता है कि हमारे पास क्या चीजें डबल-डबल हैं या फालतू हैं। उसकी नीयत हमेशा सामान बटोरने में लगी रहती। नहीं दो तो पटका-पटकी, चिड़चिड़ाता रहता। दो फुलके इनके, दो मेरे यॅूं ही डाल सकती है ये। बैठी-बैठी क्या करती हैं सारा दिन। काका कुर्ता उतर कमीज पहनने लगे फिर तैयार होकर छड़ी हाथ में ले बोले, ''तू बैठी है तब तक मैं जरा नक्कड़ तक हो आता हॅूं बैंक से पेंशन लेनी है।''
पर वे पाँच मिनट में ही लौट आए। मैंने आश्चर्य से पूछा, ''काका वापस क्यों लौट आए ? कुछ भूल गए क्या ?''
''नहीं रे । पेंशन लेकर आटो से आना खतरनाक है। कया पता आटो वाला ध्यान रखे कि बैंक से लौट रहा हॅूं।''
''चलो मेरी गाड़ी से मैं चलती हॅूं साथ। '' मैंने उनकी मदद करनी चाही।
''नहीं, फिर यहाँ यह अकेली रह जाएगी। कल जब कौशल्या आएगी बर्तन मॉजने, तब पास वाले बब्बू के स्कूटर पर जाकर ले आऊँगा।''
मैं स्तब्ध थी। तो क्या काका-काकी भावनात्मक तनाव के शिकर हो रहे हैं। उनमें असुरक्षा की भावना इस हद तक बढ़ रही ंहै कि वे भरी दोपहर में चौराहे की बैंक तक जाने और महज आधा घण्टा पत्नी को घर में अकेला छोड़ने में डरने लगे। ये वहीं काका हैं जो टूर पर जाते थे तो हफ्ता पूरा करके लौटते थे। काकी सँभालती रहती थी घर। मुझे लगा काकी के प्रति उनकी नीरसता दिखावा है दरअसल वे काकी से बेहद प्यार करते हैं । और उन्हें भय मुक्त रखना चाहते हैं। शायद अकेले इतने बड़े शहर से निपटने से वे कतराने लगे हैं। सम्भवतः वृद्धावस्था में उनका अचेतन मन, चेतन मन की तुलना में अधिक क्रियाशील हो गया है। और उन्हें अन्दर ही अन्दर दुर्बलता और भय घेरने लगा है।
पास वाले बंगले में मिस्टर पाण्डे रहते रहे हैं पर वे अब खुद के घर में शिफ्ट करने वाले हैं। अब काका को चिन्ता यह है कि पता नहीं पड़ोस में कौन आएगा ?
एक हफ्ते बाद फिर चली गई काका के घर। काका ने अब अपनी आराम कुर्सी बरामदे में इस एंगल से लगा ली कि पउ़ोस का बंगला उनहें दिखता रहे- ''काका आज आप यहाँ बैठे हैं।''
''हाँ रे-खाली पड़ा मकान भुतहा होता है कब कोई घुस जाए घर में और रात-बिरात छत से इधर आ जाए तो। अच्छा बता कोई सिक्योरिटी गार्उ है तेरी नजर में ?''
''क्यों ?''
''रात के लिए लगवा लेता हॅूं जब तक पड़ोस भी खाली है। फिर देखेंे अगर अच्छा पड़ोसी आ गया तो भगा देंगे ।''
''मैं देखती हॅूं'' कहकर काकी के पास उनके कमरे में चली गई। मुझे देख वे मुस्कुराने लगीं। ''हाँ तेरी आवाज आ गई थी मुझे।''
''हाँ काका से बात कर रही थी। '' मैं भी काकी के सााि मेािी तोड़ने लगी।
''आजकल तेरे काका की नौकरी लग गई ।'' वे बच्चों की तरह भोलेपन से बोलीं।
''क्या ?''
''देखा नहीं चौकीदारी कर रहे हैं पड़ोसी की प्रापर्टी की। वहीं बैठे रहते हैं ऊँघते हुए।''...घर लौटते सारे रास्ते मन खिन्न था। काका असुरक्षा के भाव से इस तरह घिरने लगे हैं शायद वे मनोविक्षेप की ओर बढ़़ रहे हैं। मनोविक्षेप तीन प्रकार के रोगों के कारण होता है और चिन्ता, अनावश्यक चिन्ता यह एक रोग में बदल जाती है, वे चिन्ता के चलते संवेगात्मक द्वन्द्व और तनाव की दशा से गुजर रहे हैं, यही है अकेलेपन की आहट...

डा0 स्वाति तिवारी

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010



झूठ की बुनियाद
डॉ. स्वाति तिवारी
महानगर कीतेज रफ्तार वाली आपाधापी-भरी जिन्दगी में तो चारों तरफ शोर ही शोर है । शोर भी इतना कि लोगों के कान या तो कम सुनने लगे हैं या कहें ,ऊंचा सुनने के अभ्यस्त हो गए हैं । इसी ध्वनि प्रदूषण,वायु प्रदूषण से बचने के लिए हमने घर शहर से बाहर बनवाया था,पर शहर का विस्तार दावानल की तरह फैलता हुआ अब हमारे घर के आस-पास भी पहुंच चुका है। पहले थोडी दूरी पर एक बड़ा कोचिंग इंस्टीट्यूट खुल गया, फिर एसटीडी, पीसीओ, फोटो कॉपी सेंटर, कैंटीन, मेस, ऑटोस्टैंड को आकार लेते क्या देर लगती है। फिर घर तेजी से बनते गए, फिर मंदिर, बाजार सब आते गए और हम एक वेल डेवलप्ड कॉलोनी में रहेते हैं!
डेवलपमेंट शहर का हो, कॉलोनी का हो, तो खुद का भी होना चाहिए।बस पासवाला प्लॉट ले, घर से जुड़ता हुआ एक गल्स होस्टल बनवा डाला और वह भी चल निकला। पचास सीट का होस्टल मेरी उपलब्धि है। रामनवमी पर कॉलोनी वालों ने सामनेवाले मंदिर में रामायण का पाठ रखा तो सबसे ज्यादाचंदा मैंने ही दिया। रामजी की कृपा से होस्टल अच्छा चल रहा है, यही सोचकर। पर मुझे क्या पता था कि यह सिरदर्द का कारण बनेगा। रामायण शुरू होने से पहले और बाद में वहां जोर-जोर से लाउडस्पीकर पर फिल्मी गाने बजते जो मेरे साथ-साथ परीक्षा की तैयारी कर रही मेरी छात्राओं के लिए भी परेशानी का सबब थे। सभी लड़कियाँ झल्लाती रहतीं, पर वह एक लड़की चुपचाप पढ़ती रहती जैसे शोर उसे सुनाई ही नहीं देता हो। बस पढ़ना या सोना, दो ही काम थे। बहुतकम बोलती थी वह। पिछले एक साल से वह लड़की यहां मेरे होस्टल में रह रही है। सामने वाली कोचिंग इंस्टीट्यूट मं वह पीएमटी की तैयारी कर रही है,ड्रापर है। उसकी तन्मयता देखकर मुझे लगता है, वह इस अटेंप्ट में निकल जाएगी। बडा प्यारा सा चेहरा है। सांवला-सलोना रंग,तीखे नाक-नक्श और बड़ी-बड़ी हिरणी जैसी आँखें। हल्की सी उदास मुस्कान के साथ चुपचाप अपनी पढ़ाई में लगी रहती है। एक उसकी सहेली खुशबू है,उसी की रूममेट-चटपटी चंचल लड़की। बात -बात पर खिलखिलाना औरे हमेशा चिल्लाना,ऊधम,मस्ती से भरी हुई। विपरीत स्वभाव के बावजूद दोनों बड़े प्यार से रहतीं।
सभी लड़कियों के घर से फोन आते हैं। माता-पिता,भाई-बहन मिलने भी आते, पर मैने गौर किया कि उसके लिए फोन कम ही आता। आता भी तो मामा या कभी-कभी माँ का फोने आता। उसकी फीस या खर्चा-पानी देने भी मामा ही आते थे। लड़कियाँ अक्सर खाने की टेबल पर अचार-मसाले,स्वाद या किसी नई डिश के वक्त अपने-अपने घर की तारीफ और तौर तरीकों की चर्चा करतीं। कभी खाने के स्वाद को लेकर तो कभी धर की सजावट,पापा-मम्मी के झगड़े,भाई-बहनों के किस्से सब एक दूसरे से बढ़ा-चढ़ाकर बखाने जाते और मैं देखती कि बात कोई भी हो घूम-फिरकर अपने-अपने पापा-मम्मी की पसंद या स्वभाव पर केन्द्रित हो खत्म हो जाती। पर मैने देखा, वह उन सब बातों में कम ही बोलती। हाँ, सबकी बातें सुनती अवश्य रहती ।
लड़कियों की चर्चा में मुझे मजा आता था और मैं अपने खोए हुए छात्र-जीवन में पहुंच जाती। मुझे अपने वे दिन याद आ जाते जब मैं भी इंदौर के जीडीसी होस्टल में रहती थी। मैं, आभा और शिखा हम तीनों ही रूममेट थे। इन लड़कियों में मुझे अपना बचपन याद आता। किशोरावस्था से थोड़ी ऊपर यह उम्र सबसे सुन्दर होती है और तमाम उम्र यही याद आती है, इसीलिए मैं इन लड़कियों को उनके हिस्से की
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ऊधम-मस्ती करने देती। अनुशासन यदि आटे में नमक जितना टूट भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है । अरे वार्डन हू कोई जेलर तो नहीं। बस मेरे इसी स्वभाव से लड़कियाँ मेरी अच्छी दोस्त बन जाती। मुझे भी लगता, क्या रखा है जीवन में, ये खुशहाल क्षण हैं जो देखते ही ओझल हो जाएंगें और ये सब भी फंस जाएंगी दुनियादारी के जंजाल में-वही घर-गृहस्थी,ससुराल के कायदे-कानून,बच्चों की रेलमपेल,पढ़ाई-लिखाई । तब होस्टल की यही यादें हमेशा सुकून देंगी तो फिर क्यूं ना इन्हें इनकी खुशियों के साथ जीने दिया जाए। ये तो लड़कियां हैं और लड़कियां पहले ही होम सिकनेस का शिकार होती हैं। ज्यादा कठोरता या बंधन उन्हें सुधारने की बजाय विद्रोही बना देता है और फिर क्या करेंगी, ज्यादा से ज्यादा एक आध बार फिल्म देखने की जिद्द। इतना मैं स्वयं साथ जाकर करवा देती हू। बस बच्चे भी खुश और होस्टल का अनुशासन स्वयवेम ही बना रहता।
सारी लड़कियां इस वक्त मेहनत कर रही होती हैं। अगले महीने उनकी परीक्षा होनी है। इम्तिहान के समय होस्टल का माहौल ही अलग हो जाता था।
गर्मियों की हल्की सी शुरूआत। मार्च-अप्रैल का महीना। इन दिनों मैं बच्चों की डाइट पर पूरे वर्ष से कुछ ज्यादा ही खर्च करती हू। यूं तो एक्जाम्स फोबिया की शिकार हो लड़कियां खाना पीना कम कर देती हैं फिर प्रॉपर डाइट न मिलने से वीकनेस आ जाती है जो पढ़ने नहीं देती। यही सोचकर खाने में दूध -दही का एक आइटम बढ़ा देती हूँ। तीन बजे की चाय के साथ गरम नाश्ता या फल बंटवा देती हूं। कुछ बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता बजट पर,उन्हीं का पैसा है थोडा सा खर्च बढ़ाकर होस्टल बजट कम भी हो जाए तो कौन सा मेरे एकाउन्ट में कमी आ जानी है। होस्टल है,बच्चों के पैसों से ही चलता है। उनका पैसा उन्हीं पर खर्च होने से होस्टल की प्रतिष्ठा बनी है। प्रदेश का बेहतरीन होस्टल माना जाता है। तभी तो हमारे यहां दूर दराज तक से लडकिया आती। मुम्बई से लेकर हरिद्वार,मसूरी,नैनीताल और सिक्किम तक की लड़कियाँ यहाँ हैं। दरअसल एक तो शहर में पीएमटी,पीईटी की बेहतरीन कोचिंग है,दूसरे यहां की होम साइंस फैकल्टी और एमएचएससी की डिग्री दुनियाभर में विशेष मान्यता रखती है। उसी क्रम में नेहा भी नैनीताल से यहाँ इतनी दूर आई हुई है। उसकी चुप्पी मुझे बडी रहस्यमय लगती है। उसकी जिंदगी में जरूर कुछ ऐसा है जो सामान्य नहीं है।
परीक्षा की तैयारी के लिए लगने वाली पीएल में बहुत सी लड़कियां यहीं रूकी रहती हैं। घरों में या तो जगह की कमी होती है या फिर पढ़ाई का वैसा एटमॉसफियर नहीं बन पाता, जैसा होस्टलों में रहता है। नेहा भी नहीं गई। उसकी परीक्षा तो मई में होनी थी। उसने सेन्टर भी यहीं लिया था। परीक्षा देकर वह चली गई अपने मामा के घर। इस बीच अप्रेल में एक बार उसको बुखार था और तभी उसके मामा का फोन आया था। मेरे यह बताने पर कि उसे तेज बुखार है अगले दिन उसकी मम्मी मामा के साथ आई थी दो दिन वे रूकी थीं होस्टल के गेस्ट हाउस में। हमारे होस्टल से थोड़ी दूर कैंपस में ही चार कमरों में होस्टल के गेस्ट हाउस की सुविधा भी है, और दो दिन तक अभिभावक संस्था के गेस्ट होते हैं। उन्हें लंच व डिनर होस्टल मेस से भेजा जाता है। इस दौरान दो-तीन बार उसने मेरी मुलाकात हुई, वही चेहरा बिल्कुल नेहा जैसा,बस समय और प्रौढ़-उम्र के निशान समेटता हुआ। देखते ही अंदाज हो जाता कि वे अपनी युवावस्था में बिल्कुल नेहा सी लगती होंगी। अब भी वे युवा ही हैं,लगभग पैंतीस-छत्तीस वर्ष की।
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समय को जाते कहां देर लगती है। नेहा के बाद यहाँ पांच बैच और निकल गए और जाने कितनी लड़कियाँ आई भी ओर चली भी गई पर नेहा की चुप्पी कभी कभी मन में खटकती रहती।
इस बार मई-जून मं एक वर्कशॉप में मुझे नैनीताल जाना था। बार बार याद करती रही पर याद नहीं आया कि कौन सी लड़की नैनीताल की थी। पहले सोचा, रजिस्टर में ढूंढ लू फिर लगा इतने सालों में तो लडकी घर बार वाली हो गई होगी। कौन इतनी माथा पच्ची करें। बात आई गई हो गई ।
नैनीताल में राष्ट्रीय स्तर पर एक वर्कशॉप रखी गई थी, सभी प्रोफेसर कम वार्डन्स की। वर्कशॉप में अपने अपने अनुभव बताने थे वार्डनशिप के और छात्रावास सुविधाओं को बेहतरीन बनाने पर विचार विमर्श भी था। मैं सपरिवार गई इस वर्कशाप में, क्योंकि इस बहाने गर्मी में हिल स्टेशन की यात्रा का मोह भी था। हिल स्टेशन चाहे मसूरी हो,शिमला हो या नैनीताल सुबह व शाम बेहद खूबसूरत लगती है। सुबह कोहरे का धुंधलका और कंपकंपी थी। वही जल्दी उतर आई अंधियारी शाम और जगमगाते लट्टुओं की रोशनी। लगता है, सारा पहाड़ दीपावली की दीपमालाएं संजोए हुए है। बस, ऐसी ही एक शाम उतर रही थी। नैनीताल के उस तिब्बती मार्केट पर मैं भी शॉल और ऊनी कपड़ों की खरीदारी में लगी थी। एक आसमानी-सा शॉल मुझे बहुत देर से लुभा रहा था। मैने ज्यों ही उसे देखने-परखने के इरादे से हाथ बढ़ाकर उठाना चाहा, तभी एक हाथ और उसे उठाने को बढ़ा था। सहज था--एक साथ दो लोग एक वस्तु उठाएं तो वे एक-दूसरे पर भी नजर डालेंगे ही। मैंने उस नाजुक से हाथ वाली स्त्री को देखा तो नजरें एकदम पहचान गई। अरे नेहा की म्ममी...
मैं लगभग चीख उठी, जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई हो, पर वे इस अप्रत्याशित आक्रमण से सकपका उठीं। उन्होंने बात संभालते हुए कहा, ‘‘नेहा की मम्मी नहीं, नेहा की बुआ ! ’’ अब मेरी बारी थी सकपकाने की। मुझे अच्छी तरह याद है, वे नेहा की मम्मी के रूप में ही मिली थीं। मुझे होस्टल में।
मैंने स्वयं को सहज बनाते हुए कहा, ‘‘ ओह, सॉरी।’’
‘‘नहीं, नहीं, कोई बात नहीं। दरअसल हम बुआ-भतीजी के चेहरे-मोहरे इतने मिलते हैं कि कन्फ्यूज होना स्वाभाविक है पर आपने मुझे कैसे पहचाना ?’’ वे बनावटी अंदाज में बोली।
‘‘जी ! पहले मैं समझी नेहा है, पर फिर आपके लंबे बाल देखकर लगा आप उसकी मम्मी होंगी। पर मम्मी न सही, बुआ सही, कुछ तो लगती हैं आप नेहा की और मैं ज्यादा गलत नहीं थी एमआई राइट? ’’ अब बात संभलने की बारी मेरी थी।
वे सकुचाते हुए प्रश्न करती हैं, ‘‘ पर आप... आपसे मेरा परिचय कभी हुआ नहीं?’’
‘‘जी हां, आप सच कह रही हैं, पर नेहा मेरी स्टूडेंट रही है और उसका वह सांवला रूप मैं भूल नहीं पाई ।’’
‘‘अच्छा...अच्छा...’’
‘‘कैसी है नेहा?’’ मैंने जिज्ञासा जताई। दरअसल यह मेरे स्वभाव में शामिल है।
वे पहले खामोश रही फिर, धीरे से बोली, नेहा नहीं रही।’’
‘‘कब ? कैसे?
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। अपने पर्स से अपना विजिटिंग कार्ड निकालकर पकड़ा दिया और जाते हुए बोली ‘‘कल दोपहर में आप लंच हमारे घर पर लीजिए। ’’
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‘‘नहीं, नहीं... ऐसे ही समय मिला तो आऊंगी।’’
‘‘अगर आप आएंगी तो नेहा की आत्मा को अच्छा लगेगा... आप उसकी इतनी प्यारी टीचर हैं, क्या इतना भी हक नहीं बनता मेरा।’’
‘‘जी अच्छा, तब तो जरूर आऊंगी।’’
वे हाथ पकड़े उस आसमानी शॉल को आगे बढ़ाते हुए बोलीं, ‘‘ अगर आप बुरा न माने तो यह शॉल मैं खरीद लूं ।’’
मैं नेहा की खबरके बाद यूं भी खरीददारी के मूड में नहीं थी। मैंने हां-हां कर दी।
अगले दिन हमारे होटल में उनका फोन आया, ‘‘ आप आ रही हैं न ?
मैने ‘ हॉ ’ कर दी।
ठीक बारह बजे उनकी गांड़ी मुझे लेने आ गई। मैं उनके बंगले के बाहर ‘नेह गृह ’ की नेमप्लेट पर अटक गई। बड़ा भारी आलीशान बंगला था। लंबा-चौड़ा लॉन गार्डन, जहां अलसेशियन की भौं-भौं ने स्वागत किया।
वे दरवाजे पर ही मेरा इंतजार कर रही थीं--‘‘आइए।’’
मैंने घर में प्रवेश किया। उनके पति दफ्तर जाने की तैयारी कर रहे थे। वहीं खेलती छोटी-सी बच्ची, चेहरा वही नेहा-सा ! वे मेरी नजरों का प्रश्न पढ़ चुकी थीं।
‘‘ये मेरी छोटी स्नेहा।’’
उनके पति ने दफ्तर की फाईलें उठाते हुए उन्हें टोका, ‘‘ छोटी नहीं, हमारी इकलौती बेटी स्नेहा।’’
उन्होंने बात संभाली, ‘‘अभी तो छोटी ही है।’’
श्री सिंह (उनके पति) मुझसे क्षमा मांगते हुए दफ्तर चले गए। मैने महसूस किया कि पति के जाने के बाद ही वे सहज हो पाई। उसके पहले एक आवरण-सा उनके व्यक्तित्व पर चढ़ा हुआ था। अब घर में हम दोनों ही थे। उन्होंने डाइनिंग टेबल पर खाना लगाते हुए धीमे-से स्वर में कहा, ‘‘ मुझे माफ करिएगा मैडम।’’
मैंने चौकते हुए कहा, ‘‘किसलिए ?
‘‘जी ! मैं नेहा की बुआ नहीं, मां हूँ। पर मेरे पति नहीं जानते यह राज और इसलिए कल मैं आपसे इस तरह... ’’
‘‘ कोई बात नहीं, मैं समझ गई थी कि कोई वजह होगी, वरना..’’
‘‘क्या हुआ था नेहा को ? मैं उत्सुक थी उस व्यथा को जानने के लिए। दरअसल छात्रावास अधीक्षिका के रोल ने मेरे मातृत्व को विस्तृत कर दिया था। मुझे लगता था कि मैं एक मां की तरह हर छात्रा के सुख-दुःख समझने लगी थी। अपने बच्चों को उच्च शिक्षा लेते, अच्छे पदों पर पदस्थ होते या अच्छा घर-वर मिल जाने पर जो खुशी एक मां को होती है वही खुशी मुझे अपनी छात्राओं की जानकारी के बाद मिलती थी। हल्का-पतला घर-वर की बात तो कई लड़कियों की पता लगती थी। किसी-किसी के माता-पिता की मृत्यु,बीमारी वगेरह की खबरें यहां-वहां से मिलती रहती थीं। कुछ देर मैं दुखी भी होती उस खबर से, पर इस बार छात्रा की ही मृत्यु के समाचार से अवगत हुई थी, मेरे लिए यह बेहद पीड़ा-भरी खबर थी।
‘‘नेहा ने मेडिकल कॉलेज के फोर्थ ईयर में पहुंचकर अचनाक आत्महत्या कर ली।’
भारी कंठ से रुलाई रोकते हुए मैं सिर्फ ‘क्यों’ बोल पाई।
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दरअसल यह एक लंबी कहानी है। नेहा और हिमांशु मेरे पति की संतान हैं। उनका एक एक्सीडेंट में निधन हो गया था, तब हम यूएस में थे। नेहा तब पांच साल की थी और हिमांशु गोद में ही था।
मैं सब प्रॉपर्टी बेचकर भैया के पास आ गई थी, भैया दिल्ली में हैं। उन्होंने कहा, पैसा फिक्स में रख दो और तुम दूसरी शादी कर लो।’’ तब मेरी उम्र भी मात्र 25 साल थी। भैया ने अखबारों में विज्ञापन देखना शुरू किया । भाभी की संतान नहीं थी, इसलिए हिमांशु को उन्होंने गोद ले लिया, पर नेहा लड़की थी, रह गई और एक दिन भैया ने उसे भी दिल्ली के बोर्डिंग में डाल दिया। दरअसल उन्होंने एक विधुर का विज्ञापन पढ़ा था। दो बेटों का पिता, उम्र बत्तीस वर्ष थी, करोड़ों का बिजनेस था, पर शर्त थी निःसंतान, विधवा या परित्यक्ता ही चाहिए थी। भैया ने समझाया,चुपचाप शादी कर लो, तुम्हारा सारा पैसा सुरक्षित है। नेहा का भविष्य बन ही जाएगा। आगे उसे मेडिकल में डाल देंगे। डॉक्टर लड़की का शादी-ब्याह भी किसी डाक्टर से हो जाएगा। तब मैंने सोचा था भैया की बात मान लूं, बाद में पति को समझा दूंगी और बेटी को पास बुला लूंगी,पर पति का रुतबा देख हिम्मत ही नहीं हुई थी। नेहा पिता के प्यार के किए तरसती थी और मां खुलकर प्यार नहीं करती थी। उपेक्षा की शिकार नेहा घुट-घुटकर निराशा के दौर में उलझ अंततः आत्महत्या कर बैठी। यह छोटी बिटिया... इसका तभी एक माह पहले जन्म हुआ था। मैने चुपचाप इसकी फोटो उसे भेजी थी। उसने मेरे पास आकर रहने और अपनी बहन से मिलने की इच्छा बार-बार जाहिर की। वह भी बच्ची ही थी। हर बच्चा चाहता है। वह कई बार फोन पर कहती थी, आपने अपने घर के लिए मुझेे बेघर कर दिया, मम्मी! क्या एक बार भी आप मुझे अपने पास नहीं रख सकतीं। पर मैंने सोचा, कुछ दिनों में पति से बात कर लूंगी, पर बहुत देर हो गई, तब तक नेहा ने मुझे सजा दे डाली...
 
‘‘ आपके पति कैसे स्वभाव के हैं?’’
‘‘ अच्छे हैं, बहुत अच्छे हैं, पर झूठ उन्हें पंसद नहीं और मेरी शादी झूठ की बुनियाद पर ही रखी गई है। क्या कहती उन्हें। वे बस इतना जानते हैं कि नेहा भैया की बेटी थी, अब नहीं रहीं।’’
मैं भारी मन लिए उठने लगी।
क्या रखा है ऐसे शादी-ब्याह के सुख में। हम किस समाज में जी रहे हैं।एक दो बच्चों का पिता अपने दूसरे विवाह में निःसंतान स्त्री चाहता है और एक स्त्री अपने दूसरे विवाह को अपराध की नजर से देखती है, क्योंकि वह झूठ की बुनियाद पर खड़ा किया गया है। पति पाने के लिए अपने बच्चे को छोड़ने पर मजबूर है। क्या यह संभव नहीं कि एक पुरूष एक स्त्री को उसके वैधव्य के साथ अपनाता है तो उसकी संतान को भी स्वीकारे, जबकि वह स्त्री उसके बच्चों की मां बन रही है!
मैं उनसे विदा लेती हूं-- ‘‘ अच्छा मैं चलूं।’’ मेरी आंखें और आवाज दोनों नम और भारी हैं।
वे वही आसमानी शॉल मेरे कंधे पर डालती हैं-- ‘‘ प्लीज यह छोटी-सी भेंट है मेरी तरफ सेे, ना मत कहिएगा। नेहा को आसमानी रंग बहुत प्रिय था।
स्वाति तिवारी
ईएन-1/9 चार इमली भोपाल
संपर्क 9424011334,9425056505

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

स्मृतियाँ

जैये नीले समंदर पर
उठती-गिरती उज्जवल लहरें
जैसे सुख के चमकीलें दिन
और दुख की स्याह रातें

कितना अजीब है प्रकृति का क्रम
एक रंग में से उभरता दूसरा रंग
जीवन भी रंग बदलता है, हर पल,हर कदम
पर तुम अकेले कहाँ, जीवनसाथी है तुम्हारे संग,

मज़ा है तब जब हो आपसी विश्वास
और प्यार की मिठास
किए जाओं कर्म,मन रखना साफ

ईश्वर भी तलाशता है सुन्दर घरौंदे
जहाँ दें वह आशीष की सौगात
दुरियाँ हो चाहे कितनी ही
महसूस होते हो आसपास

क्योंकि मन में बसी है प्यारी याद।

समय
बंद मुठ्ठी ये फिसल जाता है समय
और हम सोचते रहते हैं
कि वक्त हमारे साथ है
पर, जब खोलते हैं मुठ्ठी तो लगता है
कि समय हमारे पास बहुत कम है
लेकिन तभी पता चलता है कि
समय हमारी मुठ्ठी ये
रेत की तरह फिसल गया
और हम देखते ही रह गए।
हम सोच रहे थे
कि सफलता के शिखर पर पहुँच जाएंगे
परंतु, फिर समय की कमी के कारण
हम पीछे ही रह गए
और जमाना देखता ही रह गया।
हम सोच रहे थे, कि
सफलता कैसे प्राप्त की जाए?
फिर सोचा,
क्यों न समय को सहेजकर रखा जाए
परंतु, तभी याद आया,
क्या समय हमारे पास है
जब यह सोचा, तो याद आया
कि सचमुच समय हमारी मुठ्ठी से
रेत की तरह फिसल गया
और हम पीछे ही रह गए।
पर, जब आँख खुली तो मैंने पाया,
कि वह एक स्वप्न है,
समय मेरे साथ है
और मैं समय के साथ हूँ
और सफलता मुझे
समय की सीढ़ियों पर बुला रही है
अब मैंने पाया
कि समय मेरी मुठ्ठी में है।
-- रूचि बागड़देव --

रविवार, 11 अप्रैल 2010

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

कहानी मुट्ठी में बंद चाकलेट



स्वाति तिवारी

अभी ठीक से नींद खुली भी नहीं थी कि किसी ने फोन घनघना दिया। एक बार तो मन में आया, बजने दूं अपने आप बंद हो जाएगा। सुबह-सुबह कौन नींद खराब करे। सर्द रात में सुबह-सुबह ही तो अच्छी लगती है नींद, जब बिस्तर गरमा जाता है रातभर में। एक बार बाहर निकले कि गई गरमाहट।
‘‘लो तुम्हारा फोन है...’’ माथे पर होठों का स्पर्श करते हुए मलय ने जगाया था।
इतनी सुबह...उ... ऽऽऽ...कौन है?
तुम ही देख लो।’’
‘‘हैलो, जन्मदिन मुबारक हो!’’
‘‘थैक्यू, थैक्यू! मैं हांफने लगी बगैर दौड़े ही।
‘‘मैं आ रहा हूँ दिल्ली, आज का दिन तुम्हारे साथ बिताने...।’’ उधर से आई आवाज में पिछले पचासवां जन्मदिन है, याद है बचपन में एक बार मैं तुम्हारा जन्मदिन भूल गया था।’’
‘‘हां तो ?’’
‘‘तब तुम्हारा गुस्सा...तौबा-तौबा!
‘‘ ऽऽऽ...।’’
‘‘ तब तुमने वादा लिया था कि तुम्हारा जन्मदिन कम से कम पचास साल तक नहीं भूलूं... तो कैसे भूलता यह पचासवा जन्मदिन?
‘‘ओह! तुम भी ना ...।’’
मैने फोन रख दिया। अच्छा हुआ मलय अखबार और मेरे लिए चाय का प्याला लेने चले गए थे, वरना झूठ बोलना मुश्किल होता।
उठकर बैठी तो पंलग के पास ड्रेसिंग टेबल पर एक गिफ्ट पैक और गुलाब के फूल रखे थे और जनाब चाय लिए खड़े थे।
‘‘हैप्पी बर्थ, डे...।’’
’’मैं तो भूल ही गई थी, वो तो अभी...’’ बोलते-बोलते चुप हो गई थी मैं।
‘‘किसका फोन था?’’
‘‘मेरे ऑफिस... वो नया कम्प्यूटर इंजीनियर आया था न संजीव, उसी का।’’
‘‘ओह! तो जनाब हमसे पहले बाजी मारना चाहते थे बर्थ-डे विश करके...क्यूं?
‘‘आप भी न मलय...बाज नहीं आएंगे, अपनी मसखरी से ! ’’
‘‘पर बर्थ-डे बेबी... हमने तो रात में बारह बजे ही बर्थ-डे विश कर दिया था...हमसे नहीं जीत सकता कोई !’’ मलय मजाक ही मजाक में अपनी बात कह गए थे।
‘‘क्या मलय आप भी...वो मुझसे दस साल तो छोटा होगा उम्र में, मेरे बेटे से थोड़-सा बड़ा दिखता है बस... ’’ पर थैंक्स संजीव, तुम्हारा नाम याद आ गया वक्त पर, वरना मलय को बताती कि फोन शेखर का था... तो उनका मूड सारा दिन ऑफ रहता । वो आ रहा है यह बता देती तो शायद पूरे हफ्ते या शायद पूरे महीने ही...
मलय से झूठ बोलना इतना आसान नहीं और झूठ बोलना भी कोन चाहता है? पर कभी-कभी अनचाही परिस्थितियां आदमी को झूठ बोलने पर मजबूर कर देती हैं। घर की शांति बनी रहे और जिसके साथ जीवनभर का रिश्ता है उसे दुःख भी न पहुंचे, यही
सोचकर झूठ बोलना पड़ा। मलय और शेखर मेरे जीवन के दो किनारे बन कर रह गए और मैं दोनों के बीच नदी की तरह बहती रही जो किसी भी किनारे को छोड़े तो उसे स्वयं सिमटना होगा। अपने अस्तित्व को मिटाकर, क्या नदी कभी किसी एक किनारे में सिमट कर नदी रह पाई है? बचपन का एक साथी सपनों का हमसफर ही बन पाया था कि दूसरा जीवनभर के लिए हमसफर बन गया। एक ने सात फेरे में सात जन्मों के वचन ले लिए तो दूसरा छूटते हाथ से केवल एक वादा ही कर पाया था जब भी मिलेंगे अच्छे दोस्त बनकर ही मिलेंगे। जीवन के हर सुख-दुःख में अदृश्य साथ खड़े रहेंगे। वादे के साथ तमाम लक्ष्मण रेखाएं दोनों ने अपने बीच खींच ली थीं, और उम्र के पचास सालों में कभी नहीं लांघा और लांघने से मिलना ही क्या था? एक-दूसरे की नजरों में हमेशा सम्मान देखने की इच्छा से ज्यादा शायद कुछ नहीं चाहा था हमने। मर्यादा की लक्ष्मण रेखाएं अदृश्य होती हैं। दूसरे कहां देख पाते हैं! रिश्तों की मर्यादा को देखने से ज्यादा जरूरी होता है समझना! पर उसके लिए अंतर्दृष्टि चाहिए। उसने कितनी सच्चाई से, खुलेपन से मलय को बताया था कि शेखर उसका बचपन का दोस्त है।
पर मलय ने शेखर को वह सम्मान नहीं दिया जिससे वह पारिवारिक रिश्तों में जगह पा सके और तब से शेखर से बात होती भी तो वह बताने से टाल जाती। एक औपचारिकता भर गया था दिल से जुड़ा यह रिश्ता।
और फिर पिछले सालों से तो लखनऊ छोड़ ही दिया था उसने, मलय का प्रमोशन दिल्ली होते ही । शेखर से बस कभी-कभार ही फोन पर बात होती। आठसाल पहले लखनऊ छोड़ते वक्त मुलाकात हुई थी कॉफी हाऊस में। शेखर ने विदाई भोज का निमंत्रण भी दिया था पर अगली बार कहकर टाल दिया था। जानती थी मलय नहीं जाएंगे और मैं अकेले कहीं नहीं जाती लंच या डिनर पर।
इन आठ सालों में कितना कुछ था जो बैठकर बांटना था शेखर के साथ। बाबूजी के जाने के बाद एक वही तो है जिससे कई मसलों पर राय-मशवरा करने से राहत मिलती है मन को। मलय की और बच्चों की शिकायतें, मलय की अच्छाइयां, भाई-बहनों से बढ़ती दूरी, चचेरे, ममेरे रिश्ते वह बचपन से सभी विषयों पर शेखर से बात करती रही है। मलय मेरे जीवन, मेरे घर हर क्षेत्र से जुड़े हैं, कोई भी बात मलय को बताने से वे प्रभावित होते हैं और मैं नहीं चाहती कि मलय परेशान हों। शेखर को बताने से वह अभिन्न मित्र होने के बावजूद एक द्रष्टा की तरह उस बात को देखता और राय देता है। एक अंतर्दृष्टि की तरह जरूरी होता है जीवन में ऐसा द्रष्टा । नाश्ता और खाना बनाते-बनाते मैं अनमनी-सी ही रही। एक उथल-पुथल थी मन में।
हजारों किलोमीटर का लंबा सफर तय करके कोई मुझे पचासवें जन्मदिन पर बधाई देने आ रहा है... इस ख्याल ने उम्र को सोलहवें साल-सा खुशनुमा बना दिया। पर मन ही मन कुढ़ती रही, क्योंकि पचास साल की उम्र में भी मैं एक पढ़ी-लिखी कामकाजी आधुनिक स्त्री सामाजिकता के दायरों में भी वही परंपरागत डरपोक भारतीय नारी जो पति की पसंद-नापसंद से आगे कोई सोच नहीं रखती। भीरू स्त्री जो घर को शक के दायरों से बचाने और अपने सतित्व को सिद्ध करने से ज्यादा कोई हैसियत नहीं रखती। पच्चीस साल की बेटी, बीस साल के जवान बेटे की मां जो परिवार के हर सदस्य के जन्मदिन पर उनके दोस्तों को दावत देती रही पर अपनी उम्र के पचासवें वर्ष तक अपनी पसंद के एक व्यक्ति को चाय पर भी घर आमंत्रित नहीं कर सकी। मलय से बात करूं या न करूं, इसी ऊहापोह में अनिर्णय के साथ दफ्तर जा बैठी। चार बजे तक शेखर को नहीं बता पाई कि मैं कहां मिलूंगी।
‘‘छह बजे मेरा राजधानी एक्सप्रेस का टिकट है वापसी का। क्या तुम मिलना नहीं चाहती अनु?’’
‘‘ नहीं शेखर ऐसा नहीं हैं थोड़ा सिरदर्द है। तुम्हें तो पता है इन दिनों मुझे माइग्रेन रहता है। हाँ, ऐसा करो चाणक्यपुरी से आगे मेरा दफ्तर ग्रीन पार्क में है, मैं बीस मिनट बाद वहीं नीचे वाली कैंटीन के बाहर मिलती हूं। तुम्हें भी बीस मिनट आने में लगेंगे... ओ.के.।’’
जैसे ही नीचे उतरी सामने से आते शेखर को देख लगा जैसे बांहे फैलाएं चला आ रहा है। मन हुआ कि मैं भी दोड़कर उसके पास पहुंच जाऊं। पास पहुंची तो उसने रजनीगंधा की एक कली देते हुए कहा, ‘‘ हैप्पी बर्थ-डे अनु।’’
और मैंने अपनी हथेली में दबाई अपने नातिन की चाकलेट सामने कर दी। मुंह मीठा करो शेखर।’’
‘‘ वाह! तो तुम अब भी चाकलेट खाती हो।’’
‘‘हां, नानी हूं न गुड़िया की। उसके साथ खानी पड़ती है।’’
‘‘कैसी हो तुम?’’
‘‘ मैं ठीक ही हूं।’’
‘‘थोड़ी दुबली हो गई हो।’’
‘‘तुम भी तो दुबले लग रहे हो । ’’
‘‘चलो छोड़ो।’’
‘‘जानती हो मैं आज पूरा दिन तुम्हारे साथ बिताना चाहता था... पर तुमने लिफ्ट ही नही दी।’’
‘‘कुछ कहूं।’’
‘‘ नहीं, कुछ मत कहो तुमसे मिलने का वादा था मेरा, पूरा हुआ। मेरी टैक्सी खड़ी है सामने, हो सके तो वहां तक साथ चलो।’’
‘‘चलती हूं वहीं से मुझे मेट्रो पकड़नी है।’’
‘‘तुम आज ऑफिस से छुट्टी नहीं ले सकती थी?’’
‘‘सब कुछ जानते-समझते हो, तब यह प्रश्न क्यों?
शेखर ने अपनी मुस्कराहट से खुद ही मेरे उत्तर की जगह भर दी थी।
‘‘ फुटपाथ पर चलते हुए तुम्हें डर तो नहीं लगेगा अनुु ?’’ शेखर ने बचपन की तरह छेड़ा था।
‘‘ तुम साथ हो न किसी से डर नहीं लगेगा।’’
कह तो दिया पर मन ही मन डर रही थी, कहीं मलय मेट्रो स्टेशन के सामने गाड़ी लेकर आ गए तो।
शेखर ने पूछा, ‘‘चलें।’’
‘‘हां।’’
मेरे दफ्तर से मेट्रो स्टेशन ज्यादा दूर नहीं है।
थोड़ा-सा ही चलना था, मैं शेखर से बात करते हुए चलती रही। बातें बेमानी थी मात्र औपचारिक सूचनाओं जैसी, लेकिन साथ चलने का अहसास एकदम अलग था। लगा इन चंद पलों में शेखर के साथ पूरा दिन गुजार देने का अहसास है। साथ चलते वे चंद कदम कितनी लंबी दूरी तय कर रहे थे। बचपन से अब तक! शायद हमारे मन कदम-दर-कदम साथ चलते रहे।

‘‘ मैं तुम्हारे लिए रजनीगंधा की एक सौ एक कलियां लाना चाहता था पर केवल एक ही ला पाया।’’ शेखर के इन शब्दों में वेदना थी या कसक या शायद दोनों का मिला-जुला भाव था।
‘‘ नहीं शेखर! एक सौ एक कलियां हो या केवल एक, हैं तो दोनों भावनाओंकी प्रतीक ही न ? फिर एक कली तों आसानी से मेरे पर्स में मेरे बालों कहीं रखकर घर तक ले जाई जा सकती है। अच्छा हुआ, एक ही लाए, ज्यादा लाते तो कहां रखती। शुभकामनाएं यहां-वहां तो नहीं पटक सकते न और इस एक कली में तुम्हारी सारी शुभकामनाएं हैं।’’
‘ मेरे लिए यह रजनीगंधा की एक तुड़ी-मुड़ी कली नहीं फूलों की बहार है शेखर।’ कहना तो यही चाहती थी पर कहा नहीं।
‘‘ शेखर! तुम्हें लंच, डिनर तो दूर एक कप कॉपी भी ऑफर नहीं कर पाई।’’
‘‘ कोई फर्क नहीं पड़ता, यह चाकलेट है ना।’’ शेखर ने उस चाकलेट को अपनी जेब में रखा।
‘‘ जानती हो, यह चाकलेट नहीं, हमारे रिश्ते की मिठास है। इससे मीठा कुछ भी नहीं।’’
हाथ हिलाते हुए शेखर ने विदा ली।
मेट्रो से घर पहुंचने तक रजनीगंधा की कली हथेली पर महकती रही, जिसकी महक अगले पचास साल और जीने कीर इच्छा जगा गई।
स्वाति तिवारी
ईएन-1/9 चार इमली भोपाल

संपर्क 9424011334,9425056505


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कहानी



अचार
स्वाति तिवारी


मई की तेज धूप को देखकर याद आया कि चने की दल को धूप दिखाना है । ऑगन की धूप में पुरानी चादर बिछाकर स्टोर रूप में चले की दाल की कोठी निकालने गयी तो अचार का मर्तबान (बरनी) दिखाई दे गयी । दाल को धूप में फैलाकर पलटी तो अचार का ख्याल आया, लगे हाथ अचार को भी देख लूं । बर्नी पर कुछ नमक छिटक आया था उजाले में लाकर देखा तो यह दो साल पुराना अचार था । अम्मा कहती है - ‘पुराना अचार अचार नहीं औषधि हो जाता है - जब जी मचलाए, भूख ना लगे, स्वाद उतर जाए तो थोड़ा सा पुराना अचार चाट लो और चीर को चुस लो, सारा अजीर्ण खत्म ।‘ बात-बात में आजकल मुझे अम्मा के फंडे याद आ जाते हैं । शायद आजकल मैं बिलकुल अम्मा जैसी होती जा रही हूँ । उम्र का एक दौर ऐसा भी आता है जब हम ‘हम‘ नहीं रहते अपने माता या पिता की तरह लगने लगते हैं, वैसा ही सोचने लगते हैं । छोटी थी तो मैं हमेशा कहती थी ‘अम्मा मैं तुम्हारी तरह नहीं बनूँगी । सारा दिन बेवजह के कामों में खटती रहती हो ।‘ पर चने की दाल पर हाथ फेरते हुए मुझे अपने ही ख्याल पर हंसी आ गयी । अचार को भी परात में फैलाकर धूप में रख आयी । सोचा, इस बार अचार नहीं डालूंगी । घर में दो ही तो प्राणी बचे हैं, पति और मैं । जब तक बच्चे थे तो घर में हर तरह के अचार-मुरब्बे उठ जाते थे, पर बच्चे बाहर चले गए और हम दोनों को ही हाई ब्लड प्रेशर है । रही कसर डॉक्टर ने इनके सामने बोल कर पूरी कर दी है कि ‘भाभीजी जरा अचार-पापड़ भी कम ही खाना आपका ब्लड प्रेशर भाई साहब से ज्यादा है ।‘ बस तभी से हमारे ये लकीर के फकीर थाली में तो दूर, टेबल पर भी अचार नहीं निकालने देते । कहते हैं ‘टेबल पर रखा कि तुम थोड़ा सा के चक्कर में ले ही लोगी ।‘ और बस अब घर में अचार-पापड़ की खपत ही समझो बन्द हो गयी है । गाहे-बगाहे मेहमानों को सर्व करने या ट्रेन के टिफिन में अचार की वेल्यू बनी हुई है । हॉ हमारा माली जरुर एक दो दिन में अचार की फरमाईश कर लेता है, दे देती हूँ पता नहीं सुबह से आता है साग-सब्जी हो ना हो सोचकर ।
धूप में सूखते अचार को देखकर पति महोदय ने टोका ‘अब अगर अचार भी कपड़ों की तरह धूप में सुखाना पड़ता है तो मेडम डालना ही क्यों‘ ? ‘अरे दो साल पुराना अचार है
दवाई की तरह हो गया है । फिर आपको जो बोर-भाजी (सूखे बेह और सूखी मैथी की भाजी) की दाल पसन्द है ना, उसमें उबलती दाल में सूखा आम का अचार डालती हूँ तभी तो बोर-भाजी का स्वाद उठकर आता है ।‘
खोने की थाली में भरवाँ करेले थे । भरवाँ करेला इनकी खास पसन्द है ।
‘वाह ! क्या करेला बना है ? फाईव स्टार वाला पाँच हजार रुपये में भी ऐसे करेले की सब्जी सर्व नहीं कर सकता ।‘ इन्होंने एक करेला और थाली में डाला । कूटी तिल्ली खोपरे के सूखे मसाले में अचार का तेल डालकर करेले भरे हैं, तभी तो कड़वाहट कम हो गयी है ।‘ मैंने उत्साही होकर बताया ।
‘तो आजकल अचार यूँ नहीं तो यूँ जा रहा है पेट में क्यों ? तभी तो तुम्हारा बी.पी. घटता नही ।
‘एक चम्मच तेल यूँ भी डलता ही करेले में ।‘ मैंने सफाई दी ।
खाने से निपट कर मैंने अचार की दूसरी बरनी देखी । एकदम ताजा जैसा का वैसा ही था, सो थोड़ा सा हिलाकर वापस रख दिया, इस बार अचार नहीं डालूंगी सोचकर ।
पन्द्रह दिनों के बाद ही एक बारिश हो गयी थी । एक दिन सब्जी मण्डी गयी तो पूरे मार्केट में सब्जी से ज्यादा अचार की केरी दिखाई दी । मैं लूँ न लूं की पेशोपेश में पड़ी और फिर बगैर लिए ही घर आ गई ।
उस रात सपने में मुझे पिताजी दिखे । मकड़ी का जाला झाडू में लपेट कर निकालते हुए । याद आया ऐसे ही एक बार एक बड़ा सा जाला छत पर पँखे के पास लटक रहा था और मकड़ी लगातार अपने हाथ-पैर चला रही थी । पिताजी ने मकड़ी दिखाते हुए कहा था ‘तुम्हारी माँ भी मकड़ी जैसी है सारा दिन इस गृहस्थी के जाल में हाथ-पैर चलाती उलझी रहती है ।‘ मेरी नींद खुल गयी थी । मैं खुश थी आज बरसों बाद बाबूजी यूँ दिखे, वरना हम सब चाहते थे कि वे दिखें पर कभी किसी को सपने में भी नहीं दिखे थे । मैं उठकर बैठ गयी ।
बाबूजी के जाने के बाद पाँच सालों से घर यूँ ही बन्द पड़ा है । माँ छोटी बहन के पास है । एक पल को लगा कि बाबूजी की आत्मा शायद अपनी गृहस्थी की उपेक्षा की तरफ हमारा ध्यानाकर्षण कर रही है कि देखो यहाँ कभी बगिया में फूल खिलते थे, मंदिर में दिया जलता था, तरह-तरह के पकवान बनते थे, अचार और मुरब्बे डलते थे । धूप में सुखते-

कूटते मसालों की सुगन्ध होती थी और तुम्हारी माँ मकड़ी की तरह इन महीन जालों में उलझी रहती थी । धूप में तप कर अन्दर आती तो चेहरा लाल हो जाता था । प्याज काटती तो आँखें धुली-धुली स्वच्छ लगती थी । मसाले कूटते उसके हाथों की नसें जैसे तानपूरे के तार की तरह झंकृत होती दिखती थी । इन सब से उसे दूर कर तुमने उसके चेहरे के रंग, उसके हावभाव, उसकी आँखों का पानी सब सुखा दिया है । मकड़ी को उसके जाले में ही हाथ-पैर चलाना आता है यह कहते हुए । मुझे याद आया बाबूजी जाला बनाती मकड़ी को कभी नहीं मारते थे । कहते थे ‘जाला जब सूखा हो जाए, मकड़ी निकल जाए तब हटाना चाहिए ।
तब समझ में नहीं आता था कि इसका क्या अर्थ है, पर आज स्वतः समझ में आ गया । घर संसार सबका स्वप्न है, लक्ष्य होता है जीने का, उसे पूरा करने देना चाहिए या तो पहले ही सफाई रखो कि जाले बने ही ना, नहीं तो पूरा होने के बाद सूखने दो तब हटाना । जाने क्यूँ लगा कि पिताजी चाहते हैं हम माँ की इच्छा अनुसार कुछ दिन बन्द घर को फिर चालू करें, माँ में प्राणों का संचार करने के लिए । मैंने और छोटी ने आठ दस दिन का प्रोग्राम बनाया माँ के साथ घर जाने का । पिताजी की बात (सपनो वाली) किसी से नहीं की । इस बात को सबने अपने-अपने ढंग से सोचा किसी ने कहा पता नहीं एकदम क्या सूझी । ‘प्रापर्टी का मामला होगा बँटवारे के लिए माँ को यहाँ लायी हैं । कुछ हाथ लग जाए शायद इसीलिए घर खोला होगा वगैरह-वगैरह‘ .......................
पाँच सालों में घर ‘घर‘ बचा ही नहीं था । एक बन्द मकान था, जिसमें मकड़ी के अलावा चूहे, छछून्दर, सबने घर बना लिए थे । सब कुछ वैसा ही जमा था, अपने बेजान शरीर के साथ, बेरौनक सा ।
छोटी तो जैसे रोने ही लगी थी ‘क्या ये हमारा ही घर है ।‘ तो कहाँ गए वे दिन ----?‘ मैं बोलने की स्थिति में ही नहीं थी और माँ को तो काका के घर ही छोड़ आयी थी जानबूझ कर कि पहले जाले हटाकर अन्दर प्रवेश की जगह तो बना दूँ । पता नहीं माँ अपनी उजड़ी गृहस्थी को देख जीवन से जुड़ेगी या टूटेगी ?
यह हमारा ही घर था, कभी एक मंजिला, बाहर लॉन, चारों तरफ फूलों के पौधे, पीछे किचन गार्डन, बरामदे में एक बड़ा सा झूला पालकी वाला, दरवाजे पर बंधनवार बनाती लटकती चमेली । दरख्तों के बीच यह इमारत एक छोटी हवेली लगती थी ।

‘आदमी ना रहने की वजह से एकदम विरान लगती है नई जगह मेडम‘ ड्रायवर अनवर की बात से मेरी तन्द्रा भंग हुई । मैंने कहा लो अब विराना दूर करते हैं ।

मैंने दरवाजे पर लगी कालवेल दबाई थोड़ा जाम हो रहा था स्वीच । एक बार फिर दबाई ‘घण्टी ने एक नन्हे पंछी जैसी आवाज निकाली टिन टिन टिन .......... मैंने एक बार फिर दबाई, एक बार फिर ‘शाँट सर्किट हो जायगा मेडम‘ अनवर ने टोका ।
‘जानते हो अनवर जब तक बाबूजी दरवाजा नहीं खोलते थे मैं लगातार बजाती थी बेल ।‘ यादों के बादल बेमौसम, घुमड़ आते हैं और मन को गीला कर जाते हैं ।
अनवर ने हमारी मदद की मैं, छोटी, काकी की महरी, चौकीदार और एक लेबर हम सब ने पाँच साल से बन्द घर को पाँच घण्टे में इस लायक तो कर लिया कि अन्दर बैठा जा सके ।
बिजली और पानी का शुल्क माँ एक साथ चौकीदार को भेज रही थी सो मुश्किल नहीं हुई दोनों ने थोड़ी सी जाम मशीनरी को चालू करते ही हमारे लिए हथियार का काम किया । वाशिंग मशीन, फ्रीज सब के तार अनवर ने बदल दिए, फ्यूज बल्ब बदले गए, बिस्तर की पेटी से नए परदे, नया कार्पेट, नयी चादरें सब निकल आए । छोटी ने धोबी का गठ्ठर बाँधा, कल देंगे सब । गैस कनेक्शन लगाया, आश्चर्य हुआ पाँच साल से बन्द घर की टंकी भरी हुई थी । काकी ने घर से दूध लाकर उफना दिया, फिर बनी चाय और तब शाम को अनवर माँ को गाड़ी में बिठा लाया, शाम का दिया बत्ती हुआ । बन्द घर की सीलनवाली गन्ध को धूपबत्ती ने कुछ कम किया । फिर हम लाईट जलती छोड़, पँखे चलाकर, घर की खिड़कियाँ खोल, रात के खाने और सोने के लिए काका के घर आ गए । अगले दिन लंच के बाद घर मिशन फिर चालू हुआ । पिताजी की डायरी से किरानेवाले, दूधवाले, प्रेसवाले सबके नम्बर मिले । मोबाइल था ही सो घर बैठे सब आ गया । शाम का खाना हमने यहीं बनाया । अनवर कहीं गया था, लौटा तो उसके लिए सब्जी कम थी । माँ ने कहा ‘रुक कुछ बना देती हूँ ।‘
‘नहीं-नहीं आप तो अचार दे दो ।‘
‘अचार ..............।‘
माँ पलट आयीं । मैं समझ गयी थी ‘अचार‘ माँ की यादों का अनमोल रत्न है वे

जरुर दुखी हो गयी हैं । छोटी ने आकर बताया माँ लकड़ी की अलमारी खोलकर अचार की खाली बर्नियाँ देख रही हैं ।
सामनेवाली जैन की दुकान से चौकीदार ने रेडीमेड अचार ला दिया था छोटी के कहने पर ।
रात हम सब अपने ही घर में सोए । बाबूजी वाले कमरे में मैं, छोटी, माँ और काकी ।

अनवर ने छत पर पलंग रख लिया । चौकीदार भी वहीं सोता है । सुबह चाय बनी, पौधों में पानी डला । माँ ने पूजा की, मरती मुरझाती तुलसी के पत्तों में भी जान आयी । काकी ने नल की टपकन के पास ही गमला रख दिया था । आज सबका खाना यहीं बनना था काका, बुआ और हम सब का । आम का रस और पूरी । माँ ने ‘कहा पूरी मैं बनाऊंगी ।‘ छोटी ने डपटा, इत्ते लोगी की है दस मिनट में तुम्हारा घुटना टें बोल जाता है आधा पौना घण्टा खड़ी रहोगी ?‘

‘करने तो दे जब तक बनेगा बनाने दे, बाद में तू उतार देना ।‘ पर यह चमत्कार था या माँ का लौटा हुआ आत्मविश्वास, ना आटा सानते माँ का हाथ कंपकंपाया ना घुटने ने टें बोली बल्कि वह चकला बेलन, छोटे बर्तन भी खड़े-खड़े धो लाई ।
मुझे याद आया कल पिछवाड़े गई थी तो दो कबीट पड़े थे पेड़ के नीचे, उठा लाई थी । उनको फोड़ा तो आँगन के मचान पर लगा बाबूजी कबीट की चटनी कूच रहे हैं । मैंने ख्ररड़ और सीलबट्टा साफ किया, खूब गुड़ डाल कर कबीट के बीजों को कूचना शुरु किया तो लगा बाबूजी पास खड़े हैं बिट्टू कबीट के बीजों को पहले कूच-कूच कर फिर गुड़ के साथ सीलबट्टे पर रगड़ा लसर-लसर ऐसी खट्टी-मिठ्ठी चटनी बनती है कि खाने वाला ऊंगलियाँ चाटता रह जाए, लो चखो मेरा हाथ स्वतः ही दूसरी हथेली पर लाल चटनी रख गया और मैंने आँखें मूंद कर चटनी का स्वाद लिया । ‘बिल्कुल बाबूजी जैसी ।‘ माँ मुझे चटनी पिसते चार बार देख गई कभी ‘जरा सा जीरा डाल तेरे बाबूजी डलवाते थे‘ कह कर तो कभी काला नमक डलवा कर ओगुण नहीं करेगी कह कर । सब जैसे भूल गए थे कबीट की चटनी भी बनती है ।

अगले दिन सारे अचार के मर्तबान माँ ने महरी से धुलवाए यह कह कर तुम बहनें ले जाओ, यहाँ तो खाली पड़े हैं ।‘
मैंने बाजार से कच्चे आम मँगवाए । अचार के मसाले बाबूजी की डायरी अनुसार ही आए । केरी काटने का सरोता चमकाया गया । माँ परेशान होने लगी कौन काटेगा केरी

और कौन कूटेगा मसाले ।‘ रेडीमेड मसाला ले आती बिट्टू ? कैरियाँ काटने का जिम्मा मेरा था और मसाले कूटने का छोटी का । पुरानी सूती साड़ी बिछायी गयी धोकर कच्ची कैरियाँ माँ ने छाँटी । जैसे ही पहली कैरी सरोते पर रखी, याद आया बाबूजी ने कहा था‘ कैरी हमेशा खड़ी चीरना चाहिए, फाँक अच्छी बनती है ।‘ एक फाँक काटने में हाथ दुखा फिर लगा जैसे बचपन में बाबूजी हथ्था पकड़वा कर दबवाते थे और खच्च करके कैरी कट गयी फिर तो ट्रिक हाथ लग गयी और गीले खोपरे की तरह सब केरी कट गयी । छोटी ने सारे मसाले वैसे ही कूटे, माँ आश्चर्यचकित थी एकदम वैसी ही फाँक और हर मसाला सही अनुपात में कैसे किया रे छोरियो ? वह तेल गरम कर लायी और मसाले भूनते हुए बोली ‘मैं कहाँ डालती थी अचार, सब वो ही तो डलवाते थे दरअसाल नाम मेरा होता था लोग यह ना कहें कि व्यासजी अचार डालते हैं पर सच ये है बिट्टू मसालों का सारा अनुपात उन्हीं का होता था । ‘अचार डला, मर्तबान को भी पुर्नजीवन मिला, अलमारी में खुशबू फैली ।
कटोरी भर कर शाम की रसोई में सर्व हुआ पर किसी का ब्लडप्रेशर नहीं बढ़ा । छोटी के पति ट्रेनिंग पर गए थे लौटते में यहीं आने वाले थे दस दिन माँ और रह सकती थी घर पर । ‘मैं दस दिन बाद आती हूँ‘ इसी वादे के साथ अपने घर आ गयी । गाड़ी से उतरी तो हाथ में अचार की बर्नी देख पति ने टोका ‘फिर अचार डाल लायी वो भी इतना ?‘
मैंने गर्व और श्रृद्धा से कहा ‘ये अचार नहीं है ये बाबूजी को श्रद्धांजलि है, ये हर साल डलेगा ।‘

डा. स्वाति तिवारी
ईएन-१/९, चार इमली
भोपाल

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

हमें भी फक्र है


आह़ाजिन्दगी ,में उस्ताद अमजद अली खां ने बड़े फक्र के साथं लिखा है किअनेक राजनीतिकपार्टियों ने मध्यप्रदेश में शासन किया ,लेकिन किसी ने भी महानसंगीतज्ञ तानसेन के नाम पर संगीत अकादमी या संगीत संस्थान बनाने पर विचार नहीं किया .संभव है कि आज कि युवा पीढ़ी तानसेन के बारे में ज्यादा नहीं जानती हो , तानसेनसम्राट अकबर के नो रत्नों मेसे एक थे ,जिनका जन्म ग्वालियर में सन १६०६ में हुआ था .ग्वालियर ने देश को बेहतरीन संगीतज्ञ दिए .इस शहर कि तुलना ओस्ट्रिया ,जर्मनी या रूस जैसे देशों से क़ी जाती है.मित्रों अमजद जी ने फक्र यूँही नहीं किया है ,इस प्रदेश मे कला का गढ़ रहा है प्यारेखाँसाहेब , रहमत अलीखां,शंकर राव पंडित ,कृष्णन राव पंडित ,पर्वत सिंग ,माधव सिंग ,आमिर खां साहेब ,कुमार गंधर्व ,लता मंगेशकर ,किशोर कुमार ,उस्ताद अमजद अली खां ,कवि प्रदीप जैसे कलाकार दिए .पर विडंबना ही कहेंगे कि हम विरासतों को सहेजने में कमजोर पड़ते जा रहे है अपने प्रदेश से गहरा लगाव सभी को होता है मुझे भी है .मध्य प्रदेश कि कला और संस्कृति बहुत उर्वरा है जरुरत है सरकार के साथ साथ जनता के प्रयासों कीभी ,हम अपने प्रदेश को समझे ,पहचाने ,सहेजे ,संभाले ,और संवारे ,कला और कलाकार फक्र करने कि ही बात है अमजद जी हमें भी फक्र है तानसेन भी यहीं के थे आप भी यंही के है .ये श्रंखला
आगे भी जुडती रहे.
फक्र

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

बेहतर दुनिया के लिए के लिए बेहतर शब्द चाहिए .शब्द पंखों की तरह हलके ,मुलायम, सुनहरे ,उर्जावान हों जो हमें दुनियाकी सैर करादें.जो नीले गगन से लेकर खुरदुरी जमीं पे भी लायें तो खुरदुरे पन का एहसास न हो .क्या हम गढ़ सकते हैं एसे शब्द?

अब भाषा की दीवार नहीं

रविवार, 4 अप्रैल 2010





शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

बन्द मुट्ठी




आज सुबह से ही सामने वाला दरवाजा नहीं खुला था। अखबार बाहर ही पड़ा था। 'कहीं चाची....? नहीं, नहीं.....' मैं बुदबुदा उठती हूँ।
एक अनजानी आशंका से मन सिहर जाता है, पर मैं इस पर विश्वास करना नहीं चाहती....। मन-ही-मन मैं सोचती हूँ, 'रात को तो बच्चों को बुला रही थीं।' मन में शंका फिर जोर मारती है, 'इस उम्र में, पलक झपकते कब, क्या हो जाए? हो सकता है, रात देर से सोई हों और नींद न खुली हो?' मैं आश्वस्त होने की कोशिश करती हूँ, 'पर रोज सुबह पाँच बजे से खटर-पटर करने लगती हैं।' मन में शंका का बीज फिर प्रस्फुटित होता है, गैस पर चाय का पानी चढ़ा इन्हें आवाज देती हूँ।
''सुनो! उठो ना! सामने वाली चाची अभी तक नहीं उठी हैं।''
''ऊँहूँ, मुझे नहीं, तो चाची को तो सोने दो, बेचारी का बुढ़ापा है।'' ये फिर करवट बदल लेते हैं।
''नहीं! मुझे लगता है, कुछ गड़बड़ है।'' मैं सशंकित स्वर में बोलती हूँ।
''नहीं उठीं तो मैं क्या करूँ? जब उनके बच्चों को उनकी परवाह नहीं है, तो तुम क्यों सारे जमाने का ठेका लेती हो! सोने दो, रविवार है।'' ये रजाई खींच मुँह ढँक लेते हैं।
''आज रविवार नहीं, शनिवार है जनाब!''
मैं कुढ़-कुढ़ाकर किचन में आ चाय केतली में भरकर रख देती हूँ और अपना प्याला हाथ में ले अखबार के पन्ने डाइनिंग टेबल पर फैलाती हूँ। पर मन अखबार में नहीं लगता, रह-रहकर चाची के दरवाजे की आहट लेता है। मन है कि मानता ही नहीं और प्याला हाथ में ले उनके दरवाजे की बेल का बटन दबा देती हूँ।
बेल की सुमधुर ध्वनि सुनकर याद आता है, चाची बता रही थीं, इतनी मधुर ध्वनिवाली कॉलबेल उनके बेटे ने फॉरेन से भेजी थी। बेल बन्द होते-होते कराहती आवाज सुनाई दी तो राहत की साँस ली। थोड़ी देर बाद चाची ने दरवाजा खोला।
व ेचल नहीं पा रही थीं और तेज बुखार से तप रही थीं।
''अरे! चाची, तुम्हें तो तेज बुखार है? बताया क्यों नहीं।'' मैंने अधिकारपूर्वक उन्हें उलाहना दिया और सहारा दे, पलंग तक ले गई। वे थरथरा रही थीं। मैंने उन्हें रजाई ओढ़ा दी और केतली में से आधा गिलास चाय लाकर दी।
उनकी आँखें नम थीं और कृतज्ञता जाहिर कर रही थीं। उन्हें लिटाकर आई और क्रोसीन की टेबलेट ढूँढने लगी। दवाइयाँ यूँ तो जब-तब, जहाँ-तहाँ हाथ में आ जाती हैं, पर जरूरत हो, तब ढूँढ-ढूँढकर थक जाओ, नहीं मिलतीं। याद आया, बच्चों की पेरासिटामोल सिरप रखी है। अभी दो-तीन चम्मच वही दे देती हूँ, कुछ तो राहत मिलेगी और फिर कम से कम साइकोलाजिकल असर तो करेगी ही। फिर बुढ़ापा भी तो बचपन की पुनरावृत्ति ही है। सोचते हुए उन्हें दवाई दे आई।
घर के सुबह के काम, बच्चों का टिफिन वगैरह निपटाकर देखा बुखार कुछ कम हुआ, पर ठण्ड भी तो कड़ाके की पड़ रही है। मैंने अपने रूम का रूम-हीटर चाची के कमरे में लगा दिया। वे राहत महसूस करने लगीं।
चाची पर दया आ रही थी। बेचारी करें भी क्या? बताती हैं, चाचा के मरने के बाद ये फ्लैट खरीदा है, तभी से फ्लैट में अकेली पड़ी हैं। एक बेटा कहीं विदेश में है और बेटी कलकत्ता में। बेटा-बहू नौकरी करते हैं, उनके पास समय भी नहीं रहता। फिर वहाँ विदेश में मेरा मन लगेगा क्या? यह कहकर वे बात हमेशा खत्म कर देतीं।
कभी-कभी भावुक क्षणों में बोल जाती हैं, ''ये तो अच्छा हुआ, पति ग्रेच्युटी का रूपया और पेंशन छोड़ गए, जो आसरे के लिए पर्याप्त है।'' पर क्या जीने के लिए केवल यही चाहिए? आज रह-रहकर मुझे यही दार्शनिकता सूझ रही थी, ''क्या रखा है जीवन में। मरते-खपते बच्चे बड़े करो और अन्त में इस पीड़ा के साथ? क्या रखा है बुढ़ापे में? सूर्यास्त की तरफ बढ़ते जीवन सन्ध्या के दौर से गुजरते हुए परिवार की उपेक्षा का जहर? क्या नियति केवल आँगनभर धूप,खिड़की भर आकाश ही होती है?''
अक्सर महसूस करती हूँ, चाची अपने अकेलेपन को बाँटना चाहती हैं। कभी मेरे बच्चों के साथ, कभी ऊपरवाले फ्लैट के बच्चों के साथ। कभी महरी को बुलाकर, कभी टीवी चलाकर। पर आजकल के बच्चों के पास वक्त कहाँ है? कॉन्वेण्ट में पढ़ने वाली यह पीढ़ी कम्प्यूटर युग की जनरेशन है, इसके पास रिश्तों की मिठासवाला अहसास कहाँ है? अपनी ही नानी, दादी के साथ बैठ लें, तो बहुत; बेचारी चाची तो सामने वाले फ्लैट में रहती है। बच्चे अक्सर मुझे भी सलाह देते हैं; ''मम्मा, लाइफ में भावुकता नहीं चलती! वक्त कहाँ है इतना कि दूसरों के रोने रोते रहें?''
मैं अपना बचपन एक बड़े कुटुम्ब में बिताकर आई थी। पल-पल पर ममता की छाँव तले, सुरक्षा की छत्रछाया में प्यार और विश्वास के हाथ सिर पर रखे हुए। अम्मा, दादी, चाची, बड़ी माँ, बुआ सब रिश्तों की महक मेरे मन में अभी भी रची-बसी है। किसी ने बालों में तेल डाला होता, तो दूसरे ने पकड़ चोटी गूँथी होती थी। दादी का हलवा, चाची की खीर ऐसे व्यंजनों का स्वाद चखा था, पर मेरे बच्चे नौकरीवालों के घर के एकाकीपन में पल रहे थे।
चाची के लिए दोपहर मेंे मैं पतली खिचड़ी बनाकर दे आई थी। उनकी आँखों से लगातार पानी बह रहा था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि यह पानी है या आँसू! ''चाची, आँखों में जलन है क्या?''
मेरे प्रश्न पर वे मुस्करातीं, ''नहीं रे!''
उनके ''नहीं रे!'' में न जाने क्या था? कैसी पीड़ा का अहसास! मुझे भी रूलाई आने लगी। कहाँ चला जाए यह बुढ़ापा? क्या ऐसा कुछ उपाय नहीं कि यौवन को चिरस्थायी बनाया जा सके? कितना दर्द, कितनी तकलीफें इस बुढ़ापे में, बीमारी है, अकेलापन है। क्यों हम जन्मदिन पर बधाइयाँ और दुआएँ देते हैं, जबकि हम हर जन्मदिन के बाद बुढ़ापे के करीब होते जाते हैं।
बुढ़ापे का जो जहर पड़ोसन वृद्धा पी रही हैं, उसी की काट मैंने खोजी थी, उन्हें चाची कहना शुरू करके। फिर तो वे पूरी मल्टी में चाची के रूप में लोकप्रिय हो गईं। हम पाँच-सात घरों में बड़ा अपनापन है। दोपहर में कभी चाची के घर जा बैठते, कभी रामायण का पाठ रख लेते, कभी कुछ नया व्यंजन बनता, तो चाची का हिस्सा भी निकाल लेते। पर क्या हम पड़ोसी उस आत्मा के अकेलेपन को भर सकते हैं? हाँ, कुछ पूर्ति सम्भव है, पर रिक्तता का अहसास बड़ा घातक होता है। जो कहीं न कहीं अपने चिह्न छोड़ ही देता है। हमारी आवाजाही चाची में उत्साह भरती रहती। वे जी खोलकर सबकी आवभगत करती रहतीं, पर एकान्त क्षणों में अकेलेपन की पीड़ा उन्हें सालती ही होगी।
महरी को वे अक्सर रोकना चाहतीं। कभी घुटनों में तेल मलवाने के बहाने,तो कभी किसी और बात से। पर आठ-दस घरों में काम से बँधी वह इतनी चालाकी से निकल भागती कि उसकी चतुराई की दाद देनी पड़े।
बुखार उतरते-उतरते हफ्ता भर लग गया, पर चाची इस एक हफ्ते में बिल्कुल बदल गईं। अब वे अपने फ्लैट के बाहर कुर्सी डाले बैठी रहती हैं, हर आते-जाते को रोकती-टोकती, ''अरे भाई तुम कौन हो?'' ''किसके घर जा रहे हो!'' ''इतनी सुबह-सुबह चल दिए शर्माजी?'' ''अरी ओ प्रतिभा! कल तो तू बड़ी देर से घर लौटी? कहाँ चली गई थी, मुझे तो चिन्ता खाए जा रही थी।''
चाची अपनत्व से कहतीं, पर प्रतिभा को यह नजर रखनेवाली टोका-टोकी पसन्द नहीं। वह मुँहफट झट से कहने लगी, ''आपको चिन्ता करने की क्या जरूरत है। मैं तो अपनी माँ को बताकर गई थी।''
ऐसे कितने प्रश्न कितनों से पूछतीं और टके से जवाब पातीं। इसके बाद लोग चाची का सामना करने से कतराने लगे। मेरा दरवाजा उनके सामने पड़ता था। उनकी इस हरकत पर मुझे कभी तरस आता, तो कभी क्रोध। धीरे-धीरे बिल्डिंग में उनकी उपेक्षा होने लगी और वे एक बार फिर अकेली डिप्रेशन में रहने लगीं। उन्होंने फिर कमरे में बैठ चुपचाप टीवी देखना शुरू कर दिया। सोचती हूँ कैसी अनकही पीड़ा है? कैसे झेलती होंगी चाची इस दंश को? मैं तो परिवार की एक क्षण की उपेक्षा नहीं बर्दाश्त कर सकती, पर कल किसने देखा? बण्टी और बबलू भी मेरे प्रति ऐसा उपेक्षित व्यवहार करेंगे तो? सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
क्षितिज पर खड़ी वे, अपनत्व को तरसतीं, सूनी-रिक्त आँखें लिए, जाने क्या ढूँढती रहती! मैं अकेली कितना साथ देती? सोचती एक दिन वे अस्ताचल की ओर चली जाएँगी। सिहरन-सी होती उनके बारे में सोचकर। मैं झट से भगवान को हाथ जोड़ने लगती हूँ, ''हे भगवान! मुझे बुढ़ापे के पहले ही उठा लेना। यूँ अकेले होने का कारावास मुझे एक पल को भी नहीं चाहिए। पति के सामने उनके कन्धों पर चली जाऊँ? तो बेटे-बहुओं पर भार तो नहीं बनना पड़ेगा।''
लगभग पंद्रह दिनों बाद चाची ने फिर बिस्तर पकड़ लिया। इस बार लकवे का अटैक था। अब और मुश्किल हो गया था उनके लिए। मल्टी के लोग साथ दे रहे थे। बारी-बारी से सब ड्यूटी करते। महरी की जगह फुलटाइम बाई की व्यवस्था करवा दी। चाची अब भी चुप ही रहती थीं। उनकी झुर्रियों से सिमटकर छोटी हो गई आँखें, अब निर्विकार होकर भी किसी के इन्तजार में रहतीं। एक दिन मैंने कंघी करते वक्त पूछा, ''चाची! बेटे को खबर तो करने दो, क्या सोचेंगे वे लोग, कैसे पड़ोसी हैं? माँ की खबर तक नहीं करते।'' पर वे टाल गईं, ''क्या कर लेगा आकर। उसका पता मुझसे गुम हो गया है।''
मुझे लगा, उनका कोई बेटा-वेटा नहीं है। वे केवल हम लोगों की दया से बचने के लिए बेटे के होने की बात करती रहीं। खैर, जो भी हो, तीन बजे की चाय का प्याला ले चाची के पास पहुँचती हूँ, तो प्याला हाथ में देख उनके चेहरे की तलब बेचैन कर देती है। उन झुर्रियों में अपने बुढ़ापे का स्वरूप तलाशने लगती हूँ। चाची चाय सुड़ककर मुझे लम्बी उम्र का आशीर्वाद देती हैं। पर लम्बी उम्र किसके लिए? यही प्रश्न मुझे विचलित करने लगता है। रात को चाची की साँस उखड़ने लगी। ये डॉक्टर को बुलवा लेते हैं।
''कुछ कहा नहीं जा सकता। इनकी स्थिति गम्भीर है। आप इनके बेटे को सूचना दे दीजिए।'' डॉक्टर का यह कहना हम बिल्डिंग वालों के लिए चिन्ता का विषय था।
''बेटे के आने तक अगर कुछ हो गया तो?'' मिसेस शर्मा का प्रश्न था।
''सूचना के बाद अमेरिका से आने में भी तो समय लगेगा।'' मिस्टर शर्मा ने चिन्ता जाहिर की।
चौथे माले के पाण्डेजी ने सलाह दी, ''इनकी डायरी-वायरी में ढूँढते हैं पता। सूचना तो देनी ही होगी?'' शायद चाची सबके चेहरे के भाव समझ रही थीं। उन्होंने बुदबुदाकर कहा, ''तुम सभी मेरे बच्चे हो। मुझे विद्युत शवदाह गृह में दे देना।''
''उनकी पेटी में देखें, शायद किसी रिश्तेदार का अता-पता चल जाए।'' मेरी बेटी ने सलाह दी। पर चाबी नहीं मिली और रात तीन बजे चाची चली गई। उनके जाने के बाद तकिए के नीचे चाबी मिली। पेटी खोली, उसमें कुछ कपड़ों, कुछ रूपयों के अलावा, एलबम रखे थे। एलबम खोलकर देखे जाने लगे। एक खूबसूरत गौरवर्णी माँ अपने बच्चों के साथ तरह-तरह की मुद्रा में मिली। फिर बड़े होते बच्चों के साथ प्रौढ़ होती वही महिला पहचान में आने लगी। अरे, ये सब तो चाची के ही फोटो हैं। कुछ फोटो खुद के, कुछ पति के, कुछ बच्चों के। एक एलबम और था, उनके बेटे की शादी का, खोला तो चौथे मालेवाले पाण्डेजी उसे पहचानते थे, ''अरे, यह तो मेरी ब्रांच में ही काम करता है। आजकल ब्रांच मैनेजर है, अच्छा इसका फोन नम्बर दफ्तर से ले लेते हैं। एलबम आगे देखा गया। स्पष्ट हुआ कि वह ब्रांच मैनेजर चाची का बेटा है। कुछ खरीद के बिल भी थे पेटी में। वे उन्हीं वस्तुओं के थे, जिन्हें बताकर चाची कहा करती थीं, ''ये मेरे बेटे ने अमेरिका से भेजी है।'' सारे राज खुल गए थे। एक बन्द मुट्ठी की तरह, जो खुल गई, तो खाक की कहलाती है और बन्द थी, तो लाख की, पर चाची तुम्हारी मुट्ठी सदा बन्द रही और खुली भी, तो खाक नहीं हुई। उसमें बन्द था एक माँ का आत्मसम्मान।
''तो चाची का नालायक बेटा यहीं रहता है?'' शर्माजी बोले।
''हाँ, पर अब क्या करें? खबर दें?'' पाण्डेजी ने सवाल किया। चाची की पेटी में एक डायरी भी मिली, कुछ यादों को समेटने वाली। बेटे को सूचना दे दी गई। शववाहन भी आ गया था। बेटे के आने तक एक अन्तराल पसरा था कमरे में। जहाँ थी चाची की डैड बॉडी और हवा में तैरता एक प्रश्न....क्या चाची के बुढ़ापे को अकेलेपन से बचाया जा सकता था? डायरी के पन्नों पर फरफराता है एक उत्तर, ''बेटे, कल तुम्हारा भी आएगा बुढ़ापा। यह कड़ी यूँ ही चलती रहेगी। सूई के पीछे धागा लगा रहता है।'' पर सब स्तब्ध थे, एकदम मौन.....। परदे की सरसराहट से लगता रहा कि अब कोई आया.....शायद अब....।





डॉ. स्वाति तिवारी
ई-एन1/9, चार इमली
भोपाल (म.प्र.)
फोन-094240-11334

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

एक पिता एक सौ schoolmasters से अधिक है." -- English Proverb - अंग्रेजी कहावत

वे हमेशा हर पल हमारे साथ है .विगत पांच वर्षों से उनकी आवाज नहीं सुनी उन्हें नहीं देखा .१६ जनवरी २००४ सूर्य उतरायण हुआ था ,कहते है स्वर्ग के द्वार सीधे खुले होते है ,वे तुरंत चले गए ,पता ही नहीं चला की एसे भी कोई जाता है पर सत्य को तो स्वीकारना ही होता है । बेटी का अपने पिता से रिश्ता कोई मृत्यु भी नहीं तोड़ सकती वे हैं यंही कहीं .हाँ देखे है मेने बरगद जेसे अपने बाबूजी
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आज मेरे पिता का जन्म दिन है ,पिता का महत्व जीवन में सदा बना रहता है अभी तक कोई दिन एसा नहीं गया जब वो मुझे याद न आते हों .हर हालमें सकारात्मक बने रहने की प्रेरणा देने वाले मेरे पिता मेरे लिए एक आदर्श हैं .उनकी जिजीविषा को उनकी अदम्य विचार शीलता ,निर्मल पारदर्शिता ,दूसरों की मदद करते रहने की प्रवृति को मै सादर प्रणाम करती हूँ .मै परमपिता परमेश्वर को धन्यवाद् देती हूँ की उसने मुझे उनकी बेटीबनाया .मै हर जन्म मै unki ही बेटी बनना चाहूंगी .हैप्पी बर्थ दे पापा .